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राजधानी लाइव : राष्ट्रपति चुनाव का चमत्कार, चर्चा में आए अंतिम कतार में खड़े आदिवासी

डॉ. रमेश ठाकुर

बात कई वर्षों से सर्वहारा समाज के कल्याण की हो रही है, जिसके स्वयंभू रहनुमाओं की लंबी कतारें हैं, परंतु धरातल पर सच्चाई सबकी ढोंग-सी लगती है। राष्ट्रपति चुनाव के चलते वंचितों की अंतिम लाइन में खड़े आदिवासियों की चर्चा इस वक्त हर ओर है। ये चर्चा सियासी है, जिस पर लोगों का ज्यादा एतबार नहीं है, क्योंकि सियासत अब संबंधों से नहीं चलती, बल्कि धन-बल, खरीद-फरोख्त तोड़-जोड़, बेवफाई-दगाबाजी से चलती है। कमोबेश, राष्ट्रपति चुनाव में ऐसी तस्वीरें दिख भी रही हैं। देश में प्रथम व्यक्ति कहलानेवाले महामहिम राष्ट्रपति का कार्य और उनकी अहमियत कितनी है, ये सभी जानते हैं, बताने की शायद जरूरत नहीं? पर, राष्ट्रपति अब एक ऐसा ओहदा बन गया जो सत्ता पक्ष के बिखरे वोट बैंक को समेटने और उसे साधने का काम करता है। भारतीय जनता पार्टी विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने द्रौपदी मुर्मू के रूप में हिंदुस्थान को पहला आदिवासी समुदाय का राष्ट्रपति देने का फैसला यूं ही अचानक नहीं लिया, इसके पीछे न सिर्फ दूरगामी सोच है, बल्कि कई सियासी मायने भी हैं। इस फैसले में अव्वल, तो बड़े आदिवासी समाज में द्रौपदी मुर्मू के बहाने अपनी पार्टी की साख को और मजबूत करना है। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा, बंगाल में आदिवासियों व वनवासियों की खासी तादात है, इसके अलावा आधे से ज्यादा राज्यों में छुटपुट संख्या भी इनकी बहुतायत है।
बहरहाल, सभी गणित को समझकर ही भाजपा ने द्रौपदी मुर्मू को मैदान में उतारा और उनके बहाने बड़ा वोटबैंक भी उसके हिस्से आएगा, जबकि कायदे से देखें तो आजादी के बीते ७५ वर्षों में आज तक इनकी स्थिति दयनीय और हाशिए पर रही है। सरकारें आई और गईं लेकिन किसी भी सरकार ने इनको जंगलों से निकालने की कोशिशें नहीं की। ये लोग बाहर निकले तो सिर्फ वोट डालने के लिए, वोट डालने के बाद फिर जंगलों में चले गए, किसी पार्टी को इनकी दशा पर दया नहीं आई। वनवासियों को अब द्रौपदी मुर्मू से उम्मीदें जगी हैं कि उनके राष्ट्रपति बनने के बाद शायद उनकी दयनीय स्थितियों में कुछ सुधार हो पाए। कहीं ऐसा न हो, इस बार भी ये समुदाय सिर्फ सियासी चक्रव्यूह में फंस जाए। पूर्ववर्ती सरकारों में इनके साथ सिर्फ छल ही हुआ।
फिलहाल, द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने में अभी कुछ पेच फंसा हुआ है। जीत का जादुई आंकड़ा अभी मुकम्मल नहीं हुआ है। पूरा करने के लिए हर तरह की तरकीबें हो रही हैं। महाराष्ट्र में हो रही सियासी खलबली भी इसी का हिस्सा है। अपने अंदाज में एनडीए विपक्षी दलों में सेंधमारी लगा रही है। प्यार से, तकरार से, सभी तरीकों से। वैसे, देशवासी द्रौपदी के नाम को लेकर भी अचंभित हैं। दरअसल, द्रौपदी मुर्मू का नाम कोई अचानक से तय नहीं हुआ, महीनों पहले फाइनल हो चुका था। राजस्थान में आदिवासी समाज के बीच जे.पी. नड्डा तीन महीने पहले ही अपना संदेश पहुंचा चुके थे। जब सवाई माधोपुर में भाजपा ने आदिवासी सम्मेलन किया था, अंदाजा तभी से लगाया जाने लगा था कि इस बार भाजपा आदिवासियों की घेराबंदी में लगी है। कुछ बड़ा होनेवाला है।
माधोपुर के सम्मेलन में नड्डा ने आदिवासी विधायकों के साथ लंबी चर्चा की थी। इसी सिलसिले में अमित शाह भी अपने गुजरात दौरे में आदिवासियों से मिले और उनके बीच घंटों बिताए। गुजरात सीमा से लगते आदिवासी इलाके में उनकी एक बड़ी रैली होनी थी लेकिन सुरक्षा कारणों के चलते ऐन वक्त पर रद्द कर दी। बीते शुक्रवार को जब द्रौपदी मुर्मू ने अपना पर्चा दाखिल किया तो उनके प्रस्तावकों में पांच विधायक राजस्थान से थे, वो सभी आदिवासी समाज से हैं। वहां के प्रस्तावक क्यों रखे गए, ये भी सियासी दांव पानी की तरह साफ है। भाजपा की दूरगामी नजर राजस्थान विधानसभा चुनाव पर भी टिकी है, जहां आदिवासियों के प्रभाव वाली ७०-७५ सीटें हैं। आदिवासी समाज पर शुरू से कांग्रेस का कब्जा रहा है, स्थानीय दलों में भी वोट बंटता रहा है, लेकिन इन्होंने ज्यादातर अपने मताधिकार का प्रयोग राष्ट्रीय दलों के लिए किया, लेकिन बीते कुछ वर्षों से भाजपा ने इस बहुसंख्यक आबादी की ताकत भांपी है, तभी उन्होंने आदिवासियों के वोट बैंक पर फोकस करना आरंभ किया। गौरतलब है कि अगर ये वोट भी भाजपा में चला गया तो कांग्रेस की गति और खराब हो जाएगी। निश्चित रूप से भाजपा का राष्ट्रपति चुनाव में मुर्मू के रूप में चला दांव कांग्रेस पर भारी पड़नेवाला है। फिर भी कांग्रेस अपने इस जनाधार में मची खलबली से बेखबर नहीं है, पूरी तरह से सतर्क है। यही कारण है कि हाल ही उदयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर के बाद आदिवासियों के गढ़ कहे जानेवाले बांसवाड़ा में बड़ी सभा की।
वहीं विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार के तौर पर भाजपा के बागी यशवंत सिन्हा भी ताल ठोंके हुए हैं। सन् २०१३ में नितिन गडकरी की कुर्सी खानेवाले सिन्हा भी जीत का दम भर रहे हैं। सिन्हा ने तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। उसके बाद गडकरी को पद छोड़ना पड़ा था, तब सिन्हा को आडवाणी का समर्थन था। पार्टी में उनकी बात वहीं से बिगड़ती चली गई, इतनी बिगड़ी कि पार्टी ने हाशिये पर धकेल दिया। सिन्हा ने २०१८ में भाजपा छोड़ दी और २०२१ में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए। फिलहाल राष्ट्रपति चुनाव में पूरा विपक्ष उनको जिताने में मुस्तैदी से लगा है। समर्थन जुटा रहे हैं। इस बार का चुनाव नीतीश कुमार जैसे नेताओं पर टिका है कि आखिर में उनका रुख किस तरफ मुड़ेगा, नीतीश-सिन्हा में अच्छी यारी है। सिन्हा का ताल्लुक भी बिहार से रहा है। बिहारी होने के नाते भी नीतीश साथ आ सकते हैं। इस बार क्रॉस वोटिंग भी होगी, इसकी संभावनाएं दिखने लगी हैं।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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