मुख्यपृष्ठस्तंभराजधानी लाइव : कीलों की खेती से किसानों का स्वागत!

राजधानी लाइव : कीलों की खेती से किसानों का स्वागत!

डॉ. रमेश ठाकुर नई दिल्ली

जो किसान सबका पेट भरने के लिए फसलें उगाते हैं, आज उनके लिए केंद्र सरकार ने कीलों की खेती की हुई है। आंदोलित किसानों का आक्रोशित रुख और सुरक्षाकर्मियों द्वारा अपराधियों की भांति उन पर बलपूर्वक जोर-जुल्म वाली तस्वीरें दिल को झकझोरती हैं। सोचने पर मजबूर करती हैं कि ये दृश्य आजाद भारत के हैं? क्योंकि ऐसे मूवमेंट अधिकांश अंग्रेजों को खदेड़ने के दौरान हमारे क्रांतिकारियों के साथ सुरक्षाकर्मी करते थे। प्रर्दशनकारी अन्नदाताओं को रोकने के लिए हजारों सुरक्षाकर्मियों ने जिस तरह से दिल्ली में मोर्चा संभाला हुआ है। सड़कों पर सीमेंट के बड़े-बड़े पत्थर, बैरिकेड, कंटीले तार और नुकीले लोहे के मोटे-मोटे रॉड गाड़े हुए हैं, उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे मानो पाकिस्तान या चीन से कोई आतंकी बॉर्डर पार करके दिल्ली में दाखिल हो रहे हों और उन्हें रोकने के लिए देश की तमाम सुरक्षा एजेंसियों के हजारों जवान लगे हों।
निश्चित रूप से दुख होता है ये सब देखकर। वो भी ऐसे वक्त में जब हमारी तरक्की का डंका समूचे संसार में बजने का दावा किया जा रहा हो, प्रत्येक क्षेत्रों में देश तथाकथित अभूतपूर्व विकास कर रहा हो। इन सबके बावजूद देश का अन्नदाता आंसू गैस के गोले खाने पर मजबूर हैै।
मूवमेंट को तहस-नहस करने के लिए करीब १८ हजार सुरक्षाकर्मियों ने दिल्ली की चारों ओर से किलाबंदी की हुई है। इलाके छावनी में तब्दील होने से संपूर्ण जनजीवन अस्त- व्यस्त हो गया है। दिल्ली के बाहर से आने वाले गंभीर मरीज राजधानी के अस्पतालों में नहीं पहुंच पा रहे हैं, क्योंकि दिल्ली में दाखिल होने वाले सभी मार्ग बंद हैं। मंगलवार को कई मरीजों ने उचित इलाज नहीं मिलने पर बॉर्डरों पर ही दम तोड़ दिया। ये ऐसी अमानवीय आपातकाल की स्थिति है, जिससे हमें बिना देर किए तौबा करना होगा। अन्नदाताओं पर आतंकियों जैसा जोर-जुल्म करने की बजाय, उनके साथ सार्वजनिक रूप से खुशनुमा माहौल में केंद्र सरकार के जिम्मेदार मंत्रियों को बात करनी चाहिए। आंदोलन की रूप-रेखा से पूर्व केंद्र के दो मंत्री पीयूष गोयल और अर्जुन मुंडा ने किसान संगठनों से बात जरूर की थी, पर उनसे बात नहीं बनी। बातचीत को बीच में छोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि प्रर्दशनकारी किसान चाहते हैं कि उनसे प्रधानमंत्री या गृहमंत्री स्तर का कोई व्यक्ति मंत्रणा करें।
आंदोलन की शुरुआत १३ फरवरी को हुई, तब आंदोलित किसानों और सुरक्षाकर्मियों के बीच इस कदर तनातनी बढ़ी कि दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों के हालात बेकाबू हो गए। किसान दिल्ली पहुंचने की जिद पर अड़े हैं। नाजुक हालातों को देखकर गृहमंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और दिल्ली पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा को अपने कार्यालय में तलब किया। दोनों के साथ उन्होंने लंबी गुफ्तगू की। उसके बाद उन्होंने किसानों के साथ कड़ाई से पेश आने के निर्देश दिए। गृह मंत्रालय से मिले आदेश के बाद सुरक्षाकर्मी शंभू बॉर्डर, टिगरी बॉर्डर व करनाल जीटी रोड पर प्रदर्शन कर रहे किसानों पर टूट ही पड़े। आंसू गैसे के गोले छोड़ने शुरू कर दिए। प्रदर्शनकारियों को बलपूर्वक खदेड़ा गया। जिद्दी किसान फिर भी नहीं माने। उसके बाद तो सुरक्षाकर्मियों के साथ किसानों की जमकर झड़पें भी होती रहीं। दरअसल, ऐसे आदेश गृह मंत्रालय को देने की आवश्यकता कतई नहीं थी। अगर थोड़ा नरमाई दिखाकर एक बार उनकी बातें सुन लेते तो हो सकता था कि कोई हल निकल आता। इससे हुकमरानों का अपनी जनता से बात करने में रुतबा कम नहीं होता, बल्कि प्रदर्शनकारियों की नजरों में और इज्जत बढ़ती है, लेकिन शायद मौजूदा केंद्र सरकार झुकना पसंद ही नहीं करती।
ऐसा हठधर्मी रवैया दोनों पक्षों को नहीं अपनाना चाहिए, इससे नुकसान आमजनों का ही होता है। दिल्ली में बाहर से रोजाना आने वाली सब्जियां, दूध, खानपान की वस्तुएं प्रभावित हो गई हैं। १३ फरवरी से दिल्ली में हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से दूध की सप्लाई अच्छे से नहीं हो पाई। केंद्र सरकार को समझना होगा कि मौजूदा किसानों का मूवमेंट बड़ा है, इससे बहुत कुछ प्रभावित हो सकता है। कंटीले लोहे की कीलों से रोका तो किसान और उग्र होंगे, हालात ऐसे दिख भी रहे हैं। तभी तो किसान इतने उग्र हैं कि आंसू गैस से भी पीछे नहीं हट रहे। दिल्ली के सभी बॉर्डरों पर पुलिस ने सीमेंट के पत्थर, बैरिकेड, कंटीले तार, नुकीली वस्तुएं लगाई हुई हैं। ऊपर से अब दिल्ली में और हरियाणा के १५ जिलों में धारा-१४४ भी लगा दी है। इंटरनेट सेवा बंद कर दी। ताकि किसानों को किसी तरह प्रदर्शन से रोका जाए, लेकिन ये वक्त बोर्ड परीक्षाओं का है। बच्चों को इंटरनेट की आवश्यकता होती है। तमाम छात्र दिल्ली परीक्षा देने पहुंचते हैं, लेकिन आंदोलन के कारण नहीं पहुंच पा रहे। उनकी पूरे साल की मेहनत पर पानी फिर रहा है। इन मानवीय पहलुओं पर दोनों पक्षों को ध्यान से गौर करने की जरूरत है।
प्रदर्शनकारियों को मनाने की बजाय उन्हें अरेस्ट करके अस्थाई जेल में डालने की भी प्लानिंग गृह मंत्रालय ने कर ली है। इसके लिए दिल्ली के बवाना स्टेडियम को चुना है। हालांकि, गृह मंत्रालय के निर्णय को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मानने से मना कर दिया है। उन्होंने कहा है कि वो दिल्ली की किसी जगह को अस्थाई जेल बनाने की इजाजत नहीं देंगे। हालांकि, वह इस मूवमेंट में राजनीतिक रोटियां भी सेंकना चाहते हैं, तभी उन्होंने किसानों का समर्थन करते हुए कहा कि ये हमारे अन्नदाता हैं, कोई आतंकी नहीं, इनकी मांगें जायज हैं, तुरंत मानी जानी चाहिए। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सांसद राहुल गांधी ने भी किसानों का समर्थन करते हुए एलान कर दिया है कि केंद्र में इंडिया गठबंधन की सरकार अगर बनी तो किसानों को एमएसपी पर गारंटी कानून देंगे। किसानों की अन्य मांगों को भी मानने की हामी भरी है। विपक्ष के इन नेताओं के बयानों के बाद तो किसान आंदोलन में राजनीति का और जबरदस्त तड़का लग गया। लेकिन हमारी सियासत का दुर्भाग्य यही है, समस्या का समाधान खोजने की बजाय सभी अपनी राजनीति चमकाने में मशगूल हैं।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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