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राजधानी लाइव: राजनैतिक प्रयोग में जोखिम भी!

डॉ. रमेश ठाकुर / नई दिल्ली

भाजपा ने अचर्चित चेहरों के हाथ हिंदी पट्टी के तीन प्रांतों की कमान तो सौंप दी है, लेकिन अंदरखाने उसे भय भी सताने लगा है कि कहीं उनका ये राजनीतिक प्रयोग उल्टा न पड़ जाए। हालांकि, इन अप्रत्याशित पैâसलों के भीतर राजनीतिक संदेश भी बहुतेरे छुपे हैं, जो समय के साथ नफा-नुकसान के रूप में भविष्य में पता चलेंगे। वैसे देखा जाए तो भाजपा और उसके शीर्ष नेतृत्व ने हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में भारी जीत के बाद जिन अचर्चित चेहरों के हाथों में सत्ता की कमान सौंपी है, उससे ‘चौंकना’ शब्द भी फीका लगने लगा है। यह कुछ वैसा ही है, जैसे कोई जादूगर अपनी जेब में हाथ डाले और नोट किसी भीड़ में छिपे शख्स की जेब से निकले। राजनीति शास्त्र कहता है कि इस प्रयोग में पांच-छह संदेश दिए गए हैं। पहला-कोई खुद को पार्टी से ऊपर न समझे, दूसरा- भाजपा में संघ अभी भी पूरी तरह ताकतवर है, तीसरा- भाजपा में कोई साधारण कार्यकर्ता भी शीर्ष पद तक पहुंच सकता है, चौथा- भाजपा ने आने वाले १५ वर्षों तक राजनीति करनेवाले नए खून की फौज तैयार कर ली है, पांचवां-सोशल इंजीनियरिंग में भाजपा सभी राजनीतिक दलों से मीलों आगे है, छठा- इस बदलाव के जरिए भाजपा ने आगामी लोकसभा चुनाव की जमीन भी तैयार कर दी है और तकरीबन मुद्दे भी तय कर दिए हैं। मोदी वेंâद्र में किसी भी सूरत में तीसरी पारी खेलना चाहते हैं। लेकिन ‘इंडिया’ गठबंधन के नेता जब से एकत्र हुए हैं और पिछली मीटिंग भी सफल रही, तभी से और चौंकन्ने हो गए हैं। उनको पता है कि लोकसभा चुनाव में अगर ‘इंडिया’ गठबंधन मजबूत रहा तो उनके लिए जीतना आसान नहीं होगा। इसलिए वह चाहे जाति समीकरण हो या कुछ और, सभी में प्रयोग कर रहे हैं। पिछली मीटिंग में ‘इंडिया’ गठबंधन के सभी नेताओं का एक साथ आना भी भाजपा में खलबली मचा गया है।
ऐसा प्रतीत होता है- जैसे मोदी-शाह की जोड़ी ने क्षत्रप संस्कृति को समाप्त करके ‘एक हाईकमान कल्चर’ को लागू करके भविष्य में बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाने की ओर कदम बढ़ा दिया है। भविष्य में आत्मघाती भी हो सकता है उनका यह निर्णय। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही पार्टी का पूरी तरह आश्रित हो जाना संगठन की आंतरिक कमजोरी को दर्शाने लगा है। यानी जब मोदी नहीं रहेंगे, तब भाजपा का क्या होगा? क्या क्षत्रपों के खंभों के बिना पार्टी का तंत्र चरमराएगा नहीं? यह सवाल वाजिब है, लेकिन राजनीतिक दलों में समय रहते नए खून का संचार और उसके दिल-दिमाग तक पहुंचाने की प्रक्रिया अगर कुंद हो जाती है तो उन दलों का हाल काफी हद तक खराब हो सकता है। कौन सोच सकता था कि पश्चिम बंगाल में ३५ बरसों तक एकछत्र शासन करने के बाद आज बंगाल में माकपा को एक-एक सीट के लिए भी कांग्रेस के कंधों की जरूरत पड़ रही है।
त्रिपुरा में वह हाशिए पर चली गई है। राजस्थान और मप्र में कांग्रेस में सत्ता में रहते नए और पुराने खून के बीच खुली लड़ाई हुई, लेकिन कोई सकारात्मक पैâसला नहीं हो सका।
विपक्षी दलों व ‘इंडिया’ गठबंधन के प्रति भाजपा बेशक कितनी भी नकारात्मक बातें पैâलाए, लेकिन वो जानते हैं कि उन्हें टक्कर अच्छी मिलेगी। जीते हुए तीन राज्यों में भाजपा का वोट प्रतिशत ज्यादा नहीं है। फिर भी जहां तक प्रयोग की बात है, तो भाजपा ने पुराने चेहरों को सत्ता न सौंपने के पीछे भी एक वजह थी। भाजपा और संघ ने तीन राज्यों में राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव का जो निर्णय लिया है, उसमें भविष्य की तस्वीर दिखाई देगी। एक अटकल यह भी थी कि यदि तीनों राज्यों में लोकसभा चुनावों तक फिर पुराने चेहरों के हाथों में सत्ता थमा दी जाए तो बाद में कुर्सी से बेदखल करना नामुमकिन होगा। ताजा प्रयोग से चंद बड़े और बुजुर्ग नेता बहुत मायूस हैं। उनकी इस नाराजगी का खामियाजा भी भाजपा भुगत सकती है।
बहरहाल, आम चुनाव-२०२४ के लिए मोदी ने जातियों का अच्छा भूगोल सेट किया है। जैसे- छग में आदिवासी चेहरे विष्णुदेव साय को सीएम बनाकर समूचे आदिवासी समुदाय को यह संदेश दिया है कि आदिवासी भी हिंदू ही हैं और वो हमारे लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसी तरह मध्य प्रदेश में बिल्कुल अप्रत्याशित चेहरे डॉ. मोहन यादव को सीएम बनाकर यूपी और बिहार के यादवों को भी संदेश दिया गया है कि वो क्षेत्रीय पार्टियों के मोह से उबरें और भाजपा से जुड़ें। मध्य प्रदेश और राजस्थान में दलित डिप्टी सीएम बनाकर बहनजी मायावती और उनकी पार्टी के समर्थकों को संदेश है कि भाजपा में दलितों के लिए भी पूरी जगह है। मोदी के इस प्रयोग की समीक्षा ‘इंडिया’ गठबंधन अच्छे से कर रहा है। जातियों के हिसाब से ही वह अब सीट वितरण करेंगे।

(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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