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सियासतनामा : महाराष्ट्र की ममता पर सवाल?

  • सैयद सलमान

महाराष्ट्र की ममता पर सवाल?
ढाई साल भले ही महाविकास आघाड़ी की सरकार रही हो लेकिन महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी का व्यवहार ऐसा रहा जैसे केंद्र की शह पर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हो और वो सरकार के मुखिया हों। उनका बड़बोलापन हमेशा सुर्खियों में रहा। सत्ता परिवर्तन के बाद कोश्यारी के एक भाषण के बाद से राज्य की सियासत फिर से गरमा गई है। राज्यपाल का बयान कुछ यूं था कि `अगर महाराष्ट्र से गुजरातियों और राजस्थानियों को हटा दिया जाता है तो महाराष्ट्र के पास कोई पैसा नहीं बचेगा और मुंबई को अब भारत की आर्थिक राजधानी नहीं कहा जाएगा।’ महाराष्ट्र के लोगों को उनका यह बयान नागवार गुजरा। महाराष्ट्र के मेहनतकशों पर यह राज्यपाल का अपरोक्ष हमला नहीं तो भला क्या है? गुजराती, राजस्थानी, उत्तर भारतीय, दक्षिण के कई राज्य या देश के विभिन्न हिस्सों से मुंबई में आए लोगों को एक मां की तरह महाराष्ट्र ने संरक्षण दिया है। उसी महाराष्ट्र की जनता की क्षमता पर सवाल उठाना एक महामहिम राज्यपाल को क्या शोभा देता है? यह सवाल तो `दगाबाज’ और `दो नंबरी’ नेता को भी राज्यपाल से पूछना चाहिए।
कमियां छुपाने का प्रयास
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के लिए अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल करने पर हुए हंगामे के बाद आखिरकार कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने उन्हें चिट्ठी लिखकर माफी मांग ली है। वह पहले से ही माफी की भूमिका में थे। लेकिन हर नकारात्मक मुद्दे पर राई को पहाड़ बनाने में माहिर भाजपा का बड़ा तबका और स्मृति ईरानी गैंग के सदस्य इस मुद्दे को इतनी जल्द खत्म करने के मूड में नहीं थे। ऐसे में जबकि विपक्ष ने संसद में महंगाई, बेरोजगारी समेत जनहित से जुड़े अनेक मुद्दों पर चर्चा कराने के लिए सरकार पर दबाव बना रखा था तब सत्तापक्ष को यह मुफीद लगा कि वह जनता का ध्यान इन मुद्दों से भटकाकर रखे। विपक्ष के हंगामे का यह मूल होता है कि वह जनता के लिए संघर्ष करती दिखाई भी दे और सत्तापक्ष को घेरे भी, जबकि सत्तापक्ष की तो जिम्मेदारी है कि वह जनहित के कार्य के माध्यम से विपक्ष को खामोश करे। लेकिन यह हंगामा बताता है कि राष्ट्रपति के अपमान के बहाने सत्तापक्ष अपनी कमियां छुपाने का प्रयास कर रहा है।
आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा
आत्ममुग्धता के किस्से कहानियां सुन-सुन कर यह आभास हुआ कि ऐसे लोग मनोरोगी ही होते होंगे जो अपने अलावा किसी को देखना ही नहीं चाहते। मौसम महंगाई पर, बेरोजगारी पर, जनता के मुद्दों पर बोलने का है लेकिन इन मुद्दों से ध्यान भटका कर किसी और तरफ ले जाने की कई कोशिशें होती रहती हैं। श्रीलंका की बगावत का जब उदाहरण दिया जाने लगा तो महाराज के कारिंदों को नई खुराफात सूझी और बेमौसम किसी एक सर्वे के बहाने देश में `मोदी से बढ़कर कोई नहीं’ का ढिंढोरा पीटा जाने लगा। सर्वे के अनुसार अगर अभी लोकसभा चुनाव कराए जाएं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाला एनडीए लोकसभा की कुल ५४३ में से ३६२ सीटों पर एकतरफा जीत दर्ज कर सकता है यानी एनडीए को कुल ४१ फीसदी वोट मिलने का अनुमान है। यह तो गनीमत है कि रहम खाकर सर्वे में यूपीए को २८ फीसदी और `अन्य’ को ३१ फीसदी वोट दे दिए गए हैं यानी देश में दूध की नदियां बह रही हैं। विपक्ष अपनी राजनीति बंद कर सरकार के आगे शरणागत हो जाए।
आजम के शायराना बोल
उत्तरप्रदेश की राजनीति की अपनी महिमा है। कहते हैं दिल्ली का रास्ता लखनऊ होकर जाता है इसीलिए भाजपा ने अपने तमाम बड़े मुद्दों को वहीं से उठाया है। अयोध्या, काशी, मथुरा, ताज जैसे मुद्दे जगजाहिर हैं, वहीं दूसरी ओर भविष्य के नेता माने जा रहे अखिलेश को भी पूरी तरह खत्म करने की रणनीति बनती रहती है। इस बीच अखिलेश के साथी दल और चाचा शिवपाल उनका साथ छोड़ चुके हैं लेकिन अखिलेश से नाराज दिखाई देने वाले आजम खान उनका बचाव कर रहे हैं। आजम से सपा गठबंधन की फूट और राष्ट्रपति चुनाव में क्रॉस वोटिंग पर जब सवाल पूछा जाता है तो वह शायराना अंदाज में कहते हैं, `फूंकों  से यह चिराग बुझाया न जाएगा।’ अखिलेश के लिए यह राहत की बात है। इस बीच अखिलेश यादव ने मिशन २०२४ को लेकर तैयारी और तेज करते हुए अब तेलंगाना के सीएम चंद्रशेखर राव की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। उत्तर-दक्षिण का यह सांकेतिक मिलन भाजपा खेमे को परेशान तो करेगा ही।

(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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