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भूमिपुत्रों का विरोध दरकिनार!…विवादास्पद वाढवण बंदरगाह के भूमिभूजन पर उठे सवाल

– मछुआरों और सरकारों के बीच टकराव चरम पर

सामना संवाददाता / मुंबई

पालघर जिले में हजारों भूमिपुत्रों और मछुआरों को आजीविका के लिए दर-दर भटकने के लिए मजबूर करने वाले विवादित वाढवण पोर्ट का भूमिपूजन आगामी २५ फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों कराए जाने की साजिश ‘जेएनपीए’ ने की है। स्थानीय मछुआरों के कड़े विरोध की अनदेखी करके विभिन्न सरकारी विभागों के साथ ही पर्यावरण विभागों से अनुमति हासिल करके भूमिपूजन की तैयारी की गई है। इस जुल्मा जबरदस्ती के कारण स्थानीय भूमिपुत्रों, मछुआरों और केंद्र व राज्य सरकारों के बीच टकराव बढ़ने की आशंका है।
केंद्र सरकार के प्रस्तावित वाढवण बंदरगाह का स्थानीय भूमिपुत्रों की ओर से कड़ा विरोध किया गया है। इस बंदरगाह के कारण समुद्र में मछलियों की ‘गोल्डन बेल्ट’ नष्ट हो जाएगी। इसके साथ ही मछली की आपूर्ति बंद हो जाएगी। वैकल्पिक तौर पर हजारों मछुआरों का रोजगार छिन जाने के कारण उन्हें आजीविका के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा। प्रस्तावित बंदरगाह के कारण समुद्री और तटीय जैव विविधता पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी। इसके अलावा हजारों गाड़ियों के आवागमन से उड़ने वाले धुएं और धूल से यहां की बागवानी के साथ- साथ खेती भी खतरे में पड़ जाएगी। यह परियोजना जेएनपीए द्वारा उरण में स्थापित की जाएगी। उसके लिए जनसुनवाई भी हो चुकी है।
मुख्यमंत्री महाराष्ट्र के या केंद्र के?
इन जनसुनवाई के माध्यम केंद्र सरकार के अधिकारी भूमिपुत्रों का विरोध दरकिनार करके इस परियोजना पर जबरन काम शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं। इसे लेकर दो दिन पहले वाढ़वण वासियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी। इस बैठक में न्याय की आस लगाए बैठे नागरिकों की आशा पर पानी फिर गया। मुख्यमंत्री शिंदे ने बंदरगाह की जमकर सराहना की। इसलिए यह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं या केंद्र के, यह सवाल आक्रोशित वाढवण वासियों ने किया था।
वाढ़वण बंदरगाह जेएनपीए और महाराष्ट्र मेरीटाइम बोर्ड के बीच एसपीवी द्वारा कार्यान्वित की जानेवाली एक प्रस्तावित परियोजना है। पालघर जिले में बंदरगाह का काम २०२० से शुरू किया गया है। समुद्र की प्राकृतिक गहराई से लाभान्वित और विश्व स्तर पर सबसे बड़े इस बंदरगाह की लागत ६५,००० करोड़ रुपए थी। हालांकि स्थानीय मछुआरों ने इस बंदरगाह का कड़ा विरोध किया है। सीआरजेड, केंद्रीय मंत्रालय से विभिन्न एनओसी और पर्यावरण विभाग से विभिन्न मंजूरी हासिल करने में देरी के साथ ही स्थानीय मछुआरों के विरोध के कारण बंदरगाह की लागत में १२,००० करोड़ रुपए से अधिक की वृद्धि हुई है। पिछले चार साल की देरी के कारण बंदरगाह की लागत ७८ हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गई है।
पीएम के हाथों होना है भूमिपूजन
विवादित वाढवण पोर्ट का भूमिपूजन आगामी २५ फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों भूमिपूजन कराए जाने की साजिश ‘जेएनपीए’ ने की है। लेकिन भूमिपुत्रों के विरोध के कारण प्रधानमंत्री द्वारा भूमिपूजन किए जाने को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे है।

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