मुख्यपृष्ठस्तंभराज की बात: ऋण लेकर घी पी रही है भाजपा सरकार

राज की बात: ऋण लेकर घी पी रही है भाजपा सरकार

द्विजेंद्र तिवारी मुंबई

कई सौ वर्ष पहले चार्वाक नामक घोर नास्तिक और भौतिकवादी ऋषि हुआ करते थे, जिन्होंने यह प्रसिद्ध श्लोक लिखा था- यावज्जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत: अर्थात् जब तक जीवन है पूरे सुख के साथ जीना चाहिए, चाहे ऋण लेकर ही घी पीना पड़े। मरने के बाद शरीर नष्ट होकर राख बन जाता है तो मनुष्य का पुनरागमन (पुनर्जन्म) वैâसे संभव है। कर्ज लेकर घी पीने की इसी राह पर हमारे देश की केंद्र सरकार भी चल रही है। बैंकों का कर्ज लेकर विदेश भाग जाने वाले या सेटिंग से कर्ज माफ करवा लेने वाले उद्योगपतियों और कारोबारियों के किस्से तो आपने खूब सुने होंगे। पर लगभग १५ दिन पहले देश का हर नागरिक यह खबर पढ़कर और सुनकर भौंचक्का रह गया कि आजादी के अमृतकाल में देश पर २०५ लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। पिछले वित्त वर्ष की मार्च तिमाही में कुल कर्ज राशि २.३४ ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (२०० लाख करोड़ रुपए) थी। राज्य सरकारों का ऋण हिस्सा लगभग २४ प्रतिशत या ६०० अरब अमेरिकी डॉलर (५० लाख करोड़ रुपए) था।
अगर देश की आबादी लगभग १४० करोड़ है तो इसका मतलब यह हुआ कि आज पैदा हुए बच्चे सहित देश के हर वृद्ध, जवान, स्त्री, पुरुष पर लगभग १.४० लाख रुपये का कर्ज है। न बेरोजगारी दूर हुई, और न ही गरीबी। ऊपर से बिना उधार लिए देश की जनता को यह कर्ज चुकाना पड़ेगा। कहां तो देश की जनता अपने-अपने बैंक खातों में १५ लाख रुपए का इंतजार करते-करते थक चुकी है, तो दूसरी तरफ यह सनसनीखेज खबर सामने आ गई। इसीलिए दुष्यंत कुमार जी कह गए हैं- कहां तो तय था चरागां हर एक घर के लिए; कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए। चार्वाक भले ही नास्तिक रहे हों, लेकिन देश का बहुसंख्य हिंदू समाज कर्ज के मामले में बहुत ज्यादा संवेदनशील है। भगवान भी किसी की उधारी नहीं रखते। महातीर्थ तिरूपति बालाजी के बारे में मान्यता है कि भगवान ने विवाह के लिए कुबेर से सोना उधार लिया था। यह मान्यता है कि जब तक बालाजी कुबेर का ऋण नहीं चुका देते तब तक पृथ्वी लोक में ही रहना पड़ेगा। भगवान का कर्ज उतारने के लिए भक्तगण तिरूपति मंदिर में सोना चढ़ाते हैं।
शास्त्रों में भी कहा गया है कि मृत्यु के समय कोई कर्ज नहीं होना चाहिए। अन्यथा जीवात्मा को जीवन मृत्यु चक्र से मुक्ति नहीं मिलती। तमाम धर्म ग्रंथों में कर्ज को लेकर तमाम तरह की चेतावनियां दी गई हैं।
ऐसे में देश का हर नागरिक आशंकित और चिंतित है क्योंकि वह उस कर्ज का बोझ नहीं उठाना चाहता, जो उसने लिया ही नहीं है। तमाम अर्थविशेषज्ञों से लेकर आम जन यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर टैक्स का इतना सारा पैसा केंद्र सरकार के पास होते हुए भी कर्ज की नौबत वैâसे पैदा हुई। एक रुपए के माचिस से लेकर दो रुपए के बिस्किट पर गरीब से गरीब जनता जीएसटी के माध्यम से करोड़ों रुपए का टैक्स केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को देती है।
देश पर इतने लंबे चौड़े कर्ज को लेकर हमारे मन में यह सवाल उठता है कि आखिर ये पैसे गए कहां? इन पैसों का क्या किया? केंद्र सरकार ने ऐसी कौन सी ऐतिहासिक योजना लागू की है, जिससे देश की गरीबी और बेरोजगारी में कमी आई हो और कमजोर वर्गों को लाभ मिला हो? देश विदेश की संस्थाएं तक कर्ज की इस स्थिति को लेकर केंद्र सरकार को आगाह कर रही हैं।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भारत के ऋणों की दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर चिंता जताई है। इसने आगाह किया कि निकट भविष्य में सामान्य सरकारी ऋण भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के १०० प्रतिशत से अधिक होने की संभावना है। आईएमएफ ने यह भी कहा है कि आगे चलकर जलवायु परिवर्तन को देखते हुए और भी ज्यादा निवेश की आवश्यकता होगी। आगे दीर्घकालिक जोखिम अधिक हैं क्योंकि भारत के जलवायु परिवर्तन के कारण उपजी परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के समय काफी निवेश की आवश्यकता पड़ सकती है।
कर्ज की इतनी भारी भरकम राशि के बाद ध्यान में आता है कि केंद्र सरकार पिछले तीन चार वर्षों से लगातार देश के कुबेर के खजाने यानी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) पर दबाव बनाकर जरूरत से ज्यादा पैसा वसूलती रही है। कहा जाता है कि इसी दबाव का विरोध करते हुए रघुराम राजन और उर्जित पटेल ने गवर्नर पद से इस्तीफा दिया।
अगस्त २०१९ में भारतीय रिजर्व बैंक ने केंद्र सरकार को अपने खजाने से १.७६ लाख करोड़ रुपए दिए। यह अब तक की सबसे बड़ी राशि थी, जो केंद्र सरकार ने आरबीआई से लगभग जबरिया ले ली थी। इसे लेकर उस समय काफी विरोध भी हुआ। पर उसका कोई नतीजा नहीं निकला। उस समय कोविड संकट भी नहीं था कि ऐसी कोई इमरजेंसी होती। मई २०१९ के लोकसभा चुनाव में बड़ी सफलता हासिल करने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी विरोध की परवाह नहीं की। वैसे तो केंद्र सरकार को लाभांश देने का यह कार्य हर वर्ष होता है, लेकिन उसके कुछ नियम हैं। पर अब इन नियमों की कोई पूछ नहीं है। पिछले वर्ष ही मई २०२३ में आरबीआई ने केंद्र सरकार को ८७,४१६ करोड़ रुपए दिए। भारतीय जनता पार्टी के नेता यह कुतर्वâ दे सकते हैं कि आरबीआई की मालिक तो केंद्र सरकार ही है। इसलिए वह जन कल्याण के लिए पैसा लेती है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि आरबीआई ने वर्षों की बचत के बाद ऐसा खजाना तैयार किया है। यह नैतिक रूप से अस्वीकार्य है कि कोई भी सरकार अपने खर्च को पूरा करने के लिए इस तरह के पंâड का एक हिस्सा ले। बिमल जालान समिति ने बताया है कि यह राजकोषीय भंडार उन दिनों के लिए है, जब देश पर दुर्भाग्यपूर्ण वित्तीय संकट की स्थिति पैदा हो जाए। देश की जनता देख रही है कि पूंजीपतियों पर सरकार मेहरबान होकर लाखों करोड़ के कर्ज माफ कर रही है। दूसरी तरफ आम जनता को कर्जदार बनाया जा रहा है। अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने जैसे इन कदमों से आगे आने वाला समय संकट का हो सकता है। किसी शायर ने ठीक ही कहा है- मैंने मांगी थी उजाले की फकत एक किरन तुम से ये किस ने कहा आग लगा दी जाए
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और वर्तमान में राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हैं)

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