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सियासतनामा : गिड़गिड़ाते नेताजी

  • सैयद सलमान

गिड़गिड़ाते नेताजी
पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी मुंबई दौरे पर आए थे। लगभग ३८ हजार करोड़ की कई परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन हुआ। मुंबईकरों को यह अच्छी तरह से पता है कि यह सारा खेल मुंबई महानगरपालिका चुनाव को लेकर खेला जा रहा है। गली-मोहल्ले में भाजपा और उनके नए-नए प्रेमियों के बैनर, पोस्टर की भरमार थी। अंधेरी के एक इलाके से मुंबई महानगरपालिका के चुनाव में एक नेताजी भाजपा से दावेदार हैं। एडजस्टमेंट में खोखा पार्टी से भी दावेदारी कर रखी है और कहीं से न मिले तो निर्दलीय भी लड़ने का इरादा कर बैठे हैं। उनके कटआउट और बैनर्स में बड़े-बड़े नेताओं के साथ गली-मोहल्ले के नेताओं की तस्वीरें इस तरह लगाई गई थीं, मानो स्वागत नहीं श्रद्धांजलि सभा हो। किसी कंप्लेनर की शिकायत पर जब मुंबई महानगरपालिका के कर्मचारी बैनर, पोस्टर हटाने के लिए आए तो वह गिड़गिड़ाते हुए नजर आए कि `साहब थोड़े दिन रहने दो न, लोगों में हमारा प्रचार तो हो जाएगा।’ नेताजी की स्थिति देखकर उन पर तरस खाया जाए या हंसा जाए शायद इसी उहापोह में बगल का पानवाला मंद-मंद मुस्कुरा रहा था।

अपनी डफली-अपना राग
ममता, केसीआर, नीतिश, केजरीवाल सहित कई नेता हैं, जो आगामी चुनाव में प्रधानमंत्री पद की आस रखते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन वह बनेंगे कैसे, इसका कोई खास खाका किसी के पास नहीं है। बस भाजपा का विरोध करना है और इतने सांसद जिताकर लाना है कि गैर-भाजपा दलों के सामने कोई पर्याय न बचे। कांग्रेस की मजबूरी हो जाएगी कि वह साथ दे। तकरीबन यही रणनीति सभी की है। यह सारे एक-दूसरे को भी काटने से परहेज नहीं कर रहे। अब इसकी मिसाल है केसीआर की हालिया रैली, जिसमें विपक्ष के अधिकांश नेताओं को तो बुलाया गया लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव को न्योता तक नहीं दिया गया। इस रैली से ममता भी दूर रहीं। जिस मोदी सरकार की सत्ता पलटने का विपक्ष सपना देख रहा है, वो कांग्रेस के बगैर भी नामुमकिन है। फिर `अलग डफली-अलग राग’ से भला ऐसे कैसे विपक्षी एकता संभव हो सकती है? अंत में अलग-अलग पार्टियों को मिलने वाले वोटों का यह बिखराव भाजपा के लिए ही फायदेमंद साबित होगा।

व्यक्तित्व में बड़प्पन
राजनीति में अब आचरण की जगह नहीं बची। शब्द चयन ऐसे होते हैं कि सामने वाला तिलमिला जाए। नेताओं से तो कम से कम इसकी अपेक्षा की ही जाती है कि वह अपने से छोटों के लिए सम्मान न सही लेकिन स्नेह का भाव तो रखें। कांग्रेस के बुजुर्ग नेता और राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत शायद इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं कि वह फिल्मी स्टाइल के डायलॉग बोलकर तालियां तो पा सकते हैं, सम्मान नहीं। अपने से काफी छोटे सचिन पायलट को नकारा, निकम्मा, गद्दार, कोरोना कहकर वह अपनी भड़ास निकाल रहे हैं लेकिन युवाओं के लिए गलत परिपाटी बना रहे हैं। सचिन पायलट से विरोध है तो जो बन पड़े उनके राजनीतिक नुकसान के लिए वह करें, लेकिन भाषा पर संयम खोना खुद गहलोत की छवि को नकारात्मक बना रहा है। शशि थरूर ने कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था, हारे भी लेकिन कहीं निम्न भाषा का उपयोग नहीं किया था। बड़ा बने रहने के लिए व्यक्तित्व में बड़प्पन का होना भी जरूरी है। आजकल के नेता यह भूलते जा रहे हैं।

कौन-सा गुजरात मॉडल?
जिस गुजरात मॉडल को पूरे देश में प्रचारित किया जाता है वह दरअसल है क्या, यह समझ से परे है। भाजपा के अलग-अलग नेता अलग-अलग समय पर अपनी सुविधानुसार इसका प्रचार कर लेते हैं। कभी उद्योग-धंधों को लेकर और कभी जातीय ध्रुवीकरण को लेकर। गुजरात के व्यापारी योगी के मांगने पर उत्तर प्रदेश में निवेश करने की घोषणा करते हैं लेकिन महाराष्ट्र की अनेक परियोजनाएं गुजरात भेजी जा रही हैं। फिलहाल, तो गुजरात में ही गुजरात मॉडल अलग वजह से चर्चा में है जहां भाजपा विधायक गजेंद्र सिंह और तीन अन्य के खिलाफ राजस्थान पुलिस ने एक नाबालिग लड़की के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में पॉक्सो अधिनियम के तहत केस दर्ज किया है। पीड़ित परिवार द्वारा शिकायत करने पर उसे जान से मारने की धमकी दी गई, पुलिस ने भी साथ नहीं दिया, तब सिरोही कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। अफसोस की बात है कि मामला कोर्ट के आदेश के बाद दर्ज हुआ। विधायक के नजरिए से क्या यह मामला भी `गुजरात मॉडल’ में गिना जाएगा?

(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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