मुख्यपृष्ठस्तंभसियासतनामा: तानाशाही का प्रतीक

सियासतनामा: तानाशाही का प्रतीक

दिल्ली सेवा बिल के जरिए राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग का उपराज्यपाल के माध्यम से उपयोग करेगी। कंट्रोल केंद्र सरकार के पास रहेगा। राज्य सरकार बस नाम की सरकार होगी। इस बिल को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद लाया गया, जिसमें राज्य सरकार को शक्तियां दी गई थीं। अब मोदी सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर भी नया बिल लाकर अपने मंसूबे साफ कर दिए हैं। यह बिल भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बिलकुल विपरीत है। सरकार ने नए विधेयक में तीन सदस्यीय नियुक्ति पैनल बनाया है, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करेंगे। दो अन्य सदस्यों में एक लोकसभा में नेता विपक्ष और एक कैबिनेट मंत्री शामिल रहेंगे। नए पैनल में सीजेआई तक को शामिल नहीं किया गया है। चुनाव से पहले सरकार की कवायद अपनी मर्जी का चुनाव आयुक्त लाने की है, जिससे सत्ता प्राप्ति का रास्ता आसान हो सके। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के विपरीत अधिकारियों की नियुक्तियों का जो तरीका अपनाया जा रहा है वह पूर्णतया तानाशाही का प्रतीक है।
सत्ता का अहंकार
तीन महीने से अधिक से हिंसा झेल रहे मणिपुर पर देशभर की सियासत में हंगामा मचा हुआ है। इस गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खामोशी निशाने पर थी। आखिर में विपक्ष के लाए अविश्वास प्रस्ताव पर नरेंद्र मोदी को बोलना पड़ा। अविश्वास प्रस्ताव के केंद्र में मणिपुर की हिंसा थी। वहां की सामूहिक पीड़ा थी। लोग चाहते थे कि मणिपुर पर मोदी जवाब दें। लेकिन अफसोस कि सदन में जवाब देते हुए मोदी ने अपने भाषण का उपयोग विरोधियों का उपहास उड़ाने के लिए, चुटकुले सुनाने के लिए और पूरे विपक्ष के साथ-साथ नेहरू, इंदिरा जैसी इस दुनिया में नहीं रही शख्सियतों पर तंज करने के लिए किया। मणिपुर पर बस ढाई से तीन मिनट का वक्तव्य। देश के मुखिया का ताज पहनकर देश-विदेश में अपनी लोकप्रियता का दंभ भरने वाले मोदी न्याय की पूरी व्यवस्था और आश्वासन के साथ जिस तरह की शांति की अपील कर सकते थे, वह नहीं कर पाए। संवेदनशील मुद्दे पर जवाब देते हुए भी सत्ता का अहंकार उनकी बॉडी लैंग्वेज में साफ नजर आया।
कार्यशैली पर सवाल
गिरती आर्थिक व्यवस्था, विदेश नीति की उड़ती धज्जियां, बेरोजगारी, मंहगाई जैसे तमाम मुद्दों पर नाकामी के बावजूद देश में मोदी सरकार की सफलता का आभासी हौवा खड़ा किया गया है। उसी तर्ज पर हत्या, बलात्कार, दलित उत्पीड़न, जातीय हिंसा और गुंडा राज का दंश झेल रहे उत्तर प्रदेश में योगी सरकार का भी आभासी महिमामंडन किया जाता है। यहां तक कि किसी राज्य में कोई घटना घटती है तो योगी की ट्रोल आर्मी वहां योगी के मुख्यमंत्री होने की चाह दर्शानेवाली बात करती है। आश्चर्य की बात है कि भाजपा का मुख्यमंत्री हो तब भी यह आर्मी उसका मखौल उड़ाती है। हरियाणा हिंसा में इसी तरह खट्टर का मजाक बनाकर कहा गया कि यहां अगर योगी होते तो सब ठीक कर देते। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने २०१७ के बाद से राज्य में कथित तौर पर हुई १८३ पुलिस मुठभेड़ हत्याओं की जांच और अभियोजन की प्रगति पर `व्यापक हलफनामा’ मांग कर योगी सरकार की कार्यशैली पर सवाल तो उठा ही दिया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा योगी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने के बाद ट्रोल आर्मी सदमे में है।
वैचारिक दिवालियापन
सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर यूपी की सियासत में मजाक बनकर रह गए हैं। कुछ दिनों पहले वह सपा गठबंधन का साथ छोड़कर एनडीए में शामिल हुए हैं। एनडीए के प्रति वफादारी दिखाने के लिए वह लगातार सपा और अखिलेश यादव पर तंज कस रहे हैं। जाहिर है, जल्द से जल्द मंत्री बनने की चाहत में मोदी-योगी को खुश करने के लिए वह ऐसा कर रहे हैं। उनकी इस आदत पर भरे सदन में शिवपाल यादव ने योगी से अपील कर डाली कि वह राजभर को जल्द से जल्द मंत्री पद की शपथ दिलाएं, नहीं तो वह फिर से सपा से हाथ मिला लेंगे। यह बात सुनकर सीएम योगी के साथ-साथ अखिलेश यादव भी हंसने लगे। ऐसा मजाक इसलिए ही हो सका क्योंकि सत्ता के लिए राजभर कपड़ों की तरह गठबंधन बदलते हैं। वैचारिकता, नैतिकता और प्रामाणिकता की कोई जगह ही नहीं छोड़ते। अगर ऐसा नहीं है तो वह बताएं कि योगी, अखिलेश या ओवैसी में भला क्या समानता है? आखिर किस विचारधारा के तहत वह बारी-बारी तीनों के साथ गलबहियां कर चुके हैं। यह तो वैचारिक दिवालियापन की निशानी है।
सैयद सलमान, मुंबई
(लेखक देश के प्रमुख प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं।)

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