मुख्यपृष्ठस्तंभअर्थार्थ : गरीबी, चुनौती और समाधान!

अर्थार्थ : गरीबी, चुनौती और समाधान!

पी. जायसवाल
देश आजादी की ७५ वीं वर्षगांठ मना रहा है, अनाज के आधिक्य और तरक्की की भी खबरें आती रहती हैं। हम चांद-मंगल से लगायत, पता नहीं कहां- कहां पहुंच रहे हैं। कई क्षेत्रों में आत्मनिर्भर भी बन रहे हैं। रोज अपनी पीठ भी थपथपा रहे हैं। लेकिन एक सच्चाई है कि गरीबी का जिन्न कभी भी बोतल से निकलकर सारी उपलब्धियों पर पानी फेर रहा है। विजयादशमी के समय स्वदेशी जागरण मंच की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महासचिव दत्तात्रय होसबोले ने एक कार्यक्रम में गरीबी की राक्षस रूप से तुलना कर दी। बेरोजगारी और असमानता को बड़ी चुनौती बताते हुए इसके संहार की आवश्यकता बताई। बकौल होसबोले हमें इस बात का दुख होना चाहिए कि २० करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, वहीं २३ करोड़ लोग रोजाना ३७५ रुपए से भी कम कमा रहे हैं। बकौल होसबोले देश में चार करोड़ बेरोजगार हैं, जिनमें ग्रामीण क्षेत्रों में २.२ करोड़ और शहरी क्षेत्रों में १.८ करोड़ बेरोजगार हैं। इसके लिए न केवल अखिल भारतीय योजनाओं की आवश्यकता है, बल्कि स्थानीय योजनाओं की भी आवश्यकता है। इसके लिए कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित कर ग्रामीण इलाकों में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए कौशल विकास क्षेत्र में और अधिक पहल करने का भी सुझाव दिया। आय असमानता पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने पुरुष और महिला की आय असमानता को भी रेखांकित किया। सवाल पूछा क्या यह अच्छा है कि विश्व की छह अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने के बावजूद देश की आधी आबादी को कुल आय का केवल १३ प्रतिशत ही मिलता है? केंद्र सरकार भी बताती है कि आज भी हमें ८० करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देना पड़ रहा है। मतलब हम मानते हैं कि ८० करोड़ लोग अभी-भी दाल-रोटी खरीदने के लिए सक्षम नहीं हैं। यदि २३ करोड़ लोग का आंकड़ा उन्होंने दिया है तो मुझे यकीन है कि यह उनका आंकड़ा होगा, जिन्हें कमाना चाहिए और जो एक परिवार इकाई का कमाऊ सदस्य होगा। यदि एक परिवार में पति-पत्नी दोनों के कमाने का मान लें तो एक व्यक्ति से ३ लोग जुड़े होते हैं, ऐसे में यह माना जाए कि ६९ करोड़ की कवरेज आबादी में जिन २३ करोड़ लोगों को कमाना चाहिए, वह अभी-भी ३७५ रुपए से कम कमा रहें हैं।
मेरा मानना है कि होसबोले ने सही रेखांकित किया है। देश को आजाद हुए ७५ साल हो गए हैं। इसके बाद भी गरीबी-असमानता समस्या है तो यह चिंताजनक और चिंतन एवं विमर्श का विषय है। इसके विमर्श को हम केवल जनसंख्या से जोड़कर पल्ला झाड़ लें तो यह उचित नहीं है। दशहरा रैली में मोहन भागवत ने कहा कि हमें जनसंख्या के नेगेटिव एप्रोच से बाहर आकर सोचना चाहिए कि इसे संपत्ति के रूप में रेखांकित कर इसका उपयोग वैâसे कर सकते हैं? मेरा भी मानना है कि जनसंख्या आधिक्य को एक सच्चाई के रूप में स्वीकार कर इसे संपत्ति के रूप में रेखांकित कर योग्य व्यक्ति और उचित पदसिद्धांत से लागू किया जाना चाहिए।
इस चुनौती से वैâसे निपटा जाए? पहला प्रयास है कि मुख्य धारा में विमर्श और चिंतन का कोण बदलना पड़ेगा। हाल में अमदाबाद के एक गरबा कार्यक्रम में महिलाओं के लिए १,३०० रुपए प्रवेश शुल्क को जायज ठहराते हुए कहा गया कि अच्छा हुआ शुल्क लग गया। गरबा पंडाल में आने के लिए, इससे क्वालिटी के लोग आ पा रहें हैं। यदि यह भारत की सोच और विमर्श है तो इस देश से गरीबी और असमानता कभी खत्म नहीं हो सकती। इसलिए गरीबी खत्म करने के दौरान हमें इस सोच को भी खत्म करना होगा, जो गरीब और मजदूरों को अपने चिंतन के दायरे से बाहर और अस्पृश्य मानता है। हमें उन चिंतकों को भी जवाब देना पड़ेगा, जो गरीबी के विमर्श को उठाने पर इस तर्क पर डिरेल कर देते हैं कि पिज्जा खाने के पैसे हैं तो गरीबी कहां है? यह सावन के ऐसे अंधे हैं, जिन्हें यह गरीबी दिखती ही नहीं है जबकि देश की एक बड़ी आबादी कुछ हजारों में ही घर चला रही है। उसके लिए एक हजार रुपए के बहुत मायने हैं, उसका पिज्जा के रुपए से तुलना कर मजाक न उड़ाएं।
दूसरा गरीबी का विश्लेषण कर जड़ में जाया जाए। गरीबी भी दो प्रकार की है। पहली शहरी और दूसरी ग्रामीण। शहरी गरीबी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यहां हर चीज पैसे से होनी है। सबसे ज्यादा भुखमरी भी शहरी गरीबी में देखने को मिलेगी। इसके लिए सरकार को सबसे पहले अपना शहरीकरण का अप्रोच बदल अपनी नीतियों में ‘अशहरीकरण’ को लाना पड़ेगा, जिसके तहत आबादियों को कस्बों और गांवों तक ही रोकने की योजना बनानी पड़ेगी। सड़कों, स्कूलों और स्वास्थ्य इंप्रâा में सुधार कर यदि हम इन्हें वहां रोक देते हैं तो शहरों में पलायन कम होगा। पलायन कम होगा तो शहरी गरीबों की संख्या में बड़ी गिरावट आ सकती है। दूसरा सिर्फ इंप्रâा ही नहीं, कस्बों और गांवों के इर्द-गिर्द विकसित करना और वहां रोजगार का माहौल बनाना पड़ेगा। सहकारिता उद्यम के साथ बाजार को उनके पास पहुंचाना पड़ेगा। डिजिटल और लॉजिस्टिक से उन्हें ऐसे कनेक्ट करना पड़ेगा कि बेचने के लिए या कच्चा माल खरीदने के लिए उन्हें कस्बों से शहर आने की जरूरत ही न पड़े। गांवों में चूंकि कृषि ज्यादा है इसलिए कृषि में एमबीए कोर्स की डिजाइन कर कृषि प्रबंधकों को पैदा करना पड़ेगा, जो गांव के किसानों की आय दोगुनी करने के साथ ही कृषि उद्यमिता और स्थानीय उद्यमिता दोनों बढ़ाने का काम करें। इससे जब काम-धंधे बढ़ेंगे तो लोग पलायन नहीं करेंगे। ग्रामीण गरीबी तो कम होगी ही अच्छा स्वास्थ्य शिक्षा और रोटी की गारंटी के कारण रिवर्स पलायन होगा और गरीबी का आधार कम होगा।
भारत में सनातन प्रमाण है कि गांवों में स्वत: स्फूर्त सामुदायिक सहकारिता अभी भी जिंदा है और लोग एक दूसरे के सुख-दु:ख में काम आते हैं। गांवों में अपवाद ही होगा कि कोई जानकारी में भूखा सोए और कोई बिना जानकारी के रह भी जाए। गांवों में किसी से बात करने के लिए वजह नहीं ढूंढ़नी पड़ती इसलिए लोगों को पता चल जाता है, कौन परेशान चल रहा है जबकि शहरों में किसी को जानने की फुर्सत नहीं है। पता ही नहीं चलता कि पड़ोसी भूखा है।
गरीबी का मारक पक्ष भुखमरी और बीमारी है। भुखमरी को खत्म करने की जिम्मेदारी प्रत्येक स्थानीय पंचायत को देनी पड़ेगी। हर पंचायत की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए कि उसके वहां कोई भूखा न सोए। जैसे सरकार ने मिड डे मील की डिजाइन की है, वैसे ही उसे शून्य फीसदी भुखमरी का लक्ष्य प्राप्त करना होगा। इसके तहत प्रत्येक पंचायत मासिक ऐसे परिवारों का पंजीयन करेगा जिसके यहां खाने की सुविधा नहीं है, इसमें उसके पंचायत में स्थानीय से लेकर घुमंतू समुदाय भी आएंगे। इस पंजीयन के आधार पर वह सामुदायिक किचन की व्यवस्था कर उन्हें कम से कम दो वक्त का पोषक खाना सुनिश्चित करना होगा। कॉर्पोरेट के सीएसआर फंड के इस्तेमाल के लिए सरकार को हर पंचायतों को धारा ८० जी और चैरिटी पंजीयन का प्रमाण पत्र देना चाहिए, ताकि बड़े पैमाने पर कॉर्पोरेट फंड का इस्तेमाल हो सके। महाराष्ट्र में शिवभोजन थाली और तमिलनाडु में अम्मा थाली इसके अच्छे उदाहरण हैं। नियमन और नियंत्रण के लिए सरकार चाहे तो कुछ नाममात्र का शुल्क लगा सकती है, जैसे एक या दो रुपया। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना पड़ेगा कि यदि कोई बीमार पड़ता है तो अस्पतालों की इतनी पर्याप्त संख्या हो कि उनका मुफ्त इलाज हो जाए। शिक्षा के लिए पंचायतों को ही जिम्मेदार बनाना पड़ेगा कि उनके क्षेत्र में कोई भी बच्चा कक्षा ८ तक की शिक्षा से वंचित न हो। चाहे वह घुमंतु समुदायों का ही क्यों न हो, कोई बच्चा बिना शिक्षा का दिख जाए तो उनका दाखिला तुरंत कराया जाए। पंचायत पढ़ने की उम्र लायक सभी बच्चों का सर्वे कराए यदि वह पढ़ने की उम्र में हैं और पढ़ नहीं पा रहें हैं तो उनके शिक्षा की जिम्मेदारी भी पंचायतों की हो। इस तरह से उनके और माता-पिता के खाने तथा बीमार पड़ने पर इलाज की व्यवस्था हो गई तो सब पढ़ने भी जाएंगे एवं कोई बाल श्रम इसलिए नहीं दिखेगा कि घर में खाने को पैसा नहीं है।
(लेखक अर्थशास्त्र के वरिष्ठ लेखक एवं आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक विषयों के विश्लेषक हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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