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राजधानी लाइव : सियासी साजिशें और २०२४!

डॉ. रमेश ठाकुर

सियासी साजिशों के कारण वर्ष २०२४ में होनेवाले आम चुनाव के नजरिए से देश का मिजाज कुछ बिगड़ा हुआ है। ये मिजाज खुद से नहीं बिगड़ा, बल्कि जानबूझकर बिगाड़ा गया है। चलती सरकारें गिराना, विधायकों को बंधक बनाना, खुलेआम खरीद-फरोख्त करना! दरअसल इन सब हरकतों के सियासी मायने को समझने की जरूरत है। हालांकि समझने के लिए ज्यादा दिमाग लगाने की भी आवश्यकता नहीं, मामला दूध की तरह साफ है। बिगड़े सियासी गणित को देश अच्छे से समझ रहा है। अब राजनीति में नैतिकता नाम की चीज बची ही नहीं है। लालच में आकर नेता अपनों से गद्दारी करने लगे हैं। ये सब देखकर देश की जनता बहुत दुखी है। संसद का मानसून सत्र इसी महीने के तीसरे सप्ताह से आरंभ होने को है, जहां इन बिगड़ी बातों पर माहौल गर्म रहने के पूरे आसार हैं। दिल्ली के सियासी गलियारों में विपक्षी दलों की एकजुटता होने लगी है। ये एकजुटता दो मकसदों के लिए है। अव्वल, राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार को हराना और दूसरा मानसून सत्र में अपनी आवाज को मजबूती से बुलंद करना। हालांकि इन सभी पर सत्तापक्ष की भी नजरें हैं, फाइट के लिए उन्होंने भी रणनीतियां बना रखी हैं। कुल मिलाकर राष्ट्रपति चुनाव और संसद का सत्र दोनों दिलचस्प होने वाले हैं।
इस थ्योरी को समझना होगा कि विपक्षी दलों में फूट क्यों डलवाई जा रही है, क्यों नेताओं को तोड़ा जा रहा है? दरअसल ये ताना-बाना आगामी आम चुनाव को ध्यान में रखकर बुना जा रहा है। महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद जैसे ही सियासी तपिश वहां कुछ हल्की पड़ी, उसी तपिश ने दूसरे जगहों पर गर्माहट बढ़ा दी। निश्चित है ये आग २०२४ से पहले रुकनेवाली नहीं है? क्योंकि इसी आग के बूते आगामी लोकसभा का चुनाव जो लड़ा जाएगा। उत्तर प्रदेश में अपना दल में और फूट डाली जा चुकी है। स्थिति जूतमपैजार की आ गई है। मां-बेटी अब आपस में खुलकर भिड़ गई हैं। बीते शुक्रवार को मौका था अपना दल के पार्टी संस्थापक डॉ. सोनेलाल पटेल की जयंती का बड़ा कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसकी अगुवाई केंद्रीय मंत्री व सोनेलाल की पुत्री अनुप्रिया पटेल ने की, लेकिन उस प्रोग्राम में उन्होंने अपनी मां कृष्णा पटेल, बहन व अन्य पारिवारिक सदस्यों को अंदर घुसने नहीं दिया, जबकि कृष्णा पटेल कार्यक्रम में जाने के लिए बाहर सुरक्षाकर्मियों से उलझती रहीं, लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं मिला।
अपना दल दो धड़ों में विभाजित हो गया है, एक धड़े की अध्यक्ष केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया हैं तो दूसरे धड़े की अध्यक्ष खुद सोनेलाल की पत्नी कृष्णा पटेल हैं, पर जनता असली-नकली को लेकर कंफ्यूज है। ऐसी ही फूट पिछले वर्ष रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी में योजनाबद्ध ढंग से करवाई गई थी, जिसके एक हिस्से पर भाई पशुपतिनाथ पारस ने कब्जा कर एनडीए को समर्थन देकर मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री बन गए थे। पीछे रह गए रामविलास पासवान के पुत्र व सांसद चिराग पासवान जो माथा पीटते रह गए। बाद में उनसे दिल्ली का बंगला भी खाली करवा लिया गया था। लेकिन कुछ समय बाद ही चिराग को पूरा माजरा समझ में आया कि आखिर इस फूट में मुख्य भूमिका किसने निभाई थी। फूट डलवाने में स्पेशलिस्ट पार्टी पूर्व में समाजवादी पार्टी के भीतर भी चाचा-भतीजे में लड़ाई करवा चुकी है। दरअसल फूट डलवाने में उन्हें बहुत मजा आता है, उनके प्रतिद्वद्वी आपस में लड़ते रहते हैं और वह सियासी लाभ उठाते रहते हैं। वैसा ही खेल महाराष्ट्र में खेला गया, जो बिलकुल गरमागर्म है। यहां भी बिचौलिए ने परिवार में फूट डलवा दी, नतीजा सबके सामने है।
देश में इस वक्त कई मुद्दे गर्म हैं और कई घटनाएं एक साथ घटी हैं। नूपुर शर्मा को लेकर देश में उफान मार रहा जनाक्रोश कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। समूचे देश में अराजकता का माहौल है। सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हंगामा कटा हुआ है। विरोध की चिंगारी कई राज्यों में भड़क चुकी है, पर इस शोरगुल की आड़ में केंद्र सरकार अपना काम करती जा रही है। महंगाई से बेहाल देशवासियों को अगले कुछ दिनों में एक और तगड़ा झटका सरकार देगी। तारीख मुकर्रर हो गई है। इसी माह की १८ तारीख से खान-पान से लेकर रोजमर्रा की तकरीबन हर वस्तुओं को जीएसटी के दायरे में लाने का ढोल पीटा जा चुका है। अभी तक जो वस्तुएं जीएसटी दायरे से बाहर हुआ करती थीं, उन्हें भी शामिल कर लिया है, पैकेट बंद दूध, छाछ से लेकर बिस्किट आदि पर महंगाई का हंटर चलनेवाला है। पिछले सप्ताह जब पूरे हिंदुस्थान का ध्यान उदयपुर की घटना और नूपुर शर्मा के बयान में खोया हुआ था, तभी जीएसटी काउंसिल ने चुपके से महंगाई में पहले से लगी आग में और घी डाल दिया।
जीएसटी काउंसिल ने आम आदमी के इस्तेमाल की सभी वस्तुओं पर टैक्स रेट लगाने और बढ़ाने का निर्णय लिया है। ये निर्णय बाकायदा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में हुई जीएसटी काउंसिल में लिया गया, जबकि इस वक्त देशवासियों को उम्मीद थी कि सरकार संसद के मानसून सत्र से पहले महंगाई से निजात दिलाने के लिए कुछ सहूलियत देगी, लेकिन हुआ उल्टा? कम होने के बजाय महंगाई को और बढ़ा दिया गया। विपक्षी दल इस वक्त इतने कंफ्यूज हैं कि किस मुद्दे को उठाएं और किसे नहीं? अग्निपथ की आग अभी बुझी नहीं है, विरोध-प्रदर्शन जारी है, पर केंद्र सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं हो रहा है, जिसे चिल्लाना है वो चिल्लाता रहे? उन्हें जो करना है वह बिना भय के करते रहेंगे।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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