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राज की बात : चुनाव आयोग के दोहरे रवैये से विश्वास का संकट

द्विजेंद्र तिवारी
मुंबई

चुनाव आयोग ने एक बार फिर अपने दोहरे रवैये का परिचय दे दिया है। शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे को ‘जय भवानी’ जैसे पवित्र मंत्र का इस्तेमाल अपने प्रचार साहित्य में न करने का आदेश दिया गया है। चुनाव आयोग को विपक्षी नेताओं द्वारा बोले गए शब्दों पर तो तुरंत आपत्ति होती है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बयानों पर उसके कान खड़े नहीं होते।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी २०२४ के लोकसभा चुनाव में अपने भाषणों में धर्म का बार-बार उल्लेख कर रहे हैं, जो स्पष्ट रूप से आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है। प्रधानमंत्री ने पिछले एक चुनाव में खुलकर कहा था कि जय बजरंगबली कहकर वोट डालें। उस पर चुनाव आयोग ने आज तक संज्ञान नहीं लिया। अमित शाह ने मतदाताओं को राम लला के दर्शन कराने की बात कही। प्रश्न उठ रहे हैं कि चुनाव आयोग की भूमिका क्यों पक्षपातपूर्ण है। क्या मोदी और शाह के भाषण जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, १९५१ के तहत ‘भ्रष्ट आचरण’ नहीं हैं?
अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का रास्ता खोलने का काम सुप्रीम कोर्ट ने किया। मंदिर निर्माण आम श्रद्धालुओं के दान से हुआ। फिर भी भाजपा इस मामले पर राजनीति करने से बाज नहीं आ रही। मोदी अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण में अपनी सरकार की भूमिका का उल्लेख कर रहे हैं और विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के दलों पर इस मंदिर का विरोध करने का आरोप लगा रहे हैं।
आदर्श आचार संहिता राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए भारत के चुनाव आयोग द्वारा दिशा-निर्देशों का एक सेट है जो मतदान और प्रचार के दौरान आचरण के मानकों को निर्धारित करता है।
भारत में चुनाव जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, १९५१ के तहत होते हैं। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, १९५१ की धारा १२३ ( ३) के अनुसार, किसी उम्मीदवार या उसके एजेंट द्वारा किसी व्यक्ति को उसके धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट देने या वोट न देने की अपील करना भ्रष्ट आचरण है। इसके अलावा, धारा १२३ (३ए) में यह भी कहा गया है कि किसी उम्मीदवार या उसके एजेंट द्वारा भारत के नागरिकों के विभिन्न वर्गों के बीच धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर दुश्मनी या घृणा की भावनाओं को बढ़ावा देना या बढ़ावा देने का प्रयास करना भी भ्रष्ट आचरण है। चुनाव के दौरान किए गए किसी भी गलत काम को चुनाव के बाद जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, १९५१ की धारा १०० के तहत चुनाव याचिका के माध्यम से अदालत में चुनौती दी जा सकती है। यह निर्णय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास है कि कोई भाषण आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करता है या नहीं। यदि चुनाव आयोग कार्रवाई नहीं करता है, तो एकमात्र सहारा अदालतें होती हैं, जहां जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव समाप्त होने के बाद मामला उठाया जा सकता है।
इसी तरह अगर किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार द्वारा यह अपील की जाती है कि अमुक दल या उम्मीदवार हिंदू मान्यताओं का पालन नहीं करते हैं, तो इसे भी धर्म की अपील के रूप में माना जा सकता है। यहां तक ​​​​कि यह कहना कि विपक्ष ने राम मंदिर का विरोध किया या हमने रामलला को एक भव्य मंदिर में स्थानांतरित कर दिया, इसे केवल उपलब्धियों का बयान नहीं कहा जा सकता, बल्कि इसे बहुसंख्यकों की धार्मिक भावनाओं को सीधे प्रभावित करना माना जा सकता है। इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना जा सकता है।
चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने अपने भाषणों में राम मंदिर का जिक्र किया। उदाहरण के लिए, एक पखवाड़े पहले उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में एक रैली में मोदी ने विपक्षी दलों पर रामलला का अपमान करने का आरोप लगाया।
‘इंडी गठबंधन दलों ने हमेशा राम मंदिर निर्माण से नफरत की है और आज भी नफरत करते हैं। मंदिर निर्माण को रोकने के लिए अदालतों में जो कुछ भी कर सकते थे, किया। लेकिन जब देश के लोगों ने मंदिर निर्माण में योगदान दिया और जब मंदिर निर्माण से जुड़े लोगों ने गठबंधन के नेताओं के सभी पापों को माफ कर दिया और प्राण प्रतिष्ठा में सम्मान के साथ आमंत्रित किया, तो उन्होंने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया और राम लला का अपमान किया।’
इसी तरह बिहार के नवादा में एक अन्य रैली में मोदी ने एक बार फिर राम मंदिर निर्माण का जिक्र किया और लोगों से ऐसे पाप करने वालों को न भूलने का आह्वान किया। इतने स्पष्ट रूप से धार्मिक विषय को चुनावी भाषण में लाए जाने के बाद भी क्या कोई शक है कि यह आचार संहिता के उल्लंघन का मामला नहीं है? क्या चुनाव आयोग को इससे ज्यादा सबूत की जरूरत है?
१९८७ में शिवसेना के संस्थापक स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे को अदालत के एक पैâसले के बाद मताधिकार से वंचित कर दिया गया था। हिंदुओं से हिंदुओं को वोट देने के लिए कहने पर उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था और छह साल के लिए मताधिकार से वंचित कर दिया गया था, लेकिन मोदीजी के भाषणों पर चुनाव आयोग ने तो कानों में तेल डालकर आंखें मूंद ली हैं।
उल्लेखनीय है कि अगस्त २०२० में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने इस्तीफा दे दिया था। तीन सदस्यीय आयोग में अकेले लवासा ने ही यह राय रखी थी कि मोदी ने २०१९ के आम चुनाव के लिए प्रचार करते समय आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया था। क्या लवासा जैसे हश्र से चुनाव आयोग के सदस्य भयभीत हैं?
पूरी दुनिया में हमारे देश की चुनाव प्रक्रिया की तारीफ होती रही है। इतनी बड़ी आबादी का मतदान शांतिपूर्वक कराना बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह चुनाव आयोग काम कर रहा है, उससे दुनिया का ध्यान इस बहुप्रशंसित संस्था के कार्यकलाप पर गया है। यह भारत की वैश्विक विश्वसनीयता पर बड़ा संकट है। इसे हलके में नहीं लिया जा सकता। इससे विदेशी निवेश पर गंभीर परिणाम पड़ सकता है और देश की अर्थ व्यवस्था को नुकसान पहुंच सकता है। लगता है कि मोदी और उनकी टीम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के इन शब्दों को भूल गई है- सरकारें आएंगी जाएंगी, पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी, मगर यह देश रहना चाहिए।
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और वर्तमान में राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हैं)

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