मुख्यपृष्ठस्तंभराज की बात : आरएसएस पर हावी होने की कोशिश में मोदीजी!

राज की बात : आरएसएस पर हावी होने की कोशिश में मोदीजी!

द्विजेंद्र तिवारी मुंबई

पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के एक बयान ने राजनीतिक क्षेत्रों में भूचाल ला दिया। उन्होंने कहा कि आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सांस्कृतिक सामाजिक संस्था है और पहले भाजपा को उसकी ज्यादा जरूरत हुआ करती थी। अब उसकी उतनी जरूरत नहीं है। भाजपा अब सक्षम हो चुकी है। उनके इस बयान के बाद इस तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या भाजपा ने अपनी जननी आरएसएस से धीरे-धीरे नाता ख़त्म करने का प्लान बना लिया है? क्या यह अब पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके करीबियों की भजन मंडली का एक निजी संगठन बनने जा रहा है?
दरअसल बिना आग के धुआं नहीं उठता है। इस लोकसभा चुनाव में बड़ी बेरहमी से टिकट काटे गए और एकदम से अनजान लोगों पर मोदी जी की कृपा बरसी। स्वर्गीय प्रमोद महाजन की पुत्री पूनम का टिकट काटा गया। सर्वेक्षण के नाम पर यह बात पैâलाई गई कि कई सांसदों का कार्य अपने क्षेत्र में संतोषजनक नहीं रहा। इसलिए उनके टिकट काटे गए। जिस दिल्ली में पिछले दस वर्षों से मोदी जी रहते हैं, वहां भी ६ सांसदों ने इतना खराब काम किया कि उनके टिकट काटने पड़े। जिस गुजरात पर मोदी जी और अमित शाह की सीधी नजर रहती है, वहां भी कुछ सांसद ‘नाकारा’ निकले और उनके टिकट काटे गए। यानी दीपक तले अंधेरा। क्या कभी मोदीजी और शाह ने उनके कामकाज की खोज-खबर ली? महाराष्ट्र में तो अपने सहयोगी दलों तक के सिटिंग सांसदों के टिकट कटवा दिए। नागपुर लोकसभा सीट से नितिन गडकरी जैसे आरएसएस के समर्पित स्वयंसेवक का टिकट भी पहले दौर में घोषित नहीं किया गया।
इस तथाकथित सर्वेक्षण को लेकर भी तरह-तरह की कहानियां सामने आ रही हैं। कई ऐसे भी लोगों के टिकट काटे गए जो जमीनी नेता थे और आरएसएस के स्तंभ माने जाते थे। आमतौर पर पार्टी या सरकार के मामलों में आरएसएस द्वारा दिए गए सुझावों को भाजपा सुनती है। संबंधों को बेहतर बनाने के लिए उनके पास संपर्क सूत्र भी होते हैं। ऐसा लगता है कि ये सारे संपर्क सूत्र बुरी तरह फेल हो गए अथवा वे मोदी की भजन मंडली के प्रभाव में आकर निष्प्रभावी हो गए।
भाजपा का दावा है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है और उसके पास लगभग १८ करोड़ सदस्य हैं, जबकि आरएसएस के पास लगभग ५० लाख कार्यकर्ता हैं। भाजपा के कई नेता कभी आरएसएस के प्रचारक या कार्यकर्ता थे। मोदीजी आज भी खुद को प्रचारक मानते हैं। लेकिन उनके अंदर का आरएसएस का प्रचारक दूर-दूर तक नजर नहीं आता। उनके आसपास के शक्तिशाली लोगों ने उन्हें शायद प्रचारक के चोले से दूर कर दिया है।
राजनीति के तटस्थ पर्यवेक्षकों की राय है कि २०१९ के लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त कामयाबी के बाद से मोदी जी अति आत्मविश्वास से लबरेज हैं, जिसका नतीजा है कि भाजपा और आरएसएस के बीच आपसी संबंधों में दूरी बढ़ने लगी। मोदीजी के दूसरे कार्यकाल में भाजपा के बड़े नेता और शीर्ष सरकारी अधिकारी ज़मीनी स्वयंसेवकों की आवश्यक मांगों को नहीं सुनते थे। मौजूदा हालात, जैसे महंगाई और बेरोजगारी से भी स्वयंसेवक खुश नहीं हैं, क्योंकि जमीनी काम के दौरान उनके पास कोई जवाब नहीं होता। आरएसएस अपने स्वयंसेवकों को इस तरह से प्रशिक्षित करता है कि वे देश के लिए अपनी बड़ी या छोटी सेवा देने के बदले कुछ भी उम्मीद न करें। भाजपा और आरएसएस के करीबियों का दावा है कि बहुत कम ही स्वार्थी कार्यकर्ता मिलेंगे। यह एक सर्वविदित रहस्य है कि भाजपा के प्रत्येक केंद्रीय मंत्री के पास संघ द्वारा भेजा गया एक सदस्य निजी स्टाफ का हिस्सा होता है, जो आमतौर पर ओएसडी या निजी सहायक बनाया जाता है। यह भी सर्वविदित तथ्य है कि भाजपा में संगठन महासचिव हमेशा संघ से होता है। प्रश्न यह उठता है कि इस सिस्टम के बावजूद विवाद की लकीरें गहरी क्यों होती जा रही हैं?
नरेंद्र मोदी सीधे मतदाताओं से संपर्क में रहना पसंद करते हैं। अपने और मतदाता के बीच आने वाली किसी भी चीज को वे बाधा मानते हैं। मोदीजी के फोटो और वीडियो बनाने के कई मौकों पर ऐसा देखा जा चुका है। यह मोदी जी का नया दर्शन है। मोदी-केंद्रित सार्वजनिक प्रचार और चुनाव अभियान में बहुत सारे नेताओं की भूमिका बहुत कम है। तकनीक और विशेषज्ञों की फौज के साथ, पूरी कमान अब मोदी जी के हाथ में है। स्थानीय स्तर पर, पारंपरिक आरएसएस और भाजपा कार्यकर्ताओं को पन्ना प्रमुख, बूथ प्रभारी और इसी तरह के अन्य कामों में उलझा दिया गया है। सभी लाभदायक पदों पर चतुर लोगों ने कब्जा कर लिया है, जो हमेशा अपने पद का उपयोग अपने व्यवसायिक करियर को बढ़ाने के लिए करते हैं। ऐसे तत्वों के कारण आरएसएस के समर्पित पारंपरिक कार्यकर्ता धीरे-धीरे भाजपा से दूर होते जा रहे हैं।
मोदी जी को जमीनी नेताओं से परहेज है। भाजपा के पुराने दिनों में, ऐसे नेताओं को भाजपा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता था। लेकिन मोदी जी की राजनीति में वे परेशान करने वाले और संभावित चुनौती देने वाले माने जाने लगे हैं। इसलिए उन्होंने वरिष्ठ मुख्यमंत्रियों को हटा दिया। वसुंधरा राजे सिंधिया, डॉ रमन सिंह, शिवराज सिंह चौहान इसके उदाहरण हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनकी फायरिंग रेंज में बताए जा रहे हैं। हटाए गए लोगों की जगह नए चेहरों ने ले ली है। मोदी युग एक विचित्र विरोधाभास भी प्रस्तुत करता है। भाजपा और आरएसएस की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि मोदी स्वयं को हिंदुत्व का सबसे बड़ा पुरोधा साबित करने के अभियान में लगे हुए हैं। यह कहा जाने लगा है कि मोदीजी आरएसएस पर हावी होने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा के हिंदुत्व का केंद्र धीरे-धीरे नागपुर से नई दिल्ली की ओर ले जाने का प्रयास किया जा रहा है। भाजपा के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और आरएसएस के संबंधों पर विचार करें तो उन्होंने आरएसएस के महत्व को नकारने की कभी कोशिश नहीं की। भाजपा के मोदी युग में यह मर्यादा दम तोड़ रही है।

(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और वर्तमान में राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हैं)

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