मुख्यपृष्ठस्तंभराजधानी लाइव : ‘आरुषि’ जैसी मिस्ट्री न बन जाए श्रद्धा की मौत!

राजधानी लाइव : ‘आरुषि’ जैसी मिस्ट्री न बन जाए श्रद्धा की मौत!

डॉ. रमेश ठाकुर

रिश्तों की नफरत में आपसी संबंध बिखरने लगे हैं, गति दिनों दिन तेज हो रही है। इंसान एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। दिल्ली की एक मौजूदा घटना इस बात का उदाहरण है। आरुषि तलवार मर्डर, निर्भया कांड, निठारी कांड और अब श्रद्धा मर्डर केस ने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हम कहां पहुंच गए हैं? समाज में जघन्यता और बर्बरता किस कदर लोगों पर हावी हो चुकी है? मौजूदा श्रद्धा हत्याकांड और हाल के वर्षों की ये तीन घटनाएं जो दिल्ली-एनसीआर में घटीं, जिससे मानवता पूरी तरह शर्मसार हुई। सबने देखा कि कैसे आरुषि तलवार हत्याकांड मिस्ट्री बनकर सरकारी कागजों में दम तोड़ा। न्याय के हिसाब से अपने अंजाम तक नहीं पहुंचा केस। उसी रास्ते पर श्रद्धा मर्डर केस चल पड़ा है, जांच एजेंसियों और स्थानीय पुलिस सबूत के लिहाज से खाली हाथ हैं। आरोपी की आपराधिक शैतानी प्लानिंग ऐसी थी कि उसने कोई ऐसा ठोस सबूत नहीं छोड़ा, जो बाद में उसे परेशान करे। जांच टीमें जंगल में और इधर-उधर खाक छान रही हैं। ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ कहावत के मुताबिक आरोपी पुलिस से कई कदम आगे चल रहा है। श्रद्धा के शरीर के जितने टुकड़े आफताब ने किए, पुलिस को दो-चार टुकड़ों के सिवाय बाकी पार्ट अभी तक नहीं मिले। हालांकि, केस की गंभीरता को पुलिस भी अच्छे से समझती है। समझना भी चाहिए, क्योंकि देश, दुनिया, केंद्र सरकार व मीडिया की नजरें जो गड़ी हुई हैं।
बहरहाल, रोंगटे खड़े कर देने वाले जघन्य कांड को लेकर दिल्ली इस वक्त फिर से चर्चाओं में है। ऐसा कांड जिसे सुनकर कोई भी स्तब्ध रह जाए। श्रद्धा मर्डर केस ने न सिर्फ दिल्लीवासियों को बल्कि समूचे देश को झकझोर दिया है। लोग सोचने पर मजबूर हैं कि कोई भला ऐसा वैâसे कर सकता है? जिसे वो चाहता हो, प्यार करता हो और जिंदगी साथ गुजारने को कहता हो, फिर एक दिन उसी के टुकड़े-टुकड़े कर दे? घटना की तासीर बहुत कुछ कहती है, मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखें, तो श्रद्धा मर्डर केस बहुत कुछ अपने आप खुलासा करता है। आरोपी आफताब अमीन पूनावाला ने जिस बेखौफ अंदाज से घटना को अंजाम दिया, उसे देखकर ये पहला कृत्य तो उसका नहीं हो सकता? निश्चित रूप से उसने पूर्व में भी ऐसा कुछ किया होगा? शहर और जगह बदलने के लिए ही शायद वो मुंबई से दिल्ली आया हो। अन्य लड़कियों के साथ भी उसने ऐसा ही किया हो? फिलहाल ये जांच पड़ताल का विषय है। पर, क्या सबूतों के अभाव में उसे कानून सजा कम तो नहीं देगा, ऐसे सवाल हमारे-आपके जेहन में गूंजने लगे हैं।
श्रद्धा को मारने के बाद भी आरोपी को कोई पछतावा नहीं है। पूछताछ के दौरान वह ठिठोली करता है, हंसता है। बीते शुक्रवार को जांच अधिकारियों ने उससे पूछा कि तुम्हारा नार्को टेस्ट होगा, करवाओगे? उसने तड़ाक से जवाब दिया, हां करवाऊंगा। मतलब, उसे न पहले डर था और न अब? हो सकता है आज यानी सोमवार को उसका नार्को टेस्ट हो, टेस्ट के लिए पुलिस को अदालत से इजाजत मिल चुकी है। पुलिस ने करीब ५० सवालों की सूची बनाई है, जो एक-एक करके आफताब से पूछे जाएंगे। आरोपी के दिमाग का परीक्षण भी होगा। पुलिस को शक है कहीं ये मानसिक बीमार तो नहीं? अगर है तो निश्चित तौर पर ये सीरियल किलर होगा। तभी उसने मृतका के शरीर के ३५ हिस्से घर में रखकर खुद उनके साथ कई दिन बिताए, शरीर के टुकड़ों को फ्रिज में रखे, जिसमें खानपान की वस्तुएं भी रखी थीं, उसका इस्तेमाल भी वह बिना भय करता रहा। प्लानिंग ऐसी कि किसी को कानों-कान भनक तक नहीं होने दी। गुत्थी कैसे सुलझाई जाए, अब पुलिस के समक्ष ये चुनौती है। मर्डर की पहेली पूरी फिल्मी पटकथा जैसी है। कड़ियों को जोड़ने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। घटना का अंतिम रिजल्ट क्या होगा, उसका इंतजार पूरा देश कर रहा है।
केस पुलिस के लिए बहुत पेचीदा हो गया है। धर्म विशेष से जुड़ गया है। इसलिए पुलिस भी फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। जल्दबाजी नहीं करना चाहती। दिल्ली के स्थानीय नेता और राजनीतिक पार्टियां फिलहाल चुप हैं। केजरीवाल से लेकर भाजपा, कांग्रेस आदि दलों से कोई प्रतिक्रिया अभी भी सामने नहीं आई है। ये अच्छी बात है, ऐसे मसलों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, आरोपी ने जघन्न अपराध किया है, कानून के मुताबिक उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। क्योंकि घटना को लेकर पूरे देश में विरोध हो रहा है, कई हिस्सों से तोड़फोड़ की खबरें भी आई हैं। हिंदू संगठन विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं, जुलूस-कैंडल मार्च कर रहे हैं। दिल्ली के शहादरा में विश्व हिंदू परिषद के नेता कपिल सोनी की अगुआई में बड़ा मार्च निकाला गया, पुलिस-प्रशासन भी सतर्क रहा। संगठन ने एक मांग पत्र सौंपा जिसमें कड़ी सजा देने की बात कही।
घटना को लेकर हिंदूवादी संगठनों को कहीं न कहीं इस बात का अंदेशा है कि आरोपी सबूतों के अभाव में छूट न जाए। आरोपी ने पहले ही दिन हत्या करने की बात स्वीकार ली थी। लेकिन उसके बाद से वह अपने पूर्व के किसी भी बयानों पर अडिग नहीं है, बदलता जा रहा है। जब उसे कोई वकील मिल जाएगा, तो वो भी उसे जुल्म न करने की पट्टी पढ़ाएगा। इसलिए पुलिस जल्द से जल्द नार्को टेस्ट करवाना चाहती है। हालांकि नार्को टेस्ट की विश्वसनीयता कोर्ट में ज्यादा मायने नहीं रखती, फिर भी पुलिस हर पहलुओं को अपने पक्ष में लेकर आगे बढ़ रही है। पुलिस के सामने एक परेशान और खड़ी हो गई है, आरोपी के परिजनों से पूछताछ करना चाहती है, लेकिन वो सभी गायब हैं, घर पर ताला पड़ा है। पुलिस उसके शुरुआती व्यवहार, बचपन का दौर, क्राइम इतिहास आदि के संबंध में कुछ तथ्य जुटाना चाहती है। कठोरतम सजा से ही समाज में अच्छा संदेश जाएगा? उसी के इंतजार में पूरा देश है।

(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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