मुख्यपृष्ठस्तंभकिस्सों का सबक : सकारात्मक दृष्टिकोण

किस्सों का सबक : सकारात्मक दृष्टिकोण

दीनदयाल मुरारका।  एक गुरु के दो शिष्य थे। दोनों गुरु के पास रहकर शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। एक दिन गुरु ने उनकी परीक्षा लेने को तय किया। उन्होंने एक शिष्य को बुलाकर पूछा, बताओ यह जगत वैâसा है? शिष्य ने कहा, गुरुदेव यह तो बहुत बुरा है। चारों ओर अंधकार ही अंधकार है। आप देखिए एक दिन होता है और दो रातें। पहले रात थी। अंधेरा ही अंधेरा छाया था। फिर दिन आया और उजाला हुआ। लेकिन दोबारा रात आ गई और अंधेरा छा गया। एक बार उजाला, दो बार अंधेरा। अंधेरा अधिक प्रकाश कम है। यही जगत की सही स्थिति है।
गुरु ने उस शिष्य की बात सुनने के बाद दूसरे शिष्य से भी यही प्रश्न पूछा। दूसरा शिष्य बोला, गुरुदेव यह जगत बहुत ही अच्छा है। यहां चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश है। रात बीती, उजाला हुआ। सर्वत्र प्रकाश फैल गया। रोशनी आती है तो अंधेरा दूर हो जाता है। यह सबकी मुंदी हुई आंखें खोल देता है। जीवन के यथार्थ को प्रकट कर देता है। कितना सुंदर और लुभावना है यह जगत कि जिसमें इतना अधिक प्रकाश है। मैं हमेशा महसूस करता हूं कि दिन आया, रात आई, फिर दिन। इस तरह दो दिन के बीच केवल एक रात है। प्रकाश अधिक एवं अंधकार कम है।
गुरु ने दोनों शिष्यों को बुलाकर कहा, यह जगह अपने आप में कुछ नहीं है। यह वैसा ही दिखता है, जैसा हम इसे देखते हैं। उन्होंने पहले शिष्य को दूसरे शिष्य की बात बताई और कहा, अगर हम इसे सकारात्मक दृष्टि से देखेंगे तो यह हमें बहुत सुखद लगेगा, लेकिन तुम्हारा दृष्टिकोण सकारात्मक होना चाहिए। यदि हमारे जीवन के सारे कार्य सकारात्मक ढंग से होंगे तो तुम्हें जीवन में आनंद ही आनंद मिलेगा। गुरुजी की बात सुनकर पहले शिष्य ने अपने जीवन के दृष्टिकोण में परिवर्तन करने का तय किया।

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