मुख्यपृष्ठस्तंभराजधानी लाइव: क्या पूर्व राष्ट्रपति का समिति प्रमुख बनना जायज है?

राजधानी लाइव: क्या पूर्व राष्ट्रपति का समिति प्रमुख बनना जायज है?

सत्ता का सुख जिसने भी एक दफे भोग लिया, वह उससे दूर नहीं होना चाहता, वह उसका आदी हो जाता है। पद-प्रतिष्ठा राज करना और राजनीति सुख भोगने के साधन बन गए हैं, पर कुछ लोग अब भी लाज बचाए हुए हैं। व्यक्ति चाहे सर्वोच्च पद पर आसीन रहा हो या अन्य किसी मंत्री जैसे सत्ताई औहदे पर? तत्कालिक कुछ घटनाएं ऐसी घटी हैं, जो इस बात की तस्दीक करती हैं। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ताजा उदाहरण हैं। वे देश के सर्वोच्च महामहिम पद पर पांच वर्ष रहे और जैसे ही उनका कार्यकाल पूरा हुआ। उनकी चहलकदमी राजनीतिक गलियारों में नेताओं की भांति दिखने लगी। रिटायरमेंट के बाद एक दिन भी चैन से नहीं बैठे। प्रधानमंत्री से लेकर शीर्ष केंद्रीय मंत्रियों से मिलने के अलावा भाजपा के बड़े नेताओं के घर उनका पहुंचना, सीधे-सीधे इशारा करता था कि वह अपने लिए अभी भी कुछ चाहते हैं।
रामनाथ कोविंद पिछले दिनों संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत से मिले और अगले ही दिन उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन से मिलने राजभवन गए। कुल मिलाकर जबसे वह राष्टृपति के औहदे से पदमुक्त हुए हैं, उसी दिन से अपने लिए अन्य जिम्मेदारी के लिए भागदौड़ शुरू कर दी है। हालांकि, इसमें कोई बुरी बात नहीं? व्यक्ति को ताउम्र कुछ करते रहना चाहिए, पर कुछ संवैधानिक मान्यताएं और सम्मान के तौर पर गरिमाएं होती हैं, जिनका ख्याल रखना होता है। उदाहरण के तौर पर ‘एक हेड मास्टर’ अगर फिर से ये कहे कि मुझे जूनियर अध्यापक के तौर पर फिर से स्कूल में पढ़ाना है तो निश्चित रूप से किसी को भी अटपटा लगेगा। खैर, वक्त बदलाव का है, जिसमें इतिहास से लेकर सब कुछ बदला जाने लगा है। देश में हमेशा रहने वाले ‘चुनावी उत्सव’ को अब खत्म करने की तैयारी है।
बात यहां अब पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की है तो उनसे पहले किसी पूर्व राष्ट्रपति ने उनके जैसा निर्णय नहीं लिया। पूर्व के राष्ट्रपति जितने भी हुए उन्होंने अपना कार्यकाल खत्म करके राजनीतिक, सरकारी, सामाजिक क्रियाकलापों से दूरी बनाई। रामनाथ कोविंद का फिर राजनीति में लौटना, देशवासियों के लिए सूरज का दूसरी दिशा में निकलने जैसा है। चुनाव लड़कर मंत्री भी बन जाए, इसमें भी कोई बड़ी बात नहीं? क्योंकि नियम-कानूनों का अब किसी को कोई डर नहीं? जरूरत के हिसाब से वह कभी भी बदले जा सकते हैं। फिलहाल, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की दौड़ भाग रंग लाई है। केंद्र सरकार ने उनको बड़ा इनाम दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेहरबानी से वह फिर राजनीतिक गलियारों में पहले जैसे सक्रिय हुए हैं। केंद्र सरकार ने उन्हें बड़ी जिम्मेदारी सौंपी हैं। सरकार की नई-नवेली मुहिम ‘एक देश, एक चुनाव’ जिसमें लोकसभा, राज्यों की विधानसभाएं, नगर-निकायों और पंचायतों के चुनाव एक साथ कराने की संभावनाओं वाली कमिटी का उन्हें अध्यक्ष बनाया गया है।
बहरहाल, चुनावी पंडित और संवैधानिक विशेषज्ञ मानते हैं कि ये पद किसी कानून के ज्ञाता को दिया जाना चाहिए था। हालांकि, समिति में गृहमंत्री अमित शाह, कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी, वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद, वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एन.के. सिंह, संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप, वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे, सतर्कता आयोग के पूर्व अध्यक्ष संजय कोठारी, केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल व विधि मंत्रालय के सचिव नितेन चंद्रा भी हैं। यहां एक विरोध और खड़ा हो गया है। समिति में कांग्रेस के अलावा किसी अन्य दल के नेता को शामिल करना केंद्र सरकार ने उचित नहीं समझा? ये सवाल भी खड़ा है। समिति में कुल आठ सदस्य हैं, जिनमें दो विशेष आमंत्रित सदस्य भी हैं। कायदे से देखें तो ज्यादातर सरकार या उनके पक्ष-समर्थक ही हैं। समित का काम तेजी से चल रहा है। विशेष संसद सत्र तक पूरा मसौदा तैयार करना है। क्योंकि हो सकता है आगामी लोकसभा चुनाव समय से पहले कराए जाएं?
गौरतलब है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ का फॉर्मूला निश्चित रूप से बड़ा पेचिदा विषय है। इसमें जिद और जिम्मेदारी की कड़ी परीक्षा होनेवाली है। ऐसा हो, यह प्रधानमंत्री की जिद है। वहीं जहां तक जिम्मेदारी की बात है, वह अभी तय नहीं है। अगर ये फॉर्मूला खुदा न खास्ता फेल होता है तो उसकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री अपने पर नहीं लेंगे। हालांकि, जब से ये मसौदा केंद्र सरकार की ओर से सार्वजनिक हुआ है, तभी राजनीतिक विरोध होना शुरू हो गया। ज्यादातर विपक्षी दल इसके पक्ष में नहीं हैं। शिवसेना ‘एक देश, एक चुनाव’ के जगह निष्पक्ष चुनाव की वकालत करती है, कमोबेश समूचा देश भी यही चाहता है कि चुनाव पूरी तरह से फेयर हों? देश का वर्ग ऐसा है, जिन्हें संदेह है कि बीते दो आम चुनाव २०१४ और २०१९ में कुछ गड़बड़ी हुई थी। ईवीएम मशीन को लेकर सवाल तो हमेशा से उठते रहे हैं। ‘एक देश, एक चुनाव’ को लेकर संदेह के बादल तभी छटेंगे, जब संसद का विशेष सत्र होगा। तब तक देश की राजनीति यूं ही गर्म रहेगी।

डॉ. रमेश ठाकुर, नई दिल्ली
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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