मुख्यपृष्ठस्तंभराजधानी लाइव :  सियासी साजिश का शिकार हुईं महुआ?

राजधानी लाइव :  सियासी साजिश का शिकार हुईं महुआ?

डॉ. रमेश ठाकुर नई दिल्ली

राज‘नीति’ में समझदारी और ज्यादा पढ़े-लिखे होने की जरूरत नहीं होती। बस, खुराफाती दिमाग और शैतानी सियासी हथकंड़े आते हों। वरना, कोई भी महुआ मोइत्रा की तरह गच्चा खा जाएगा। खैर, ‘कैश फॉर क्वेरी’ मामले में आखिरकार टीएमसी की महिला सांसद महुआ मोइत्रा को लोकसभा की समिति ने नाप दिया। ये सामान्य घटना नहीं है, बल्कि संसदीय इतिहास की बड़ी घटनाओं में दर्ज होगी और लंबे समय तक याद की जाएगी। महुआ पर आरोप थे कि उन्होंने पैसे लेकर संसद सत्र में सवाल पूछे। हालांकि, एक नजर में ये आरोप उतना गंभीर नहीं दिखता कि जितना गंभीर बनाया गया। इससे भी बड़े कांड संसद में हुए। ऐसा शुरू से होता आया है कि प्रत्येक सांसद अपने क्षेत्र की जनता से पूछकर ही संसद सत्र में सवाल पूछते हैं या उन्हें प्रबुद्ध लोग अपने से कुछ सुझाव देते हैं। देखिए, संसद को लोकतंत्र का मंदिर यूं ही नहीं कहा जाता। जहां देश की दशा और दिशा तय होती है। नए कानूनों के बनाए जाने से लेकर विभिन्न किस्म की लोक निर्माण की विकासीय योजनाओं की नींव रखी जाती है।
देशवासी इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि सत्र का एक-एक मिनट अपने आप में कीमती होता है। महुआ मोइत्रा के निष्कासन के बाद संसदीय व्यवस्था में लकीर खिंच जानी चाहिए कि भविष्य में कोई भी सांसद सत्र के दौरान संसद की गरिमा से छेड़छाड़ करेगा तो उसके साथ भी महुआ मोइत्रा जैसा सलूक किया जाएगा, फिर चाहें वो सत्ताधारी हो या विपक्ष का कोई सदस्य। लेकिन ऐसा होता कभी नहीं है, भेदभाव जरूर किया जाता है। अगर भेदभाव न किया जाता तो भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी का मामला भी ताजा उदाहरण है, जिन्होंने खुलेआम संसद के भीतर एक मुसिलम सांसद को न सिर्फ सड़क छाप गालियां दीं, बल्कि उन्हें आतंकवादी तक कहा। उनकी गलती को भाजपा ने हल्के में लेकर माफी मंगवाकर छोड़ दिया।
बहरहाल, महुआ मोइत्रा का जब मुद्दा गर्म था, तब ऐसा प्रतीत हुआ था कि महिला समझकर रहम कर दिया जाएगा या माफी मंगवाकर चेतावनी देकर छोड़ दिया जाएगा, पर वैसा हुआ नहीं। लोकसभा द्वारा जबरदस्त एक्शन लिया गया। भाजपा ने महुआ का मसला ठंडा नहीं होने दिया, गर्माए रखा, तभी बीते शुक्रवार यानी आठ दिसंबर को उन्हें संसद की सदस्यता से सस्पेंड किया गया, लेकिन इस सस्पेंशन ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर इतनी जल्दी क्या थी सस्पेंशन की? थोड़ा इंतजार कर लेते, सत्र निपट जाने देते। उसके बाद अध्यक्ष ओम बिरला अपना फैसला सुना सकते थे, लेकिन शायद ये सजा पहले से तय हो चुकी थी। बस, दिन और समय का मुकर्रर होना बाकी था। भाजपा ने पटकथा ऐसे लिखी कि महुआ की बेदखली शीतकालीन सत्र में और सभी सांसदों की मौजूदगी में हो, हुआ भी वैसा ही।
ओम बिरला ने आठ दिसंबर को महुआ मोइत्रा का सस्पेंशन जैसे ही सार्वजनिक किया, मानो पूरी संसद में सन्नाटा ही छा गया हो। संसदीय परंपरा में महिला सांसदों पर इतनी कठोर सजा शायद पहली बार दी गई और वह भी तत्काल प्रभाव से। संसद से निकालना ये किसी भी सांसद के लिए अपमान वाली बात है। लोकतंत्र के मंदिर में इससे बड़ी दूसरी बेइज्जती शायद कोई और हो। हांलाकि, विभिन्न सियासी दलों के नेताओं ने महुआ के निष्कासन को गैर-कानूनी बताया है। इसको लेकर कई प्रमुख नेताओं ने केंद्र सरकार व भाजपा नेताओं पर तीखा हमला बोला है। निष्कासन के करीब दो घंटे बाद महुआ खुद भी बोली, कहा उनके पास लड़ने के लिए अभी पूरी उम्र पड़ी है। वह भाजपा से अंदर-बाहर और यहां तक कि गटर में भी लड़ती रहेंगी। मोइत्रा ने अपने निष्कासन की तुलना ‘कंगारू अदालत’ के सजा दिए जाने से की। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार लोकसभा की आचार समिति को विपक्ष को झुकाने के लिए हथियार बना चुकी है।
लोकसभा ने महुआ मोइत्रा के सस्पेंशन को ‘अनैतिक और अशोभनीय आचरण’ बताया है, जिससे उनकी सदस्यता छिन गई है, लेकिन इन दोनों शब्दों का उल्लंघन तो कई बार संसद के भीतर हुआ। कभी नोट की गड्डियां लहराई जाती हैं, आपस में गाली-गलौच करना, अभद्रता और आतंकवादी कहना जैसे कृत्य तो आम हो गए हैं। संदेह एक और होता है कि आखिर महुआ मोइत्रा को एक्सपोज किसने किया और किसकी साजिश पर हुआ। फोन, ईमेल का पासवर्ड वैâसे अन्य के पास पहुंचा। मामले को लीक किसने किया। क्या इसमें कोई टीएमसी का नेता है या कोई भाजपा का ही बंदा था। निश्चित रूप से महुआ के लिए ये उनकी राजनीतिक हत्या है। ये साजिश उनके साथ कीr किसने, इसकी तह तक उन्हें जाने की जरूरत है। महुआ मोइत्रा राजनीतिक दांव पेंच में अभी बहुत नादान हैं, इसलिए वो गच्चा खा गईं। वरना, कोई माहिर खिलाड़ी होता, आसानी से बच निकल जाता, जैसे रमेश बिधूड़ी बच गए। रमेश बिधूड़ी के बोले शब्द कोई कांग्रेस या अन्य दल का सांसद बोल देता तो भाजपा धरती आसमान एक कर देती।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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