मुख्यपृष्ठस्तंभराजधानी लाइव: ‘चंद्रयान सफलता' में वैज्ञानिकों की निजता की चिंता?

राजधानी लाइव: ‘चंद्रयान सफलता’ में वैज्ञानिकों की निजता की चिंता?

डॉ. रमेश ठाकुर, नई दिल्ली

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के वैज्ञानिकों की अद्भुत, अविश्वसनीय, चमत्कारी सफलता से हर हिंदुस्थानी गदगद है। गदगद होना भी चाहिए, हमारे वैज्ञानिकों ने कारनामा जो ऐसा कर दिखाया है। स्पेस में मिशन की सफलता ने जश्न मनाने का बड़ा अवसर देशवासियों को प्रदान किया है। चंद्रयान-३ की सफलता के बाद हम विश्व पटल पर और मजबूत हो गए हैं, लेकिन इस सफलता के उत्साह में हमने कुछ घोर गलतियां भी कर डाली। ऐसी गलतियां जिसका खामियाजा भुगतना बहुत महंगा पड़ सकता है। ‘चंद्रयान स्पेस मिशन’ से जुड़े तकरीबन सभी वैज्ञानिकों की निजता को हमने सार्वजनिक कर दिया, जो कतई नहीं करना चाहिए था। विज्ञान प्रोटोकॉल के मुताबिक, वैज्ञानिकों की कार्यशैली और उनके मिशन बेहद गुप्त रखे जाते हैं। उन्हें किसी हाल में सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। पर, इस बार हमने विज्ञान प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ा डाली। वैज्ञानिकों की निजता का जरा भी खयाल नहीं रखा, सब कुछ पब्लिक में आकर प्रचारित कर दिया।
वैज्ञानिकों का वर्कआउट ठीक ‘रॉ एजेंट’ की तरह होता है। उनकी पहचान और कार्य को किसी को नहीं बताया जाता है, लेकिन चंद्रयान-३ के सभी किरदारों के नाम, पते, उनके गांव-शहर, खानदान, पारिवारिक स्थितियों के संबंध में सब कुछ जगजाहिर कर दिया। दरअसल, हम भारतीय बड़े उत्साही और भावुक किस्म के होते हैं, जिसका नुकसान भी कई मर्तबा उठाते हैं। उत्साह के क्षणों में कई बार भूल भी कर बैठते हैं। तभी, चंद्रयान मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों की निजता को भी तार-तार कर दिया, जबकि ऐसे विषयों पर पूर्व में कई हिंदी फिल्मों का निर्माण भी हुआ, जिसमें यह दिखा कर अच्छे से समझाने का प्रयास भी गया है कि वैज्ञानिकों की निजता से कभी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। दो हिंदी फिल्में सभी ने जरूर देखी होंगी? एक ‘तिरंगा’, दूसरी ‘कृष’? दोनों फिल्में काफी लोकप्रिय हुई थीं। एक राष्ट्रभक्ति पर निर्भर है, तो दूसरी मनोरंजन के साथ-साथ वैज्ञानिक निजता की सीख देती है।
आईने के तौर पर ये फिल्में अच्छा उदाहरण पेश करती हैं। ‘तिरंगा’ फिल्म में खलनायक प्रलयनाथ गैंडास्वामी महत्वपूर्ण, गुप्त और गहरे राज निकलवाने के लिए एक प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक का अपहरण करता है, वहीं कृष फिल्म में नायक ऋतिक रोशन के साथ भी कमोबेश कुछ ऐसा घटित होता दर्शाया गया है, वह भी वैज्ञानिक थे। फिल्मों को समाज का दर्पण इसीलिए कहा जाता है, ताकि उसमें दिखाई गई अच्छी-बुरी बातों से सबक लेकर समाज में सुधार आए। इस तरह से समाज के उत्थान में उनका बहुमूल्य योगदान होता है। फिल्में समाज में घटित बड़ी घटनाओं को चलचित्र उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उपरोक्त दोनों फिल्में चंद्रयान-३ के सभी सफल भारतीय वैज्ञानिकों की सुरक्षा हेतु सोचने पर मजबूर करती हैं। चंद्रयान की सफलता से जुड़े तकरीबन सभी वैज्ञानिकों के निजी परिचय को उजागर करना हमारी बड़ी भूल है। ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था।
सर्वविदित है कि विज्ञान, प्रकृति का विशेष ज्ञान है। मनुष्य प्राचीन वक्त से ही प्रकृति और चंद्रमा संबंधी ज्ञान प्राप्त करने में लगा है, विज्ञान अर्वाचीन काल की देन है। भारतीय वैज्ञानिकों ने थोड़े ही समय में विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी क्रांति की है, जिसका लोहा दुनिया चंद्रयान-३ मिशन के बाद मान रही है। पाकिस्तान जैसा दुश्मन देश भी भूरि-भूरि सराहना करने पर मजबूर हुआ है। इसलिए निश्चित रूप से चांद पर पहुंच जाने की घनघोर ख़ुशी, उत्साह व उत्सव के नाम पर केंद्र सरकार व सत्तारूढ़ पार्टी ने मिलकर वैज्ञानिकों की सुरक्षा को खतरे में डाला है। मिशन सफल होने के बाद से ही प्रिंट मीडिया, खबरिया न्यूज चैनलों, यू-ट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्वीटर व तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर चंद्रयान-३ से जुड़ी जानकारियां व इसरो के वैज्ञानिकों की तस्वीरों को लोग पहचान सहित धड़ाधड़ उजागर कर रहे हैं। देखकर दुख होता है कि ऐसे माहौल में भी लोगों के दिमाग में जाति का कीड़ा काटने लगता है। जाति-पांति की मानसिकता से पीड़ित लोग ‘इसरो’ के वैज्ञानिकों की फोटो सोशल मीडिया पर इस्तेमाल करके उनकी जाति, धर्म, गांव, देहात, ग्रोत्र आदि बतला रहे हैं।
ऐसी ओछी हरकतों से बुद्धिजीवी वर्ग खासे नाखुश हैं। इस कतार में देश के प्रसिद्ध खोजी पत्रकार नवनीत चतुर्वेदी भी शामिल दिखे। वो कहते हैं कि साइंटिस्ट मिशन देश की सुरक्षा से जुड़े अहम गोपनीय मिशन होते हैं। इन्हें सार्वजनिक नहीं करने की जिम्मेदारी केंद्र व राज्य सरकारों पर निर्भर करती है। क्योंकि इससे तो दुश्मन देशों की खुफिया एजेंसियां बहुत सहज तरीके से हमारे वैज्ञानिकों और मिशन तक पहुंच सकती हैं। साथ ही पब्लिक डोमेन में मौजूद इतनी बड़ी संख्या में सार्वजनिक हुए किसी भी साइंटिस्ट को दुश्मन साम-दाम-दंड-भेद वाली नीति के जरिए फंसा सकते हैं। कुल मिलाकर अति-उत्साह के चक्कर में टीवी पर लाइव दिखाकर ‘टीम इसरो’ के कर्मचारियों की पहचान उजागर नहीं करनी चाहिए थी। खुशी के समुद्र में गोता लगाते वक्त शायद इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया। ये भयंकर भूल है, ऐसा भविष्य में न हो, इस गलती को समय रहते सुधारना होगा। क्योंकि अगले महीने सूर्य पर भी हमारा मिशन जाएगा। विकास विज्ञान से ही संभव है। इसमें कोई दो राय नहीं कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इसलिए इसके साथ छेड़छाड़ नहीं होना चाहिए, जितना हो सके उसे गुप्त रखना चाहिए।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
ऐसी ओछी हरकतों से बुद्धिजीवी वर्ग खासे नाखुश हैं। इस कतार में देश के प्रसिद्ध खोजी पत्रकार नवनीत चतुर्वेदी भी शामिल दिखे। वो कहते हैं कि साइंटिस्ट मिशन देश की सुरक्षा से जुड़े अहम गोपनीय मिशन होते हैं। इन्हें सार्वजनिक नहीं करने की जिम्मेदारी केंद्र व राज्य सरकारों पर निर्भर करती है। क्योंकि इससे तो दुश्मन देशों की खुफिया एजेंसियां बहुत सहज तरीके से हमारे वैज्ञानिकों और मिशन तक पहुंच सकती हैं। साथ ही पब्लिक डोमेन में मौजूद इतनी बड़ी संख्या में सार्वजनिक हुए किसी भी साइंटिस्ट को दुश्मन साम-दाम-दंड-भेद वाली नीति के जरिए फंसा सकते हैं। कुल मिलाकर अति-उत्साह के चक्कर में टीवी पर लाइव दिखाकर ‘टीम इसरो’ के कर्मचारियों की पहचान उजागर नहीं करनी चाहिए थी।

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