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राजधानी लाइव : ‘एनडीए’ में सीट शेयरिंग पर जूतमपैजार, लेकिन चिंता ‘इंडिया गठबंधन’ की?

डॉ. रमेश ठाकुर नई दिल्ली

बीते कई दिनों से मीडिया में चौबीसों घंटे चर्चाएं ‘इंडिया गठबंधन’ में शामिल दलों के मध्य सीट शेयरिंग को लेकर गर्म हैं, जबकि इससे पहले तक चर्चाएं गठबंधन में टूटने-फूटने, एक-दूसरे से अलग होने की थीं लेकिन अब सीट शेयरिंग की शुरुआत उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से हो चुकी हैं, पर यहां एक वाजिब सवाल भाजपा और उनके गठबंधन एनडीए से होना बनता है। उनके गठबंधन में तो इंडिया से कहीं ज्यादा दल शामिल हैं। जयंत चौधरी, ओमप्रकाश राजभर व बिहार से नीतिश कुमार भी जुड़ गए हैं। सूचनाएं ऐसी भी हैं कि एकाध दल जुड़ने के लिए लाइन में लगे हैं। फिर भी एनडीए में सीट शेयरिंग को लेकर कहीं कोई चर्चा नहीं? जबकि एनडीए के अंदरखाने जूतमपैजार और मूड फुटव्वल जैसी स्थिति बनी हुई है? ये बात गोदी मीडिया को अच्छे से पता है, बावजूद वह चुप्पी साधे हुए है। एनडीए में शामिल ‘हम’ पार्टी के अध्यक्ष व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी आंखें दिखाने लगे हैं, वह अपने और अपने बेटे के लिए मनपसंद सीटों के अलावा जरूरत से ज्यादा भाजपा से डिमांड कर रहे हैं।
जीतन राम मांझी के अलावा उत्तर प्रदेश के सबसे बड़बोले नेताओं में शुमार ओमप्रकाश राजभर भी विरोध में उतर चुके हैं। दो-दिन पहले उन्होंने मीडिया में खुलकर बोल दिया है कि पहले उन्हें उत्तर प्रदेश वैâबिनेट में मंत्री बनाए। वरना, वो लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी नहीं होने देंगे। उनकी डिमांड है कि उनको मंत्री पद और मनपसंद लोकसभा सीटें मिलना, लेकिन शायद ही उनकी ये दोनों मांगें आसानी से भाजपा माने? क्योंकि उनके और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच छत्तीस का आंकड़ा बहुत पहले से है। राजभर मुख्यमंत्री को खूब अनाप-शनाप बोल चुके हैं। सभी जानते हैं कि राजभर को एनडीए में शामिल दिल्ली के नेताओं द्वारा करवाया गया था। उनकी नियुक्ति में योगी की ‘हां’ कतई नहीं थी। योगी चाहते भी नहीं थे कि राजभर एनडीए में दोबारा आएं। सूचनाएं ऐसी भी हैं कि राजभर योगी से मिलने का वक्त मांगते हैं और मंत्री बनाने के वादे पर चर्चा करना चाहते हैं। लेकिन योगी आदित्यनाथ उनसे नहीं मिलते। अब तो उन्हें कहलवा भी दिया है कि वादों के संबंध में दिल्ली जाकर शीर्ष नेताओं से बात करें।
इसलिए बीते कुछ दिनों से राजभर खासे परेशान हैं। वो सोच में पड़े हैं कि कहीं उनके साथ खेला तो नहीं हो गया। इन घटनाओं पर भी मीडिया एकदम शांत है। दरअसल, मीडिया को सबसे ज्यादा दिलचस्पी इंडिया गठबंधन में ही है। उत्तर प्रदेश में बात बनने के बाद अब दिल्ली में भी कांग्रेस-आप के बीच सीटों के बंटवारे का मसला तकरीबन सुलझता दिख रहा है। ये देखकर मीडिया काफी परेशान है। दिल्ली में लोकसभा की सात सीटें हैं, जिन पर फिलहाल भाजपा का कब्जा हैं। लेकिन सियासी गणित इस बार उनका बिगड़ता दिख रहा है। अगर कांग्रेस-आप में बात बन गई, तो दोनों के वोटरों के मिलने से भाजपा सातों सीटों पर शून्य पर पहुंच जाएगी। बीते शुक्रवार को आम आदमी पार्टी के नेताओं ने एक प्रेस वार्ता करके इसी मसले को लेकर बड़ा खुलासा भी किया। बता दें कि भाजपा वाले कांग्रेस नेताओं को फोन करके धमकाने लगे हैं कि अगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी से सीट शेयरिंग की, तो उनके पीछे सीबीआई-ईडी लगवा दी जाएगी।
प्रधानमंत्री बेशक इस बार ३७० का नारा बुलंद किए हों। पर अंदरखाने बिगड़ती सियासी कहानी से वो अभी से वाकिफ हैं। यूपी में कांग्रेस-सपा का एक साथ आने का मतलब है कि भाजपा की चुनावी रणनीति को (एम-वाई) मुस्लिम यादव पैâक्टर द्वारा खराब करना। यूपी में बहुतेरी ऐसी सीटें हैं, जहां मुस्लिम-यादव वोटर किसी भी उम्मीदवार को जिताने का माद्दा रखते हैं। जयंत चौधरी बेशक एनडीए में चले गए हों, लेकिन उनके इस निर्णय से उनके समुदाय में ज्यादा खुशी नहीं है, हो सकता है कि नाराज होकर उनके पारंपरिक वोटर उनसे छिटक भी जाएं। भाजपा के लिए इस वक्त सबसे परेशानी का सबब किसान आंदोलन बना हुआ है। सिख समुदाय प्रधानमंत्री से बेहद खफा है। किसानों पर आंसू गैस के गोले छोड़े जा रहे हैं, उन्हें खालिस्तानी बोला जा रहा है। दिल्ली में घुसने नहीं देने के लिए हर प्रकार के जुल्म बरपाए जा रहे हैं। किसानों ने तय किया है कि इस बार वो भाजपा को वोट नहीं देंगे। इससे भाजपा में और खलबली मच गई है। कांग्रेस खुलकर आरोप लगा रही है कि देश में चुनावी माहौल भाजपा के एकदम विपरीत है, लेकिन ईवीएम में गड़बड़ी करके वो जीतने का प्रयास करेगी। हालांकि, इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने ‘ईवीएम हटाओ अभियान’ छेड़ा हुआ है।
वहीं पिछले सप्ताह जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक पर ईडी-सीबीआई छापे डलवाकर खाप पंचायतों से भी प्रधानमंत्री ने खुलेआम दुश्मनी मोल ले ली! खाप पंचायतों ने सीधे प्रधानमंत्री को ललकारते हुए बोल दिया है कि अगर मलिक साहब को कुछ भी हुआ तो तबाही मचा देंगे। इस लिहाज से पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी के जाट नेता भाजपा से पूरी तरह से नाराज हो चुके हैं। निश्चित रूप से ये नाराजगी भाजपा को आगामी लोकसभा चुनाव में महंगी पड़ेगी। एनडीए में क्षत्रपों की भरमार के बावजूद कई राज्य भाजपा से दूर हो गए हैं। कुछ प्रदेशों में तो सूपड़ा साफ है। इन उभरती डरावनी तस्वीरों को देखकर लगता नहीं, भाजपा ३७० का आंकड़ा पार कर पाएगी।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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