मुख्यपृष्ठस्तंभराजधानी लाइव : चुनाव आयोग या ‘चुनाव मंत्रालय’!

राजधानी लाइव : चुनाव आयोग या ‘चुनाव मंत्रालय’!

डॉ. रमेश ठाकुर

बीते कई वर्षों से इलेक्शन कमीशन की कार्यशैली सवालों के घेरे में है। साल-डेढ़ साल बाद चुनाव आयुक्त को बदल देने का निर्णय भी निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया पर अनुकूल प्रभाव डालता है। बहरहाल इलेक्शन कमीशन की सुस्ती यूं ही रही तो आनेवाले समय में केंद्र सरकार चुनाव कराने की जिम्मेदारी अपने ही जिम्मे बांध लेगी, फिर चाहे उसके लिए कोई अलग से ही कोई ‘चुनाव मंत्रालय’ रूपी कोई नया मंत्रालय ही क्यों न बनाना पड़े? ऐसी आशंका इसलिए महसूस होने लगी है क्योंकि चुनाव आयोग की सक्रियता अब उतनी नहीं दिखती, जितनी दिखनी चाहिए? चुनावी सभाओं में विभिन्न सियासी दलों के नेता जमकर अनैतिक हरकतें करते हैं, हेट स्पीच देते हैं। चुनावी सभाओं में खुलेआम एक-दूसरे को अनाप-शनाप और अमर्यादित शब्द बोलकर जलील करते हैं। आपस में ही एक-दूसरे का चरित्रहरण करते हैं। इसके अलावा आयोग के नियमों की भी धज्जियां उड़ाते हैं। खुलकर कहें तो चुनाव आयोग का उन्हें जरा भी डर नहीं होता। सत्ताधारी दल तो हनक में रहता ही है, उनके लोग तानाशाही पर उतारू रहते हैं। कई बार तो चुनाव आयोग के अधिकारियों को ही डांट-डपट देते हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि चुनाव आयोग केंद्र सरकार की कठपुतली बन गया है, बिना उनके आदेश से कुछ नहीं करता, जबकि एक वक्त ऐसा भी हुआ करता था, जब चुनाव आयोग के खिलाफ कोई आवाज तक उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता था। पर आज समय ऐसा है, जब हर कोई उसकी कार्यशैली पर सवाल उठाने लगा है। जनता की अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक घिरा हुआ है।

अप्रत्यक्ष रूप से केंद्र सरकार अपनी जरूरत के हिसाब से ही इस आयोग का इस्तेमाल करती है। अगर ठीक से जांच हो जाए तो पता चलेगा कि मौजूदा दिल्ली एमसीडी और गुजरात विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार तय सीमा से ज्यादा धन खर्च कर रहे हैं। चाहे दिल्ली का एमसीडी चुनाव हो या फिर गुजरात विधानसभा दोनों जगह उम्मीदवार प्रचार-प्रसार में पैसा बहा रहे हैं। सब कुछ देखने के बावजूद भी आयोग अपनी आंखों पर पट्टी बांधे हुए है। गुजरात में पहले चरण की वोटिंग निपट गई लेकिन जितनी हुई वह भाजपा के लिए चिंता का विषय इसलिए है कि वोटिंग कम हुई? गुजरात के लिहाज से बात करें तो ये सिलसिला वहां बीते तीन विधानसभाओं से लगातार जारी है। सन् २०१२ में जहां ७१.३७ फीसदी मतदान हुआ था, वहीं २०१७ में ६७.३४ प्रतिशत रहा। इस बार घटकर कुल ५९.६४ फीसदी रहा गया। घटती वोटिंग की जिम्मेदारी चुनाव आयोग को लेनी चाहिए लेकिन वो ऐसा कदापि नहीं करेगा। इसके पीछे कई वजहें हैं। वजहें ऐसी कि अगर सार्वजनिक हो जाएं तो कोहराम मच जाए।
कायदे से देखें तो चुनाव आयोग अब प्रचार-प्रसार और बाकी तामझाम में करोड़ों रुपए खर्च करता है। क्रिकेटरों व फिल्मी कलाकारों को एंबेस्डर बनाकर मोटी रकम देते हैं। रेडियो-टीवी पर विज्ञापन देते हैं। चाहे केंद्रीय चुनाव आयोग हो या राज्यों के आयोग। फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ता, मतदान करने में लोग रुचि ही नहीं लेते, वोटिंग के दिन को वह छुट्टी के तौर पर इंज्वाय करते हैं। दशक भर से ये सवाल उठा रहा है कि आखिर जनता में मतदान के प्रति उदासीनता क्यों बढ़ रही है? ये सवाल दिनों-दिन बड़ा हो रहा है। समय की दरकार यही है कि बिना देर किए इस पर केंद्र सरकार को गंभीरता से विचार-विमर्श करना होगा। गुजरात में घटती वोटिंग की तरह भाजपा की जीती सीटें भी लगातार कम हो रही हैं। वर्ष २०१२ में ११६ सीटें थीं और वर्ष २०१७ में ९९ ही रह गईं। भाजपा भयभीत है कि क्या इस बार भी वैसा होगा? फिलहाल जिस धीमी गति से वोटिंग हुई है, उन आंकड़ों के मुताबिक ८० के आस-पास ही सीटें भाजपा के खाते में आएंगी।
चुनावी पंडित गुणा भाग लगाने लगे हैं कि कहीं इस बार फंस तो नहीं जाएगा गुजरात का खेल? यही चिंता मोदी-शाह की जोड़ी को भी सताने लगी है। वह इस चुनाव को साल २०२४ के सेमीफाइनल के तौर देख रहे हैं। खुदा न खास्ता अगर खेल बिगड़ा तो आगे का रास्ता भी गड़बड़ा जाएगा। मोदी-शाह किसी भी सूरत में गुजरात को जीतना चाहेंगे। यही हाल केजरीवाल का एमसीडी चुनाव को लेकर दिल्ली में है, जिसे जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ है। गुजरात में मुस्लिम वोटर इस बार भी भाजपा के साथ नहीं है। पाटीदार समुदाय ने भी दूरी बना रखी है। ज्यादातर लोग आम आदमी पार्टी की ओर जाते दिख रहे हैं। फिलहाल गुजरात का पहला चुनावी चरण संपन्न होने के बाद दिल्ली स्थित भाजपा के केंद्रीय मुख्यालय में हल्की-फुल्की कानाफूसी होनी शुरू हो गई है। कानाफूसी कम मतदान प्रतिशत को लेकर ज्यादा है। पहले चरण में भाजपा का प्रभाव कम दिखा, उनके पारंपरिक क्षेत्रों में भी वोटरों में उदासीनता देखने को मिली। अगले और आखिरी चुनावी रण से खास उम्मीदें हैं, तभी रोड शो, नुक्कड़ सभाएं, डोर-टू-डोर को जोर तेज कर दिया गया है। कई केंद्रीय मंत्री इस काम में लगाए हैं। चुनाव चाहे जो भी जीते लेकिन चुनाव आयोग की निष्क्रियता और उसकी असफलता पर विमर्श जरूर करना चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका बहुत बड़ी होती है। निर्वाचन जैसी बड़ी जिम्मेदारी उनके कंधों पर रहती है। ये कंधे कमजोर नहीं होने चाहिए, हमेशा मजबूत रहने चाहिए।

(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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