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राज की बात : अगली बार सात सौ पार… लोकसभा सीटों के परिसीमन का नया खेल

द्विजेंद्र तिवारी मुंबई

भाजपा २०२४ में केंद्र में फिर सत्ता में आने के लिए तमाम दांव आज़मा रही है। ईडी से लेकर विपक्षी नेताओं के दल बदल का इस्तेमाल कर रही है। दो तिहाई बहुमत यानी ३७० सीटों का नारा लगा रही है। इसे भाजपा का सिर्फ चुनावी जुमला न समझें। भाजपा की नजर २०२६ के बाद सीटों की संख्या और परिसीमन पर है। इससे वर्ष २०२६ से वर्ष २०२९ के बीच जबर्दस्त राजनीतिक टकराव और बवाल की आशंका पैदा हो रही है।
सन् १९५१-५२ में चार महीने चले प्रथम लोकसभा चुनाव में कुल ४८९ सीटें थीं और कुल १७.३० करोड़ मतदाता थे। इसके बाद के लोकसभा चुनावों में सीटों की संख्या में थोड़ा- थोड़ा इजाफा होता गया। आखिर में यह संख्या ५४३ तक पहुंची, जिसे १९७६ में २५ वर्षों के लिए प्रâीज कर दिया गया। २००१ में अगले २५ वर्षों के लिए फिर से सीटों की वृद्धि पर रोक लगा दी गई।
लोकसभा की सीटों के लिए १९७१ की जनगणना को ही आधार बनाया गया है। इसका मुख्य कारण राज्यों के बीच असमान जनसंख्या वृद्धि है। भारत के सबसे विकसित और समृद्ध राज्य परिवार नियोजन में सफल रहे हैं, जबकि गरीब राज्यों में ऐसा नहीं हुआ। यह रोक इस बात को सुनिश्चित करने के लिए थी, ताकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को सीटों का नुकसान न उठाना पड़े। लेकिन २०२६ के बाद जब यह समयसीमा समाप्त होगी तो भारत के सबसे गरीब और सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों की सीटों में एक बड़ा बदलाव होगा, जिससे दक्षिण के कई राज्यों के बीच बहुत नाराजगी पैदा होगी जो राजनीतिक व आर्थिक शक्ति और प्रभाव खो देंगे।
दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में भारत की नई स्थिति और लोकसभा में ८८८ सीटों की क्षमता वाले नए संसद भवन के निर्माण ने लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए एक नए परिसीमन आयोग की स्थापना की चर्चाएं शुरू कर दी हैं। जिस तरह मोदी ने नए संसद भवन के निर्माण में दिलचस्पी दिखाई, उससे इस संभावना को बल मिलता है कि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर अब मोदी सरकार का सबसे ज्यादा ध्यान है।
१४० करोड़ से ज्यादा की वर्तमान जनसंख्या के अनुसार, यदि सीटों को पुराने फॉर्मूले के अनुसार वितरित किया जाता है, तो लोकसभा सीटों की संख्या ८४८ हो जाएगी, जिसमें उत्तर प्रदेश को १४३ सीटें मिलेंगी, जबकि केरल में उतनी ही यानी २० सीटें बनी रहेंगी।
आबादी का आनुपातिक प्रतिनिधित्व भारत के संविधान में निहित है, जो लोकसभा में सीटों के आवंटन को नियंत्रित करता है। अनुच्छेद ८१ के अनुसार प्रत्येक राज्य को उसकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें प्राप्त हों और उन सीटों को लगभग समान आकार के निर्वाचन क्षेत्रों में आवंटित किया जाए। भारत के केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं है- संसद उनकी सीटों के आवंटन का पैâसला कर सकती है। ६० लाख से कम आबादी वाले राज्यों के लिए (१९७३ में इकतीसवें संशोधन के अनुसार) भी यही नियम लागू है।
इन सीटों को आनुपातिक रूप से विभाजित करने के लिए संविधान का अनुच्छेद ८२ अद्यतन जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों के पुन: आवंटन करने संबंधी नियम है।
२००२ में संसद ने चौरासीवें संशोधन को पारित किया और १९७६ में लगाई गई रोक को २०२६ के बाद अगली दशकीय जनगणना (जो २०३१ में होगी) तक बढ़ा दिया। हालांकि, सत्तासीवें संशोधन (२००३) ने २००१ की जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर राज्यों के भीतर लोकसभा क्षेत्रों के परिसीमन की अनुमति दे दी। इसमें प्रत्येक राज्य की कुल सीटों की संख्या में बदलाव नहीं किया गया था। इस संशोधन के बाद मुंबई में छह लोकसभा सीटों की भौगोलिक संरचना में काफ़ी बदलाव हुआ। उत्तर मुंबई लोकसभा सीट से वसई-विरार को हटा दिया गया और इस तरह मुलुंड और दहिसर की मुंबई सीमा के अंदर ही मुंबई की सभी छह लोकसभा सीटों के क्षेत्र तय कर दिए गए। इस परिवर्तन का चुनाव परिणाम पर भी व्यापक असर दिखा।
अगर वर्तमान आबादी को आधार बनाएं और संविधान के अनुसार परिसीमन करें तो २०२६ में कर्नाटक में लोकसभा सीटें २८ से बढ़कर ३६, तेलंगाना में सीटों की संख्या १७ से बढ़कर २०, आंध्र प्रदेश में २५ से बढ़कर २८ और तमिलनाडु में ३९ से बढ़कर ४१ हो जाएगी।
केरल का मामला, जिसने जनसंख्या वृद्धि को सबसे अच्छे तरीके से नियंत्रित किया है, विलक्षण होगा। इसकी लोकसभा सीटों की संख्या २० ही रहेगी।
इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में सीटों की संख्या ८० से बढ़कर १२८ हो जाएगी। तेजी से बढ़ती आबादी वाले राज्य बिहार में मौजूदा ४० के बजाय ७० सीटें होंगी। मध्य प्रदेश में वर्तमान में २९ लोकसभा सीटें हैं, जो परिसीमन के बाद ४७ हो जाएंगी। महाराष्ट्र में परिसीमन के बाद ४८ से ६८ व राजस्थान में २५ से बढ़कर ४४ सीटें हो जाएंगी।
लोकसभा में वर्तमान ५४३ सीटों से सीधे ८४८ सीटें भले ही न की जाएं, पर अगर सीटों की संख्या ६५० से ७०० के बीच भी की गई तो आनुपातिक रूप से हिंदी पट्टी के राज्यों में सबसे ज्यादा सीटें बढ़ेंगी। भाजपा को भ्रम है कि हिंदी पट्टी के राज्यों की सीटें ब्ाढ़ाने से उन्हें फायदा होगा। अगर ऐसा हुआ तो देश के उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के बीच भारी विवाद होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
संभावना पूरी है कि भाजपा सीटों की संरचना में भी मनमानी बदलाव करेगी। भाजपा जातिगत और धार्मिक समीकरण को साधते हुए हर लोकसभा क्षेत्र में नई तरह की सीमा बनाने का प्रयास करेगी। अगर रूस के राष्ट्रपति पुतिन पर आजीवन पद पर बने रहने की व्यवस्था करने के आरोप लग रहे हैं तो मोदी पर भी ऐसी ही सोच लेकर रणनीति बनाने के आरोप गलत नहीं हैं। यह भी ध्यान में रखने की जरूरत है कि अगर सौ या डेढ़ सौ सीटों का इजाफा होगा तो तगड़े उम्मीदवार भी तो चाहिए। कांग्रेस और अन्य दलों से आयातित नेता भविष्य की इसी रणनीति का हिस्सा तो नहीं?
विपक्षी दल और इंडिया गठबंधन अगर मोदी का विजय रथ रोकने में कामयाब नहीं हुए तो २०२६ के बाद भी चुनाव तो होंगे, पर नतीजे देश और दुनिया को पहले से पता होंगे। इंडिया गठबंधन के नेताओं के लिए वक्त बहुत कम है।
(लेखक कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और वर्तमान में राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हैं)

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