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राजधानी लाइव: नई दिल्ली विपक्ष की ‘पटकने’ वाली रणनीति से सत्तापक्ष में खलबली!

लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी धड़े के ‘इंडिया’ गठबंधन ने अपना अध्यक्ष आखिरकार सर्वसम्मति से चुन लिया है। गठबंधन के सामने ये बाधा बहुत बड़ी थी, जिसे पार पाने में कई दिनों से माथापच्ची हो रही थी। इस काम में जितनी देर हो रही थी, उसका फायदा उठाकर भाजपा गठबंधन में ‘एकता’ न होने को लेकर नकारात्मक खबरें पैâला रही थी। मीडिया में जमकर प्रचार किया जा रहा था कि इंडिया गठबंधन में एकता नहीं है? नीतिश को ‘इंडिया’ गठबंधन का संयोजक बनाए जाने की चर्चा थी। हालांकि, नीतिश कुमार ने खुद से इनकार कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि किसी पद की उन्हें लालसा नहीं? खड़गे का नाम भी सबसे पहले उन्होंने ही आगे बढ़ाया। दरअसल, भाजपाई सबसे ज्यादा नीतिश कुमार के ही पीछे पड़ी थी। उनकी पूरी की पूरी आईटी टीम नीतिश कुमार और इंडिया गठबंधन के बीच दरार डलवाने की हर प्रकार की कोशिशें कर रही थी।
जब से ‘इंडिया’ गठबंधन की नींव रखी गई, तभी से भाजपा नेता नीतिश कुमार को भड़का रहे थे। कभी बैठक से नाराज होकर नीतिश के जाने की बातें कहते तो कभी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर उन्हें भड़काते थे। उन्हें लालची, दल-बदल व पलटूराम जाने क्या-क्या बोलते थे। पर उन्होंने बहुत समझदारी से कदम उठाया। अपने भीतर प्रतिशोध की ज्वाला को दबाए रखा। नीतिश ने ‘इंडिया’ गठबंधन के शीर्ष नेतृत्व को पहले ही आगाह कर दिया था कि उनको लेकर भ्रामक बातें पैâलाकर भाजपाई गड़बड़ी करेंगे। कमोबेश, वैसा किया भी जाता रहा। बीच में खबर ऐसी भी पैâलाई गई कि जेडीयू का अध्यक्ष बनने के बाद नीतिश फिर से एनडीए में वापसी करेंगे। दरअसल, ये भी भाजपा का सियासी हथकंडा साबित हुआ। ऐसा करके वो ‘इंडिया’ गठबंधन की एकता को भंग करना चाहते थे। लेकिन विपक्ष भी अब ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’, की भांति आगे बढ़ रहा है।
बहरहाल, बीते शुक्रवार को विपक्षी दलों की वर्चुअल बैठक में मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को सभी की सहमति से मुखिया बनाया गया। दरअसल, इसके पीछे एक सियासी रणनीति भी निहित है। खड़गे दलित समुदाय से वास्ता रखते हैं। केंद्र में अभी तक प्रधानमंत्री की सीट पर इस समुदाय से कोई व्यक्ति नहीं बैठ पाया, जबकि देश की बड़ी आबादी चाहती है कि कोई दलित व्यक्ति भी पीएम की कुर्सी पर बैठे। फिलहाल, विपक्षी गठबंधन की कमान अब दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के हाथों में पहुंच चुकी है। आगे की परीक्षा सीटों के बंटवारे की है, जिसको लेकर भी आम सहमति बनने को है। खड़गे को गठबंधन का प्रमुख बनाकर विपक्ष ने निश्चित रूप से बड़ा सियासी दांव खेला है। क्योंकि देश में दलित समुदाय की जो बड़ी आबादी है, वो किसी भी चुनाव का रुख बदलने की ताकत रखती है। अगर ये आबादी विपक्ष के वोट में शिफ्ट होती है तो आगामी लोकसभा चुनाव की तस्वीर भी बदल सकती है। क्योंकि दलित और आदिवासियों को हसीन सपने दिखाकर भाजपा पिछले दो लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में वोट हथिया चुकी है। उनसे किए गए वादे अभी भी सभी अधूरे हैं। आदिवासी महिला को राष्ट्रपति बनाया, लेकिन समुदाय की स्थिति वैसी ही रही। ऐसे में विपक्ष गठबंधन इन रूठों का वोट हासिल कर सकती है।
भाजपा इस वक्त रामोत्सव के नाम पर फूली हुई है, उन्हें लगता है कि लोकसभा चुनाव में उनको किसी की जरूरत नहीं, सिर्फ हिंदू वोटर ही उनकी नैया को पार लगा देगा। इसीलिए उन्होंने अयोध्या में होने जा रहे ‘प्राण प्रतिष्ठा’ समारोह में अपनी पूरी ताकत झोंकी हुई है। प्रधानमंत्री भी मान बैठे हैं कि अब रास्ता साफ हो चुका है, लेकिन ये बदलती राजनीति का दौर है, जो कभी भी, कहीं भी, किसी ओर करवट ले सकती है। देश की जनता भी अच्छे से जानती-समझती है कि भाजपा ने राम नाम के शोर में सभी जरूरी मुद्दों पर पर्दा डाला हुआ है। महंगाई, बेरोजगारी, सुरक्षा-शिक्षा आदि की कहीं कोई चर्चा नहीं हो रही। मीडिया की स्वतंत्रता भी बंधक में है। भुखमरी के ताजा आंकड़े बांग्लादेश से भी नीचे जा चुके हैं। खुशहाली में देश अफगानिस्तान के आस-पास जा पहुंचा है, जबकि केंद्र सरकार कहती है कि कई लाख घर गरीबी रेखा से निकल चुके हैं। पर सच्चाई ये है कि देश की ८० फीसदी आबादी सरकार के दिए अनाज पर निर्भर है। ये ऐसे आंकड़े हैं, जिनमें केंद्र सरकार पूरी तरह से विफल है इसलिए इन मसलों को वो कुरेदना तक नहीं चाहते।
इन मुद्दों को उठाने में मीडिया अच्छा रोलप्ले करती है, लेकिन अब वो भी केंद्र सरकार के गिरफ्त में हैं। बिना सरकार की इजाजत से अपनी मर्जी से कुछ दिखा नहीं सकते। मीडिया के अलावा सभी संवैधानिक संस्थाओं पर भी केंद्र का शिकंजा कस चुका है। लोकतंत्र और जनतंत्र का गला वैâसे घोंटा जाता है, जिसकी एक तस्वीर पिछले दिनों महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष द्वारा पेश की गई। शायद इसमें उनका कोई दोष नहीं? दिल्ली ने इस समय सभी को डराया हुआ है। पैâसलों की हर पटकथा दिल्ली में लिखी जाने लगी है। दुर्दांत सियास्ाी व्यवस्था से देश बाहर निकलना चाहता है, लेकिन वो वक्त कब आएगा, इसका इंतजार सभी को है।

डॉ. रमेश ठाकुर
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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