मुख्यपृष्ठस्तंभराजधानी लाइव: संरक्षण के पांच दशक और बाघ विहीन टाइगर रिजर्व!

राजधानी लाइव: संरक्षण के पांच दशक और बाघ विहीन टाइगर रिजर्व!

आजादी से लेकर अब तक वन्यजीव संरक्षण पर खर्च होनेवाले समूचे बजट की अगर बात करें तो आधे से ज्यादा पैसा बाघ परियोजना मुहिम पर लगाया गया है। हिंदुस्थान में बाघ परियोजना के पांच दशक पूरे हो चुके हैं। देश में कुल ५० टाइगर रिजर्व क्षेत्र हुआ करते थे, जिनमें कुछ साल पहले ३ रिर्जव और जोड़े गए, अब ५३ हो गए हैं, पर अफसोस कहीं-कहीं एक भी बाघ नहीं बचा? कई टाइगर रिजर्व बाघहीन हैं। ये हम नहीं, बल्कि पिछले सप्ताह जारी हुई सरकारी रिपोर्ट इसकी तस्दीक करती है। केंद्रीय वन एंव पर्यावरण मंत्रालय की मानें तो गुजरे चार वर्षों में देश भर में बाघों की संख्या में ७१५ बाघों का इजाफा हुआ। आंकड़ों की मानें तो इस समय देश में कुल ३,६८२ बाघ हैं। लेकिन तेलंगाना का कवल टाइगर रिजर्व, मिजोरम का डंपा टाइगर रिजर्व क्षेत्र, अरुणाचल प्रदेश का कमलेंग, ओडिशा का सतकोसिया और सह्याद्रि स्थित बाघ रिजर्व क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें एक भी बाघ नहीं है। वहां बाघ क्यों विलुप्त हुए ये जांच का विषय है।
कई टाइगर रिजर्व में कुछ बाघों की असमय मौत हो गई तो कुछ शिकारियों का निशाना बन गए। हालांकि, शिकारियों के हाथों मारे गए बाघों के संबंध में रिपोर्ट में नहीं बताया गया है, पर ये तल्ख सच्चाई है, जिसे सरकार भी मानती है कि इस वक्त देश में बाघों का शिकार करने के लिए संगठित गिरोह सक्रिय हैं। इनका डेरा टाइगर रिजर्व क्षेत्रों के आसपास ज्यादा रहता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बाघ, शेर, चीते व अन्य जंगली जानवरों के अवशेषों की भारी डिमांड रहती है। ऐसी खबरें भी कई मर्तबा आती हैं कि इनके इन कुकर्मों में फॉरेस्ट कर्मी भी शामिल होते हैं। सच भी है, बिना इनकी मिलीभगत के कोई शिकारी जंगल में दाखिल नहीं हो सकता। कुल मिलाकर जितना सरकारी बजट बीते पचास वर्षो में बाघों पर खर्च किया गया है, आंकड़े उतनी तसल्ली नहीं देते, जितनी देनी चाहिए। सालाना करीब १० से १२ करोड़ रुपए खर्च हुए और प्रत्येक वर्ष इस बजट में बढ़ोतरी भी होती रही। बावजूद इसके, परिणाम अच्छे नहीं हैं? सही से जांच की जाए तो इसमें बड़ा घोटाला सामने आएगा।
हिंदुस्थान में बाघ अभ्यारण्य मुहिम सन् १९७३ में लागू हुई थ, जिसे ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ का नाम दिया गया था। जिम्मेदारी ‘राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण’ के कंधों पर थी। सन् २०१८ तक भारत में कुल ५० टाइगर रिर्जव क्षेत्र हुआ करते थे, जिसे तीन वर्ष पहले बढ़ाकर ५३ कर दिया गया है। बढ़ाने के पीछे की मंशा बाघों की संख्या में इजाफा करना था। हालांकि, कुछ जगहों पर बाघों की संख्या अपने आप बढ़ी, उसी को देखते हुए जहां बाघों की चहलकदमी दिखी, सरकार ने उसे बाघ रिर्जव घोषित कर दिया, जबकि ये बाघ ऐसे थे जो अपना रास्ता भटक कर जहां-तहां पहुंचे थे। बाघों की गिनती को लेकर भी कई बार विरोध होता है। पर्यवारणविद कहते हैं कि बाघों की गणना सही तरीके से नहीं होती। उनकी मांगों को ध्यान में रखकर २०१८ में केंद्र सरकार ने आधुनिक तरीकों से बाघों की गणना करवाई, जिसका नतीजा ये निकला बाघों की संख्या देशी गणना वाले तरीकों के मुकाबले बढ़ी हुई सामने आई। हालांकि, हिंसक जानवरों जैसे, बाघ, शेर व तेंदुओं की सटीक गणना को लेकर विरोधाभास की स्थिति अब भी बनी रहती है। बाघ प्रेमी सरकारी आंकड़ों पर ज्यादा भरोसा नहीं करते हैं।
कुछ महीने पहले दो देशों से बीस चीते भारत लाए गए, जिन पर केंद्र सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च किए, उनमें ज्यादातर चीते मर चुके हैं। सबसे पहले ये जांच करनी होगी कि भारतीय वन वातावरण चीतों और बाघों के लिए क्यों बिगड़ता जा रहा है। हिंदुस्थान में बाघों का शिकार भी खूब होने लगा है। कोरोना के दौरान सन् २०२०-२१ में बाघों के मरने की संख्या सर्वाधिक रही। वर्ना, बाघों के बढ़ने का जो ७१५ का आंकड़ा केंद्र सरकार ने दर्शाया है उसमें निश्चित रूप से और वृद्वि होती। सन् २०१८ तक कुल बाघ २,९६७ थे, जो अब ३,६८२ हो गए हैं। कोरोना के दौरान शिकारी बाघों पर कहर बनकर टूटे थे। लॉकडाउन में खूब शिकार किए गए।
दरअसल, वो ऐसा वक्त था जब बंदिशें कम थी, जिसका शिकारियों ने जमकर लाभ उठाया। बहरहाल, हमारा देश अब भी बाघ संरक्षण क्षेत्र में संसार भर में अव्वल पायदान पर काबिज है। ७५ से ८० फीसदी के बीच बाघों का घर भारत में ही है, पर संरक्षण के लिहाज से मौजूदा कुछ रिपोर्ट सोचने पर मजबूर करती हैं। तीन टाइगर रिजर्व बक्सा, डंपा और पलामू में बाघों के नदारद होने की बात भी सामने आई है और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। बिना देर किए सरकार को इन टाइगर रिजर्व में बाघ विलुप्त होने के सही कारणों को खोजना होगा। वर्ना, भविष्य की आगामी पीढ़ी को वैसे दिन न देखने पड़ें कि चीतों की तरह बाघों को भी दूसरे देशों से मुंह बोली कीमत पर खरीदकर लाना पड़े।

डॉ. रमेश ठाकुर नई दिल्ली 
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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