मुख्यपृष्ठराजनीतिउत्तर की बात : मायावती जल्दबाजी में नहीं लेंगी कोई फैसला

उत्तर की बात : मायावती जल्दबाजी में नहीं लेंगी कोई फैसला

राजेश माहेश्वरी

राजनीतिक गलियारों में बीते कुछ वक्त से ये सवाल पूछा जा रहा है कि मायावती आनेवाले आम चुनावों में किस गठबंधन के साथ जाएंगी? बसपा सुप्रीमो मायावती ने साफ कर दिया है कि २०२४ के चुनाव के लिए वो किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेंगी। न तो वह इंडिया गठबंधन के साथ जाएंगी और न ही वह एनडीए के साथ जाएंगी। बसपा प्रमुख मायावती ने २०२४ चुनाव को लेकर पार्टी की रणनीति सोशल मीडिया पर बताई है।
मायावती ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘बसपा आगामी लोकसभा और चार राज्यों में विधानसभा चुनाव अकेले लड़ेगी।’ गौरतलब है कि ३१ अगस्त और एक सितंबर को इंडिया गठबंधन की बैठक मुंबई में होने जा रही है। इस एलान के बाद इंडिया गठबंधन में थोड़ी निराशा जरूर है क्योंकि वे चाहते थे कि उत्तर प्रदेश में दलितों को साधने के लिए मायावती को अपने साथ ले लें लेकिन मायावती के इनकार के बाद अब उन्हें इसके लिए दूसरी रणनीति बनानी होगी।
राजनीतिक लिहाज से ८० लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश आम चुनाव के लिहाज से सबसे बड़ा राज्य है। एक अनुमान के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में २१ फीसदी आबादी दलितों की है और दलितों के बीच मायावती की अच्छी पैठ मानी जाती है। ऐसे में मायावती का सियासी कदम क्या होगा इस पर सबकी नजरें हैं।
बहुजन समाज पार्टी प्रदेश की सत्ता से साल २०१२ से बाहर है। चुनाव दर चुनाव बसपा का वोट प्रतिशत तो गिरा ही है, वहीं उसके विधायकों की गिनती भी एक पर सिमट गई है। २०१९ का लोकसभा चुनाव मायावती ने सपा के साथ मिलकर लड़ा था, इसका लाभ भी बसपा को हुआ। लेकिन २०२२ के विधानसभा चुनाव में बसपा और सपा का गठबंधन कायम नहीं रहा और बसपा का एकमात्र विधायक ही विधानसभा की चौखट लांघ सका। ऐसे में २०२४ का लोकसभा चुनाव बसपा के लिए करो या मरो वाली स्थिति बना हुआ है। ऐसे में वो एक-एक निर्णय बड़े सोच-विचार करने के साथ ले रही है। प्रदेश की राजनीति की समझ रखनेवालों के अनुसार, मायावती के किसी गठबंधन का हिस्सा न बनने की एक खास वजह ये भी है कि बसपा का वोट बैंक ऐसा है कि वह खुलकर भाजपानीत एनडीए के साथ नहीं जा सकतीं और अंदर ही अंदर बीजेपी ये चाहती है कि मायावती इस चुनाव में अकेले ही रहें ताकि इससे इंडिया गठबंधन का वोट कटे।
चुनावी आंकड़ों के हिसाब से ये कहा जा सकता है कि मायावती का वोट बैंक छिटक रहा है, वो आज उतनी मजबूत नहीं हैं, जितनी किसी जमाने में हुआ करती थीं। लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञ ये भी मानते हैं कि मायावती इतना दम जरूर रखती हैं कि वो आनेवाले चुनाव में गठबंधन को नुकसान पहुंचा सकें। भले ही अभी मायावती ने ये कह दिया है कि वो आगामी आम चुनाव अकेले लड़ेंगी लेकिन बसपा पर नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि वो अपने पत्ते तब खोलेंगी जब चुनाव और करीब होगा।
वास्तव में मायावती जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मायावती अकेले चुनाव लड़ने की बात इसीलिए कर रही हैं, क्योंकि बसपा की सियासी हैसियत फिलहाल ऐसी नहीं है, जिसे दम पर गठबंधन में बार्गेनिंग कर सकें। बसपा के पास यूपी में एक विधायक है। इस आधार पर वैâसे सीट शेयरिंग के फॉर्मूले पर बात कर सकेंगी। मायावती दूसरे दलों के नेता की तरह नहीं हैं कि वो गठबंधन में शामिल होकर सिर्फ सीट लेकर चुनाव लड़ जाएं। मायावती किसी भी गठबंधन का हिस्सा तभी बनेंगी, जब उन्हें अहम रोल में रखा जाए। लोकसभा चुनाव से पूर्व चार राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में मायावती चुनाव वाले राज्यों में बेहतर प्रदर्शन के दम पर गठबंधन में शामिल होने पर सौदेबाजी और हिस्सेदारी की स्थिति में आ सकती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मायावती भले ही यह बात कह रही हों कि गठबंधन का सियासी लाभ बसपा को नहीं मिलता है, लेकिन चुनावी आंकड़े बता रहे हैं कि गठबंधन की सियासत बसपा के लिए हमेशा मुफीद रही है। बसपा ने तीन बार उत्तर प्रदेश में अलग-अलग दलों के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरी, जिसमें उसे हर बार लाभ ही नहीं बल्कि सूबे में सत्ता की बुलंदी तक पहुंचाया। इसके अलावा यूपी से बाहर बसपा ने पंजाब से छत्तीसगढ़ तक गठबंधन कर चुनाव लड़ी तो राजनीतिक फायदा मिला है। बसपा चुनाव के बाद गठबंधन के विकल्प खोज रही है और यही उसकी राजनीतिक फितरत है। वो देखेंगी कि हवा का रुख किस ओर है और फिर तय करेंगी कि जाना किधर है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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