गणिका की राखी!

हर निगाह उठती है हम पर खरीदार की तरह
बिकते हैं जिस्म हमारे खेल खिलौनों की तरह
माना कि हम हैं बदनाम, ये भी तो है मर्दों का वरदान!
वर्ना हमारे नसीब में ये कोठा न होता
जिल्लत न होती न ये बिस्तर होता
जवां जिस्म की गंध के मारे हैं ये सारे के सारे
कोई नहीं आता जिसे हम भाई कहकर पुकारें
कोई भाई आता नहीं कलाई हमारी थामने
आते हैं भाई लोग सब अपनी मर्दानगी दर्शाने
आते हैं अपनी काम-पिपासा मिटाने
धरी की धरी रह गई आज के दिन भी
दो-तीन उदास राखियां मेरी हथेली में
धंधे की कसम खूब रोती मैं
बिस्तर पर औंधी लेटी लेटी धंधे के बाद!
उस रात खरीदी राखियों को देखकर
एहसास कचोटने लगा…यह सच है बन्नो कि
वेश्या का दिल तो होता है जरूर
कथित दिलदार यार भी खूब चले आते हैं
हमारी चमड़ी मसलने, भूखे भेड़ियों की तरह हम पर झपटने
जिस्म के दलाल-सौदागर भी कुछ कम कसर नहीं छोड़ते
खूब नोचते, मसलते, कुचलते हैं
मगर अफसोस कि वेश्या को
अपनी बहन मानने वाला कोई मर्द
इस तरफ रुख नहीं करता है
मैं समझ गई कि ये मनहूस राखियां
हम तवायफों के लिए नहीं बनी हैं
हमारे हिस्से चारपाई तो आई,
पर भाई नहीं आया।

-त्रिलोचन सिंह अरोरा
डोंबिवली

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