मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाचुनाव आयोग की गंभीरता पर उठते सवाल!

चुनाव आयोग की गंभीरता पर उठते सवाल!

योगेश कुमार सोनी। बीते दिनों दिल्ली नगर निगम के चुनाव होने थे, जिसके लिए सभी प्रत्याशियों की सूची तैयार हो गई थी व अन्य बाकी भी तैयारियां जोरों-शोरों पर हो गई थीं लेकिन एन मौके पर चुनाव आयोग ने तीनों निगमों को पुन: एक करने की बात कहकर चुनाव टाल दिए। इस मामले पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा ‘पिछले ८ साल से केंद्र में भाजपा की सरकार है और यदि केंद्र सरकार को तीनों एमसीडी का एकीकरण करना था तो अभी तक क्यों नहीं किया? चुनाव की तारीख घोषित करने से एक घंटे पहले अचानक अब तीनों एमसीडी को एक करने की बात क्यों कही? स्पष्ट है कि चुनाव टाल दिए जाएं। तीनों एमसीडी को एक करना तो एक बहाना है, असली मकसद तो चुनाव टालना है। आम आदमी पार्टी का कहना है कि हमारी लहर को देखते हुए भाजपा को अपनी हार का डर सता रहा था और इसके चलते चुनाव टाल दिए गए। इस घटनाक्रम पर चुनाव आयोग ने कहा है कि दिल्ली नगर निगम के चुनाव तय समय पर होने हैं या नहीं, यह अब तक तय नहीं किया गया है। इसके लिए १८ अप्रैल तक इंतजार करना होगा। अगर उससे पहले तीनों निगमों को एक करने पर पैâसला नहीं लिया जाता है तो चुनाव तय समय पर कराए जाएंगे। दिल्ली में २२ मई तक निगम चुनाव पूरे कराए जाने हैं। इसके लिए अभी अंतिम पैâसला लिया जाना बाकी है। इसके अलावा भाजपा ने कहा है कि केजरीवाल को इतनी जल्दी इसलिए है उन्होंने जिन प्रत्याशियों को टिकट बेचा है, वह केजरीवाल की जान को आफत कर रहे हैं। बहरहाल, यह तो राजनीतिक बातें हैं जो चलती ही रहती हैं लेकिन यदि इस प्रकरण को गंभीरता से समझा जाए तो यहां चुनाव आयोग घेरे में आ रहा है चूंकि जिस काम को करने के लिए केंद्र सरकार के पास अच्छा-खासा समय था तो वह ठीक चुनाव के समय ही यह बात क्यों सामने आई? इस प्रकरण को लेकर आयोग व एजेंसी पर सरकार को तोता होने का आरोप लगाया जा रहा है। इस शब्द का निर्माण २०१३ में कांग्रेस के कालखंड में पड़ा था। ज्ञात हो कि कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाला मामले में सीबीआई जांच की प्रगति रिपोर्ट में सरकार के हस्तक्षेप पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और जांच एजेंसी दोनों को कड़ी फटकार लगाई थी और इस मामले में सरकार को कहा था कि किसी एजेंसी को अपने तरीके से संचालित न करें। स्पष्ट है कि यदि देश को संचालित करनेवाली ऐसी एजेंसी व आयोग भी इस तरह का काम करेंगे या शक के घेरे में आएंगे तो यह लोकतंत्र के लिए एक बहुत बड़ा खतरा माना जाएगा। यदि हमारे देश के चुनाव आयोग की बात करें तो वह समय के अपडेट व अपग्रेड नहीं माना जा रहा। हम आज भी एक साथ पूरे देश में चुनाव कराने असफल हैं, देश तो छोड़िए एक राज्य में एक साथ चुनाव कराने में चुनाव आयोग के हाथ-पांव फूल जाते हैं। सरकार के अनुसार हमें ‘मेक इन इंडिया’ व ‘डिजिटल इंडिया’ में प्रवेश किए हुए लगभग ८ वर्ष हो चुके हैं लेकिन उस हिसाब से संचालन प्रक्रिया की उन्नति व धरातल पर सच्चाई शून्य सी लगती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक मामलों के जानकार हैं।)

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