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राज की बात : सरकारों और कॉर्पोरेट के खिलाफ गुस्सा… दुनियाभर में किसान कर रहे हैं आंदोलन

द्विजेंद्र तिवारी मुंबई

आखिर क्या बात है कि दुनियाभर के अन्नदाता ग़ुस्से में हैं और अपने-अपने देशों की व्यवस्थाओं अथवा सरकारों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं! हमारे देश में किसानों का आंदोलन हरियाणा-दिल्ली के पास तो चल ही रहा है, यूरोप जैसे तमाम विकसित देशों में भी किसान परेशान हैं और अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।
दुनियाभर के किसान सब्सिडी में कटौती से लेकर पर्यावरण नियमों तक विभिन्न मुद्दों के विरोध में लामबंद हो रहे हैं।
बेल्जियम, फ्रांस, जर्मनी और स्पेन जैसे कई यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में किसानों ने सब्सिडी में कटौती, ऊंची बिजली व र्इंधन दरों और सस्ते आयात का विरोध करने के लिए शहरों की ओर कूच किया और सुपर मार्वेâट घेर लिए। कुछ दिन पहले बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में ट्रैक्टर लेकर किसानों ने शहर का यातायात रोक दिया और सरकारी इमारतों पर गीली खाद फेंकी। वहां यूरोपीय संघ की इमारतों पर टमाटर और अंडे फेंके गए। २० फरवरी को ग्रीस के एथेंस में विशाल ट्रैक्टर जुलूस निकाला गया। पूर्वी प्रâांस में किसानों ने अपने ट्रैक्टर हाईवे पर धीमे चलाए और मीलों लंबा जाम लग गया।
यूरोप की सबसे बड़ी समस्या बिजली दरों और र्इंधन सब्सिडी में कटौती तो है ही, उनके सामने एक और बड़ी समस्या कार्बन उत्सर्जन पर रोक के लिए बनाए गए नियम भी हैं। २०५० तक शुद्ध और शून्य कार्बन उत्सर्जन प्राप्त करने की यूरोपीय संघ की कठोर पर्यावरण नीतियों का जबरदस्त विरोध है, जिसमें फसलों में कीटनाशकों में कमी और प्रकृति संरक्षण की अनिवार्य शर्तें शामिल हैं।
फ्रांसीसी किसानों ने सस्ते आयात और अपर्याप्त सब्सिडी का विरोध किया है। दक्षिण अमेरिका के देशों में आर्थिक मंदी और सूखे के कारण कई बड़े विरोध प्रदर्शन हुए। ब्राजील के किसान आनुवंशिक रूप से संशोधित मक्का की फसल को लेकर आक्रोशित हैं।
उत्तर और मध्य अमेरिका के कई देशों में विरोध प्रदर्शन हुए। मैक्सिको के किसान फसलों को मिल रही कम कीमतों का विरोध कर रहे हैं और कोस्टारिका के किसान कर्ज माफ करने और सरकारी सहायता की मांग कर रहे हैं।
अफ्रीका के कई देशों में खराब मूल्य निर्धारण और महंगी उत्पादन लागत के कारण विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। केन्या के आलू उत्पादक किसानों ने बेहतर कीमतों की मांग की और कैमरून के किसान कोको निर्यात प्रतिबंध का विरोध कर रहे हैं।
न्यूजीलैंड में भी पिछले दिनों किसानों ने सरकारी नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, जबकि ऑस्ट्रेलियाई किसानों ने प्रस्तावित हाई-वोल्टेज बिजली लाइनों का विरोध किया।
उपज की गिरती कीमतें, फसलों की बढ़ती लागत, कठोर नियम, शक्तिशाली खुदरा विक्रेता, कर्ज का बोझ, भूमि अधिग्रहण, जलवायु परिवर्तन और सस्ता आयात किसानों की समस्याओं की जड़ में हैं। पिछले कुछ दिनों में फ्रांस, इटली, रोमानिया, पोलैंड, ग्रीस, जर्मनी, पुर्तगाल और नीदरलैंड में किसान सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करते दिखे। ये केवल छिटपुट विरोध प्रदर्शनों के मामले नहीं हैं। यह एक बढ़ता हुआ वैश्विक आंदोलन है, जो दुनियाभर के किसानों को एक सूत्र में पिरो रहा है।
नीदरलैंड्स में डेयरी किसानों ने पिछले दिनों विरोध प्रदर्शन किया और राजमार्गों व सुपर मार्वेâटों को अवरुद्ध कर दिया। वे दूध की कम कीमतों का विरोध कर रहे थे और अपने श्रम के लिए उचित कीमत की मांग कर रहे थे।
इसी वर्ष २६ जनवरी को प्रâांस में लाखों किसानों ने देश के कई हाईवे और एयरपोर्ट की घेराबंदी करते हुए राजधानी पेरिस को घेर लिया था। अटलांटिक के पार, ब्राजील में, कृषि व्यवसाय में कब्जे की कोशिश में लगे पूंजीवादी कॉर्पोरेट दिग्गजों के खिलाफ छोटे किसान एकजुट हो रहे हैं। वे अपनी जमीनें हथियाए जाने की आशंका से ग्रस्त हैं।
इसी तरह किसान पूरे यूरोपीय संघ में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें बढ़ती लागत और करों, लालफीताशाही, अत्यधिक कठोर पर्यावरण नियमों और सस्ते खाद्य आयात से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, नीदरलैंड, पोलैंड, स्पेन, इटली और ग्रीस जैसे देशों में कई हफ्तों से प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रâांस के किसानों ने यूरोपीय संघ की लालफीताशाही, डीजल की कीमतों को बड़ी समस्या कहा है। किसानों को आय बढ़ाने के लिए अधिक सरकारी समर्थन की आवश्यकता है। इसी तरह सिंचाई की समस्या, कीटनाशकों के उपयोग पर अनावश्यक रोक से किसान परेशान हैं।
पोलैंड और रोमानिया के किसान यूक्रेन से हो रहे सस्ते आयात से काफी परेशान हैं। यूक्रेन को लेकर कई देशों के किसान परेशान हैं। इसी तरह चेक गणराज्य के किसानों ने नौकरशाही, सस्ते आयात और यूरोपीय संघ की कृषि नीति के मुद्दे उठाए हैं और त्वरित समाधान की मांग की है। स्पेन के किसानों ने ब्रुसेल्स समझौते में तैयार की गई नीति के मुद्दों को उठाया, जिसके बारे में उनका कहना है कि इससे फसलों की उर्वरता नष्ट हो जाती है। पुर्तगाल में किसानों ने अपर्याप्त सरकारी सहायता, सब्सिडी में कटौती और लालफीताशाही को बड़ी समस्या बताया।
बेल्जियम के किसानों ने ४ प्रतिशत भूमि को परती छोड़ने की यूरोपीय संघ की शर्त को बड़ा मुद्दा बताया है। ग्रीस के किसानों ने २०२३ की बाढ़ में फसल क्षति और पशुधन हानि के लिए अधिक सब्सिडी और त्वरित मुआवजे की मांग की। उन्होंने डीजल कर और बढ़ते बिजली बिल तथा गिरती सरकारी और यूरोपीय संघ सब्सिडी के मुद्दे भी उठाए।
हमारे देश के किसान भी एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग कर रहे हैं। वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (डब्लूटीओ) की किसान विरोधी नीतियों का विरोध कर रहे हैं। कर्ज माफी की मांग कर रहे हैं। दुनिया की बढ़ती आबादी और खाद्यान्नों की बढ़ती खपत के मद्देनजर दुनियाभर की सरकारों को किसानों पर विशेष ध्यान देना ही होगा। कार, विमान या मोबाइल न हों तो भी इंसान जिंदा रह सकता है। पर अगर किसान खेती से विमुख होने लगे तो दुनिया के कई देशों में खाद्यान्न का गंभीर संकट पैदा हो सकता है। देश के किसानों की भावनाएं केंद्र की भाजपा सरकार जितनी जल्दी समझ ले, उतना अच्छा है, क्योंकि हम दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश हैं। आजादी के बाद शुरू के वर्षों में देश की एक बहुत बड़ी आबादी भुखमरी और कुपोषण से जूझ रही थी। इस तथ्य को ध्यान में रखना आवश्यक है।
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और वर्तमान में राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हैं)

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