मुख्यपृष्ठस्तंभराज की बात : अबकी बार, दो सौ पर ढेर!

राज की बात : अबकी बार, दो सौ पर ढेर!

-क्या है भाजपा के हसीन सपनों की हकीकत

द्विजेंद्र तिवारी, मुंबई

महाराष्ट्र में भाजपा की जमीन खिसक चुकी है। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव में करारी हार मिली है और दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भाजपा के पैर ही नहीं जम पाए हैं। पिछले लोकसभा चुनाव और मई व नवंबर २०२३ के विधानसभा चुनाव सहित तमाम आंकड़ों पर गौर करें तो चार सौ का यह आंकड़ा मुंगेरीलाल के हसीन सपने से ज्यादा कुछ नहीं लगता। इसी बौखलाहट में महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस में तोड़फोड़ की। बिहार में नीतिश कुमार को अपने पाले में लाने की हड़बड़ाहट हार के खौफ का नतीजा है। कुछ और पुराने साथियों को गठबंधन में शामिल करने की कोशिश भाजपा कर रही है।

कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को आह्वान किया था कि इस बार १० प्रतिशत ज्यादा वोट लाने के लिए मेहनत करें। २०१९ के लोकसभा चुनाव में भाजपा को ३७.३६ प्रतिशत वोट मिले थे। सहयोगी दलों सहित भाजपा को कुल ४४.८७ प्रतिशत वोट मिले थे। भाजपा इन आंकड़ों को ५० प्रतिशत के आगे ले जाने का ख्वाब देख रही है। इसलिए भाजपा ने नया नारा दिया है- अबकी बार, चार सौ पार। लेकिन चार सौ सीटों पर जीत के लक्ष्य का यह आंकड़ा क्या वाकई भारतीय जनता पार्टी के लिए इतना आसान है?
खासकर तब जब महाराष्ट्र में भाजपा की जमीन खिसक चुकी है। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव में करारी हार मिली है और दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भाजपा के पैर ही नहीं जम पाए हैं। पिछले लोकसभा चुनाव और मई व नवंबर २०२३ के विधानसभा चुनाव सहित तमाम आंकड़ों पर गौर करें तो चार सौ का यह आंकड़ा मुंगेरीलाल के हसीन सपने से ज्यादा कुछ नहीं लगता।
इसी बौखलाहट में महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस में तोड़फोड़ की। बिहार में नीतिश कुमार को अपने पाले में लाने की हड़बड़ाहट हार के खौफ का नतीजा है। कुछ और पुराने साथियों को गठबंधन में शामिल करने की कोशिश भाजपा कर रही है।
जिन सीटों पर भाजपा के पास जीतने योग्य उम्मीदवार नहीं हैं, वहां आयातित दलबदलुओं को उतारने की पार्टी की योजना है। २०१९ के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ५४३ में से ४३७ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। ३०३ विजयी रहे और १३४ उम्मीदवार हार गए। मतलब लगभग ३० प्रतिशत भाजपा उम्मीदवार हार गए। इसमें भी ५१ उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। ११ सीटों पर कुल मतदान के एक प्रतिशत से भी कम अंतर से भाजपा उम्मीदवार जीते। भाजपा की ये सीटें खतरे में हैं। उत्तर प्रदेश की १४ सीटों सहित देश की कुल ४२ सीटों पर भाजपा उम्मीदवार ५ प्रतिशत से भी कम अंतर से चुनाव जीते। इन ५३ सीटों पर संयुक्त विपक्ष इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी भाजपा उम्मीदवारों पर भारी पड़ेंगे। अब बताइए, वैâसे होगा भाजपा का बेड़ा पार और आंकड़ा चार सौ पार?
दक्षिण भारत के तीन राज्यों तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और यूनियन टेरिटरी पुडुचेरी की कुल ८५ सीटों पर पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के सारे उम्मीदवार हार गए थे। कर्नाटक में पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने २८ में से २५ सीटें जीतीं, लेकिन मई २०२३ के विधानसभा चुनाव में हार के बाद वहां की आबोहवा बदल चुकी है। तेलंगाना में पिछले लोकसभा चुनाव में जीतीं चार लोकसभा सीटें बचाए रखना भी भाजपा को इस बार मुश्किल होगा। दक्षिण भारत के इन पांच राज्यों और एक यूनियन टेरिटरी की कुल १३० सीटों में से जीती गई तीस सीटें भी बचाए रखना भाजपा के लिए टेढ़ी खीर होगा। इसका मतलब यह हुआ कि यहां से ही सौ से ज्यादा सीटों का नुकसान भाजपा को होने वाला है। राजस्थान में नवंबर २०२३ के विधानसभा चुनाव में पड़े भाजपा विरोधी वोटों का असर लोकसभा चुनाव में दिखाई पड़ेगा। महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल में भाजपा पहले से ही कमजोर नजर आ रही है और वहां कोई राजनीतिक समीकरण सही नहीं बैठ रहा है। यानी भाजपा जिन लगभग ४५० सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी, उसमें से सौ से ज्यादा सीटों पर तो दक्षिण में ही हार रही है। तो ऊपर लिखे गए आंकड़े ५३ और इस सैकड़े को जोड़ें तो भाजपा और उसके सहयोगी दल २०० से आगे बढ़ते दिखाई नहीं पड़ते। इनमें से १४४ सीटें ऐसी हैं, जहां भाजपा ने पिछले तीन चुनावों में जीत हासिल नहीं की है। तो क्या भाजपा ५४३ में से बाकी बची सभी ४०० सीटों पर जीतने का ख्वाब पाल रही है?
भाजपा के रणनीतिकार यह पुड़िया छोड़ रहे हैं कि हिंदुओं का ८० फीसदी वोट हासिल करने से उन्हें प्रधानमंत्री द्वारा निर्धारित ५० फीसदी वोट पाने का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी। ८० प्रतिशत हिंदू वोट प्राप्त करने का मतलब होगा कि भाजपा को लगभग ५० से ६० प्रतिशत के बीच वोट मिलेंगे, जिससे ४०० का आंकड़ा पार किया जा सकता है। मतलब यह कि बाकी राजनीतिक दलों को हिंदुओं के सिर्फ २० प्रतिशत वोट ही मिलें, ऐसी रणनीति बनाई जा रही है। क्या ऐसा होना संभव है? धर्म के आधार पर इतना तगड़ा ध्रुवीकरण तो कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता।
अगर २०२४ के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को हर विधानसभा क्षेत्र में ठीक उतने ही वोट मिलें, जितने नवंबर २०२३ के विधानसभा चुनाव में मिले थे, तो राजस्थान में भाजपा को केवल १५ सीटें, छत्तीसगढ़ में ९ सीटें, मध्य प्रदेश में २४ सीटें और तेलंगाना में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिलेगी।
कुल मिलाकर इन राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों के मुताबिक, लोकसभा की ८२ सीटों में से बीजेपी को ४८ सीटें मिल सकती हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में इनमें से ६६ सीटों पर जीत मिली थी। मतलब भाजपा को १८ सीटों का नुकसान हो सकता है।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की ६५ सीटों में से भाजपा के खाते में पहले से ही ६१ सीटें हैं। इसका मतलब है कि बीजेपी की चुनौती इन सभी सीटों को बरकरार रखना है और यदि संभव हो तो तेलंगाना में जीती गई चार सीटों में इजाफा करना है। दूसरी ओर, कांग्रेस सहित संयुक्त विपक्ष के पास इन राज्यों में खोने के लिए कुछ भी नहीं है। दो चार प्रतिशत वोटों के इधर-उधर खिसकने पर भाजपा के ६१ का यह आंकड़ा १६ में भी बदल सकता है। राष्ट्रीय चुनाव के नजरिए से देखें तो भाजपा को मई और नवंबर २०२३ में हुए राज्य विधानसभा चुनावों में वोट प्रतिशत में कोई फायदा नहीं हुआ है। उत्तर प्रदेश में मजबूत विपक्ष के कारण भाजपा का आंकड़ा और गिर सकता है। रायबरेली का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ कांग्रेस नेता सोनिया गांधी करती हैं, वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव मैनपुरी से सांसद हैं। राज्य की ये सीटें बीजेपी के लिए कठिन हैं।
तो सवाल फिर वही, किस बूते भाजपा ‘अबकी बार, चार सौ पार’ का सपना देख रही है? ऐसा हो सकता है कि चार सौ सीटों पर ऐसा कोई चमत्कार हो जाए कि मतदाता कोई भी बटन दबाएं, वोट कमल की ही झोली में गिरे। क्या इसी चमत्कार के बूते यह नारा लग रहा है?
(लेखक कई पत्र पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं और वर्तमान में राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हैं।)

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