मुख्यपृष्ठस्तंभराजधानी लाइव : पाक की कंगाली और शाहबाज का हिंदुस्थानी प्रेम!

राजधानी लाइव : पाक की कंगाली और शाहबाज का हिंदुस्थानी प्रेम!

  • डॉ. रमेश ठाकुर 

पाकिस्तान के पीएम ने हिंदुस्थान से दोस्ती के लिए हाथ बढ़ाने की मंशा जाहिर की है। कहावत है कि ‘मरता क्या न करता’, कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों पाकिस्तान का हुआ है। भूखे पेट की आग बहुत तकलीफदेह होती है, कुछ भी करवाने का मादा रखती है। दोस्ती का ऑफर तो दूर, दंडवत होकर पुरानी गलतियों पर माफी मंगाने को भी विवश हो जाता हैं इंसान। क्या इसी बात का बोध तो नहीं हो गया पड़ोसी मुल्क के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ को? लेकिन शरीफ इतनी जल्दी शराफत पर उतर आएंगे, इस पर घोर संशय है। उनके बयान पर दिल्ली अभी शांत है, उलटकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। पाकिस्तान के मौजूदा हालात अच्छे नहीं हैं। आटे-चावल जैसी खाद्य वस्तुओं के लेने को चौतरफा भगदड़ मची हुई है। कायदे से देखें तो ये देन पाकिस्तान की मौजूदा और पूववर्ती हुकूमतों के गलत पैâसलों और बदले की भावनाओं से लबरेज विभाजनकारी नीतियों की है। हिंदुस्थान को परेशान करने के लिए उन्होंने क्या कुछ नहीं किया। चीन से मोटा कर्ज लिया। हिंदुस्थान को नीचा दिखाने के लिए, उनसे हाथ मिलाया। नेपाल को हमारे प्रति भड़काया। अन्य पड़ोसी मुल्कों से भी मुखालफतें की। इन सबको करने में उनका अच्छा-खासा धन भी खर्च हुआ।
गृह मंत्रालय के अधिकारियों की मानें तो पाकिस्तानी हुकूमत घुटनों पर है। गिड़गिड़ाना अभी शुरू हुआ, आगे और गति बढ़ेगी। पड़ोसी एक बात अच्छे से समझ गए हैं कि हिंदुस्थान से पंगा लेने का मतलब है पूरी दुनिया से बैर-बुराई कर लेना और हिंदुस्थान से संबंध अच्छे रखने का मतलब है दुनिया के देशों के साथ खुश रहना, तभी शाहबाज शरीफ हिंदुस्थान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहते हैं। वरना, वो इतने शरीफ नहीं हैं कि हिंदुस्थान के सामने खुद को झुकाएं। हालांकि, हिंदुस्थान उनके झांसे में एकाएक तो नहीं आएगा। रही बात बातचीत करने की तो रास्ते बंद कभी थे ही नहीं? दरवाजे पहले भी खुले थे, आज भी खुले हैं, पर इतना तय है कि भविष्य में हिंदुस्थान की ओर से बातचीत की टेबल अब तभी सजेगी, जब पाकिस्तान ये भरोसा दे कि कोई भी दिमागी खुराफात और छल-कपट नहीं करेगा, पर मुश्किल है इससे वह कभी बाज भी आए। कहते हैं ‘चोर चोरी से जाए, हेरा-फेरी से न जाए’।
ग्लोबल स्तर पर हिंदुस्थान की छवि अच्छी मानी जाती है। शाहबाज शरीफ भी अछूते नहीं हैं, बल्कि उनसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान भी दीवाने हुए थे, उन्होंने तो बाकायदा कराची की एक रैली में सार्वजनिक रूप से स्वीकारा भी था कि पूरी दुनिया में हिंदुस्थान का डंका बजा हुआ है, जबकि पाकिस्तान का नाम आते ही विदेशी मुल्क दूरियां बनाने लगते हैं। हालांकि, उनका ये बयान तब आया, जब वो सत्ता से बेदखल हो चुके थे। तब उनका पाकिस्तान में जबरदस्त विरोध भी हुआ था। कमोबेश, ऐसा ही मौजूदा प्रधानमंत्री के साथ भी हो सकता है, क्योंकि जनता के भीतर राजनीतिज्ञ लोगों ने हिंदुस्थान के खिलाफ इतना जहर घोला हुआ है, जिसका असर शायद ही कम हो। विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो का बयान अभी भी चर्चाओं में है, जिसमें ग्लोबल फोरम में उन्होंने हिंदुस्थान के खिलाफ जहर उगला था।
समूचा पाकिस्तान मंदी और आर्थिक तंगहाली से बेहाल है। मीडिया में जो तस्वीरें आ रही हैं, उसे देखी भी नहीं जाती। पाक अधिकृत कश्मीर की अवाम भी दुखी है। वहां कई मर्तबा ऐसी आवाजें भी उठ चुकी हैं कि उन्हें हिंदुस्थान में शामिल कर दिया जाए। वहां इस वक्त भी हुकूमत के खिलाफ लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। जरूरी सरकारी सुविधाओं से महरूम हैं, लोग खुलकर बोलते हैं कि उनके पास सरकारी सुविधाएं नहीं पहुंच रहीं, आटे-चावल के लाले पड़े हुए हैं। क्या इन सभी समस्याओं से उभरने के लिए ही शाहबाज शरीफ हिंदुस्थान के साथ शराफत का हाथ बढ़ाना चाहते हैं? उनके बयान पर विश्वास करना बहुत कठिन है। ‘देर आए, दुरुस्त आए’, जैसी कहावत भी उनके बयान से चरितार्थ नहीं होती दिखती। विश्वास एक बार, दो बार किया जाता है, बार-बार नहीं? ऐसे विश्वास से क्या फायदा, जहां धोखा ही मिले।
फिलहाल, बर्बाद होते पाकिस्तान की हालत देखकर प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की अंतरात्मा बिलबिला गई है, तभी वो घुटने टेकने पर मजबूर हुए हैं। इतिहास देखें तो सिर्फ शाहबाज ही नहीं, पूर्ववर्ती निजाम भी हिंदुस्थान की हस्ती को मिटाने के लिए बम-बारूद बनाते-बनाते कंगाल हो गए। उन्होंने बजट का अधिकांश पैसा इसी में खर्च किया और अवाम को छोड़ दिया भुखमरी के लिए सड़कों पर? लोग भूख से कराह रहे हैं, दाने-दाने को तरस रहे हैं। चारों ओर से बर्बाद होते देख पाकिस्तान और उनके प्रधानमंत्री को अक्ल आई है कि अब भी समय है हिंदुस्थान के सामने सरेंडर कर दो। कहीं कोई चाल तो नहीं है पाकिस्तान की, जिसके लिए वो जाने जाते हैं। पाक की छल-कपट जगजाहिर है, न सिर्फ हिंदुस्थान, बल्कि समूची दुनिया वाकिफ हो चुकी है। हिंदुस्थान की सेना तीन बार उन्हें धूल चटा चुकी है।
बहरहाल, पाक प्रधानमंत्री के बयान पर हिंदुस्थानी सरकार ज्यादा इत्तेफाक नहीं रखेगी। ऐसा मुश्किल है कि पाकिस्तान वास्तव में सबक सीख चुका है या सुधर गया है। वो जानते हैं कि ये नया हिंदुस्थान है। इसमें उनकी नापाक कोशिशें कामयाब नहीं होंगी। बीते कुछ वर्षों में भांप भी चुके हैं। कुछ कोशिशें करके देख भी ली, लेकिन उसका रिप्लाई किस अंदाज में उन्हें मिला, ये उनकी आर्मी जानती है या वो खुद? इसलिए हिंदुस्थान की हुकूमत शाहबाज शरीफ की शराफत पर एकाएक भरोसा शायद ही करे। उन्होंने कहा है कि हिंदुस्थान के साथ संबंधों को सुधारेंगे क्योंकि ‘हम पड़ोसी हैं। यह हमारे ऊपर है कि हम शांति से रहें। प्रगति करें या फिर एक-दूसरे से लड़ाई करें और समय-संसाधनों को बर्बाद करें, कोई उनसे पूछे यही बात तो हिंदुस्थान उन्हें दशकों से कहता आया है, तब उनकी अक्ल क्या घास चरने गई थी। शाहबाज के लिए ये अच्छी बात है कि पुराने जख्म का एहसास उन्हें आज भी है। उन्होंने स्वीकारा है कि हम हिंदुस्थान से तीन युद्ध लड़ चुके हैं और तीनों हार चुकें हैं। वो ये भी मानते हैं कि युद्व अपने पीछे सिर्फ कंगाली, गरीबी और लोगों के लिए बेरोजगारी छोड़कर जाता है। तब भी उनके सिर पर युद्व लड़ने का शौक चढ़ा रहता है।

(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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