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राजधानी लाइव: लोकल लीडरशिप की अनदेखी!

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मध्य प्रदेश और राजस्थान को लेकर खासा परेशान है। परेशानी एक नहीं, ढेरों हैं? वैसे, चुनाव तो पांच राज्यों में एक साथ होने हैं, लेकिन पूरी जोरआजमाइश इन्हीं दो राज्यों पर केंद्रित है। चलिए पहले मध्य प्रदेश की बात करते हैं। एमपी में पिछला जनादेश कांग्रेस पार्टी को मिला था, उनकी सरकार बनी थी, जिसे बीच में भाजपा ने अपने स्पेशल एजेंडे के तहत छीन लिया था। बात ज्यादा पुरानी नहीं है, वहां की जनता सब कुछ जानती-समझती भी है। हो सकता है इस बार हिसाब-किताब करे? वहां मामला गड़बड़ाया हुआ है, इस बात से भाजपा वाकिफ है, तभी कांग्रेस के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने पाले में लेने के बाद उसे लगने लगा था कि पूरा मध्य प्रदेश अब उनका हो गया? पर नौबत अब ऐसी है कि जितने नेता और कार्यकर्ता उस वक्त ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में गए थे, वो सभी एक-एक करके दोबारा कांग्रेस में लौट गए हैं? हालांकि, उनको रोकने की ज्योतिरादित्य सिंधिया ने हर संभव कोशिशें की, लेकिन कोई नहीं रुका?
बहरहाल, भाजपा में ज्योतिरादित्य सिंधिया का अंदरखाने रूतबा कम होने लगा है। इसके अलावा सिंधिया और प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच भी सियासी रस्साकशी मची हुई है। चौहान कतई नहीं चाहते कि उनके रहते प्रदेश की कमान कोई और ले। बीते महीनों दिल्ली से एक सुगबुगाहट हुई कि चौहान को भाजपा केंद्र में बुलाएगी और उनके स्थान को किसी और के नाम से भरा जाएगा। दूसरा नाम ज्योतिरादित्य सिंधिया का उछला, लेकिन उनका नाम सुनते ही मामा बिफर गए। कुल मिलाकर इस बार चौहान-सिंधिया दोनों की कड़ी परीक्षा है, जिसमें सिंधिया की कुछ ज्यादा ही? अगर मध्य प्रदेश हाथ से फिसला तो ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतिक करियर पर भी सवालिया निशान लग जाएगा? दिल्ली से एक अंदरखाने खबर ये भी है कि सिंधिया कांग्रेस में जा सकते हैं। इस बात पर मुहर लगाने के लिए एक उदाहरण सबके पास मौजूद भी है। संसद के नए भवन में पहली कार्यवाही के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया का सोनिया गांधी के करीब बैठना और दोनों का मधुरता के साथ आपस में गपशप करना दर्शाता है कि दाल में कुछ काला होनेवाला है। सोनिया-सिंधिया की तस्वीर जब सोशल मीडिया पर घूमी तो भाजपा और सतर्क हो गई।
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के सामने एक और समस्या उत्पन्न हुई है। वह है जिताऊ उम्मीदवारों का न मिलना। तभी उन्होंने कई सांसदों और केंद्र सरकार के मंत्रियों को भी विधानसभा का टिकट देकर मैदान में उतार दिया है। उम्मीदवार लिस्ट में अपना नाम देखकर कई मंत्री तो भौचक्के रह गए। कइयों ने तो चुनाव न लड़ने की भी इच्छा जाहिर कर दी है। दरअसल, वो जानते हैं कि मामला इस बार फंस सकता है। कमोबेश, स्थिति राजस्थान में भी कुछ ऐसी ही बनी हुई है। मोदी-शाह की जोड़ी ने राजस्थान की नब्ज टटोल ली है। वहां भी पार्टी के स्थानीय नेताओं में आपसी खींचतान मची हुई है। प्रधानमंत्री किसी भी सूरत में राजस्थान जीतना चाहते हैं, पर लगता नहीं है कि उनका सपना पूरा हो पाएगा, क्योंकि कांग्रेस वहां अब मजबूत स्थिति में दिखाई पड़ने लगी है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधराराजे सिंधिया ने भी तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। दिल्ली से उनके पास भी संदेश पहुंचवाया है कि राज्य छोड़कर केंद्र में आएं, पर उन्होंने राजस्थान छोड़ने से साफ मना कर दिया है। इशारों-इशारों में बता भी दिया है कि प्रदेश की अगली कमान उन्हें ही सौंपी जाए। कुल मिलाकर मध्य प्रदेश और राजस्थान दोनों प्रदेशों में भाजपा के लिए सिंधिया सिर दर्द बने हुए हैं। दरअसल, दोनों बड़े कद के नेता हैं, इसलिए उनसे सीधे पंगा भी नहीं लेंगे। इतना तय है कि अगर भाजपा दोनों राज्य हारती है तो उसका मुख्य पैâक्टर अंतर्कलह ही रहेगा। फिलहाल, दिल्ली इन दोनों का तोड़ खोज रही है। दोनों राज्यों में आगामी चुनाव को लेकर जितनी भी रैलियां प्रस्तावित हैं, उनमें दिल्ली के नेताओं और अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों के नाम ज्यादा हैं। भाजपा इस बार सबसे बड़ी गलती स्थानीय नेताओं को इग्नोर करके कर रही है। वैâलाश विजयवर्गीय संगठन का काम देखते हैं, उनको वहां से किनारे लगाने के लिए उनसे बिना पूछे विधानसभा का टिकट थमा दिया गया। इसको लेकर वे भन्नाए हुए हैं, पर निर्णय आलाकमान द्वारा मुकर्रर किया गया है, इसलिए खुलकर कुछ बोल भी नहीं सकते। इसलिए जहर का कड़वा घूंट पीकर बैठे हैं। प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को लगता है कि जी-२० की सफलता, चंद्रयान-३ और महिला आरक्षण बिल उनके लिए चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त हैं। इसी गुमान के चलते वो स्थानीय नेताओं को भाव नहीं दे रहे। राज्यों के टिकट वितरण में भी मोदी-शाह किसी की नहीं सुन रहे। अपनी टीमें लगाई हुई हैं, उनके सर्वे के आधार पर ही टिकट वितरण कर रहे हैं। जो सीटें बहुत कमजोर हैं, उन पर दिल्ली से केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को भेज रहे हैं। दिल्ली स्थित भाजपा कार्यालय में इस वक्त चुनावी प्रदेशों के टिकट चाहने वाले नेताओं का जमावड़ा लगा हुअा है, लेकिन कायदे से देखें तो वो जमावड़ा किसी काम का नहीं, किसी के कहने और सिफारिश से भी टिकट नहीं मिलनेवाला। मोदी-शाह की जोड़ी ने जिसे एक बार पंसद कर लिया, वह अंतिम निर्णय होता है। पूरी भाजपा इन दो नेताओं में आकर सिमट गई है, लेकिन आगामी चुनाव इनकी असल परीक्षा लेंगे?

डॉ. रमेश ठाकुर नई दिल्ली
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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