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२०२४ लोकसभा की शुरू हो गई तैयारी… सत्ताधारियों को `५५ हजार करोड़ की खैरात!

– विधानमंडल के इतिहास में सर्वाधिक पूरक मांग… महाराष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था चरमराने का डर

सामना संवाददाता / नागपुर

अगले साल होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव पर नजर रखते हुए ‘ईडी’ सरकार ने कल शीतकालीन सत्र में ५५ हजार करोड़ की  पूरक मांगों की घोषणा की। इसमें सत्ताधारी विधायकों को निधि की खैरात बांट दी गई है। विधानमंडल के इतिहास में ये सबसे अधिक पूरक मांग है। विकास कार्यों के बहाने ‘ईडी’ सरकार की इस नासमझी भरी फिजूलखर्ची से महाराष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था चरमराने का डर है।
विधानमंडल का शीतकालीन सत्र कल से नागपुर में शुरू हो गया है। पहले ही दिन उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री अजीत पवार ने निधी के लिए पूरक मांगें पेश की। इसमें से १९ हजार २४४ करोड़ रुपए की मांग कार्यक्रम के तहत खर्च के लिए तो ३२ हजार ७९२ करोड़ रुपए की मांग अनिवार्य खर्च के अंतर्गत तो ३ हजार ४८३ करोड़ रुपए केंद्र पुरस्कृत कार्यक्रम अंतर्गत आर्थिक सहायता उपलब्ध करने के अनुसार प्रस्तुत की गई है। इसके कारण  राज्य सरकार पर ४८ हजार ३८४ करोड़ रुपए का भार आने वाला है। इन रिकॉर्ड अनुपूरक मांगों से राज्य की आर्थिक स्थिति चरमराने का डर है। ‘ईडी’ सरकार का यह आखिरी सत्र है। अगले साल चुनाव की घोषणा होने की संभावना है और राज्य में सरकार विरोधी माहौल है, इसीलिए सत्ताधारी विधायकों पर अनुपूरक मांगों के नाम पर जनता का पैसा लुटाने का आरोप लग रहा है। शहरी क्षेत्र के विकास के लिए ३ हजार करोड़ और ग्रामीण क्षेत्र के लिए १ हजार ९१८ करोड़ रुपए विधायकों को दिए जाएंगे। इसके अलावा किसानों, महिलाओं, अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़े समुदायों के लिए योजनाओं को अनुपूरक मांग में जगह दी गई है।
मनपा  क्षेत्र और नगर परिषदों में बुनियादी ढांचे के विकास कार्यों के लिए विशेष अनुदान के रूप में ३,००० करोड़ रुपए उपलब्ध कराए जाएंगे, जबकि जिला परिषदों, पंचायत समितियों और ग्राम पंचायतों के सुदृढ़ीकरण के लिए पंद्रहवें वित्त आयोग से १,९१८ करोड़ रुपए उपलब्ध कराए जाएंगे।

अनुपूरक मांग में विभाग अनुसार  प्रावधान
लोक निर्माण कार्य…५ हजार ४९२ करोड़ रुपए
कृषि…….५ हजार ३५१ करोड़ रुपए
शहरी विकास……५ हजार १५ करोड़ रुपए
उद्योग, ऊर्जा, श्रम…४ हजार ८७८ करोड़ रुपए
ग्रामीण विकास….४ हजार १९ करोड़ रुपए
जल आपूर्ति एवं स्वच्छता….३ हजार ५५५ करोड़ रुपए
सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता….३ हजार ४९५ करोड़ रुपए
स्कूली शिक्षा और खेल….३ हजार ४७६ करोड़ रुपए
अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग….३ हजार ३७७ करोड़ रुपए
चिकित्सा शिक्षा एवं औषधियां….३ हजार ८१ करोड़ रुपए
घर…….२ हजार ९५२ करोड़ रुपए
आदिवासी विकास….२ हजार ५८ करोड़ रुपए

यह आर्थिक नीति राज्य के लिए घातक है
५५ हजार करोड़ रुपए की अनुपूरक मांगें। ऐसी अमर्यादित फिजूलखर्ची महाराष्ट्र को रसातल में ले जाने जैसा है। इस खर्च के लिए कर्ज लेना पड़ेगा। ऋण लिया जा सकता है, लेकिन कितना लिया जा सकता है, इसकी एक सीमा होती है। उस ऋण के पुनर्भुगतान के लिए भी प्रावधान किया जाना चाहिए। आय बढ़े और व्यय पर अंकुश लगे। अगर सरकार इतना खर्च करेगी तो राज्य कर्ज में डूब जाएगा और कर्ज से उबरने में कई साल लग जाएंगे। इतना खर्च करने के बावजूद प्रशंसनीय कार्य नहीं हो पाते। ब्याज पर ब्याज देना पड़ता है। इसलिए मौलिक काम का पैसा नहीं मिलता। यदि ब्याज पर ब्याज चुकाने में इतना बड़ा खर्च किया जाएगा तो यह राज्य की राजकोषीय नीति के लिए अभिशाप है।
-रवींद्र वायकर, विधायक शिवसेना

ऐसी मनमानी फिजूलखर्ची कभी नहीं हुई थी
ऐसी फिजूलखर्ची पहले कभी नहीं हुई। ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। जहां तक मेरी जानकारी है प्रत्येक सत्तारूढ़ विधायक को इन अनुपूरक मांगों में लगभग ४०-४० करोड़ रुपए दिए गए हैं। इस फिजूलखर्ची से हिल जाएगा महाराष्ट्र का खजाना। ऐसी स्थिति आ जाएगी कि सरकारी कर्मचारियों को वेतन देना मुश्किल हो जाएगा। राज्य में अवैध सरकार इस तरह मनमानी कर रही है कि उसे कोई रोक नहीं सकता। यह सरकार गैंडे की खाल से बनी है। अब जनता उन्हें चुनाव में ही उनकी जगह दिखाएगी।
-सुनील प्रभु, प्रमुख प्रतोद, शिवसेना

यह सरकार सिर्फ विधायकों को पैसा बांटना चाहती है
अनुपूरक मांगों के मौके पर राज्य सरकार काफी पैसे खर्च कर रही है। इसका मतलब है कि सरकार के पास योजना का अभाव है। अनुपूरक मांगें उन चीजों को कवर करने के लिए की जाती हैं, जिनके लिए बजट में प्रावधान नहीं किया जा सकता है। लेकिन अब ५५ हजार करोड़ रुपए की ये अतिरिक्त मांग उन चीजों के लिए की जा रही है जो बजट में की जा सकती थीं। वर्तमान सरकार के पास कोई वित्तीय योजना नहीं है। चुनाव को देखते हुए सरकार सिर्फ अपने विधायकों को फंड बांटना चाहती है।
-अंबादास दानवे, नेता विपक्ष, विधान परिषद

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