मुख्यपृष्ठनए समाचारराहुल गांधी सही कह रहे हैं, चीन के सामने बोलती बंद है!

राहुल गांधी सही कह रहे हैं, चीन के सामने बोलती बंद है!

२,००० वर्ग किलोमीटर की भूमि पर ड्रैगन का कब्जा, मनोज जोशी की किताब खोलती है एलएसी की पोल
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दो दिनों के लिए लेह-लद्दाख पहुंचते ही केंद्र सरकार पर हमला करते हुए कहा कि चीन ने हमारी बहुत सी भूमि पर कब्जा कर लिया है। बहुत से लोगों ने इसे राहुल की राजनीतिक बयानबाजी मान लिया। मगर यह राजनीतिक बयानबाजी नहीं बल्कि सच है। करीब ढाई साल पहले हुए गलवान कांड के बाद इस क्षेत्र में करीब २,००० वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र ऐसा है, जहां पर हिंदुस्थानी सेना नहीं जा सकती, जबकि पहले वह वहां पेट्रोलिंग के लिए हमेशा जाती रही थी। इस बात का खुलासा मनोज जोशी ने अपनी पुस्तक में किया है।
मनोज जोशी की नई किताब ‘अंडरस्टैंडिंग द इंडिया-चाइना बॉर्डर: द एंड्योरिंग थ्रेट ऑफ वॉर इन हाई हिमालयास’ बताती है कि हिंदुस्थानी सेना अब कई ऐसे क्षेत्रों में गश्त नहीं लगा पाती, जहां वो पहले नियमित रूप से पहुंचती थी। पीएलए ने विवादित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचों का निर्माण किया है, जिसमें हवाई क्षेत्र, हेलीपैड, आवास, सड़क और पुल शामिल हैं, जिन्हें समय-समय पर सैटेलाइट इमेजरी द्वारा दर्ज किया गया है। इसे ही लेकर १५ जून २०२० को गलवान घाटी में संघर्ष में कई हिंदुस्थानी सैनिकों की मौत हुई थी।

घातक पीपी१४
गलवान का घातक संघर्ष पीपी१४ नाम की गश्त चौकी (पेट्रोलिंग पॉइंट) पर हुआ था। यह क्षेत्र तब तक विवादित नहीं था व वहां हिंदुस्थानी सेना नियमित गश्त लगाती थी। संघर्ष के कुछ दिनों बाद पीएम मोदी ने कहा था कि चीनियों ने ‘हमारी सीमा में घुसपैठ नहीं की है, और न ही उनके द्वारा किसी भी पोस्ट पर कब्जा किया गया है।’ यह मोदी सरकार की अपनी साख बचाने की कोशिश थी, जिसे चीन ने इस बात के सबूत के रूप में खुशी-खुशी पेश किया कि उसने कभी हिंदुस्थानी सीमा में अतिक्रमण किया ही नहीं।

बीजिंग है कि मानता नहीं
सितंबर २०२० में पीपी१५ से सेनाओं के पीछे हटने के बाद चीन ने यथास्थिति की बहाली से यह कहते हुए इनकार किया कि बीजिंग ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हिंदुस्थान के अवैध प्रवेश से बनी तथाकथित यथास्थिति’ को स्वीकार नहीं करता है। दोनों सेनाओं के कोर कमांडरों के बीच वार्ता में चीन लगातार देपसांग व डेमचोक के सैन्य रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर चर्चा करने से इनकार करता रहा है।

एलएसी की लंबाई पर विवाद
असल में एलएसी को न तो कभी नक्शे पर चिह्नित किया गया है और न ही दोनों देशों की ओर से जमीन पर इसका सीमांकन किया गया है। नई दिल्ली का कहना है कि दोनों देशों के बीच की सीमा ३,४८८ किलोमीटर लंबी है, जबकि चीन का कहना है कि इसकी लंबाई केवल २००० किलोमीटर के आसपास है। यह दुनिया की सबसे लंबी विवादित सीमा है। चूंकि कोई भी पक्ष इस बात पर सहमत नहीं है कि उनके द्वारा माना जाने वाला ‘वास्तविक नियंत्रण’ कहां समाप्त होता है, इसलिए दोनों ही एक निर्जन हिमालयी बंजर भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों पर लगातार अपना आधिपत्य जमाने के प्रयास में लगे रहते हैं।

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