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‘राज’नीति : हार पर रार

रमेश सर्राफ धमोरा
झुंझुनू

राजस्थान विधानसभा चुनाव में भाजपा से लगातार सात बार विधायक व नेता प्रतिपक्ष रहे राजेंद्र राठौड़ चूरू जिले की तारानगर सीट से चुनाव हार गए हैं। उसके बाद से ही जिले की राजनीति में रार मची हुई है। राजेंद्र राठौड़ समर्थकों का कहना है कि चूरू से भाजपा सांसद राहुल कस्वां, उनके पिता पूर्व सांसद रामसिंह कस्वां तथा माता पूर्व विधायक कमला कस्वां ने जमकर राठौर की कारसेवा कर उन्हें चुनाव हरवा दिया। स्वयं राजेंद्र राठौड़ ने भी एक जनसभा में खुलकर कहा है कि हार में उनकी भी कुछ कमी रही है, लेकिन जिन जयचंदों ने मेरे चुनाव में भितरघात किया है उनसे सावधान रहने की जरूरत है। भितरघात करने वाले जयचंद अब पार्टी में ईमानदार बनने का नाटक कर सत्ता के नजदीक आने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उन्हें दूर रखा जाएगा। सांसद राहुल कस्वां पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे गुट के माने जाते हैं। कस्वां के बहाने राठौर ने वसुंधरा राजे पर भी निशाना साधा है।
हारे को हरी नाम
राजनीति में कहा जाता है कि जो जीता वही सिकंदर तथा हारे को हरी नाम। यह कहावत राजस्थान में भाजपा के हारे हुए सांसदों पर भी लागू होने वाली है। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने छह लोकसभा सांसदों दीया कुमारी, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, बाबा बालकनाथ, भागीरथ चौधरी, देवजी पटेल व नरेंद्र कुमार के साथ ही राज्यसभा सदस्य डॉक्टर किरोडी लाल मीणा को भी प्रत्याशी बनाया था। इनमें से लोकसभा सांसद दीया कुमारी, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ व बाबा बालकनाथ तथा राज्यसभा सांसद डॉक्टर किरोडी लाल मीणा चुनाव जीत गए। इसके अलावा जालौर के सांसद देवजी पटेल, अजमेर के सांसद भागीरथ चौधरी, झुंझुनू के सांसद नरेंद्र कुमार चुनाव हार गए हैं। भागीरथ चौधरी व देवजी पटेल तो मुख्य मुकाबले में भी नहीं आ पाए। चर्चा है कि चुनाव हारे हुए तीनों ही सांसदों की पार्टी टिकट काट सकती है। सांसदों के टिकट कटने की चर्चा से उनके लोकसभा क्षेत्र से टिकट के लिए नए दावेदार सक्रिय हो गए हैं।
फिर पावर में गहलोत
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हमेशा ही पावर में रहते हैं। राजस्थान में तीन बार मुख्यमंत्री, केंद्र में मंत्री रह चुके गहलोत संगठन में भी प्रभावी भूमिका रखते हैं। राजस्थान कांग्रेस के तीन बार अध्यक्ष, कांग्रेस पार्टी के संगठन महासचिव, सेवादल अध्यक्ष रह चुके गहलोत के बारे में कहा जाता है कि सरकार से हटते ही वह संगठन को संभाल लेते हैं। राजस्थान में कांग्रेस के चुनाव हारने के बाद मुख्यमंत्री पद से हटे अशोक गहलोत को कांग्रेस पार्टी ने उस पांच सदस्य हाई पावर कमेटी का सदस्य बनाया है, जो चुनाव में विभिन्न दलों से एलायंस का काम देखेगी। कमेटी का संयोजक महासचिव मुकुल वासनिक को बनाया गया है। इसमें अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, सलमान खुर्शीद व मोहन प्रकाश को सदस्य बनाया गया है। कहने वाले तो कह रहे हैं कि गहलोत को प्रदेश से दूर कर दिया है, मगर गहलोत इतनी जल्दी प्रदेश छोड़ने वाले नहीं हैंै। वे प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर भी अपने किसी समर्थक को बैठाने का प्रयास कर रहे हैं।
बदलेंगे अधिकारी
राजस्थान में सरकार बदलने के साथ ही बड़े लेवल पर अधिकारियों की बदली होना निश्चित है। मुख्य सचिव उषा शर्मा का कार्यकाल भी इसी महीने पूरा होने जा रहा है। नई सरकार को नए मुख्य सचिव का भी चयन करना है। मुख्य सचिव की दौड़ में पांच वरिष्ठ नौकरशाह शामिल हैं, जिनमें से किसी एक को बनाया जाएगा। इसके साथ ही प्रदेश में बड़े पैमाने पर अतिरिक्त मुख्य सचिवों, सचिवों, जिला कलेक्टर, उपखंड अधिकारियों के साथ पुलिस के भी आला अधिकारियों के स्थानांतरण होने है। विधानसभा चुनाव से कुछ पहले ही कई जिलों में नए कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक लगाए गए थे। चर्चा है कि अगले ६ माह में होने जा रहे लोकसभा चुनाव को देखते हुए प्रदेश में भाजपा की नई सरकार भी अपनी सुविधानुसार अधिकारियों, कर्मचारियों को पद स्थापित करेगी। इसी तरह नीचे के स्तर पर भी बड़ी संख्या में थानेदारों, तहसीलदारों व अन्य विभागों में कार्यरत कार्मिको के तबादले किए जाएंगे। मलाईदार पदों पर बैठे कई कर्मचारियों की तबादले की चर्चा सुनकर ही नींद उड़ी हुई है।
(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहतें हैं।)

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