मुख्यपृष्ठग्लैमरजितना तपोगे उतना निखरोगे! -राजू श्रीवास्तव

जितना तपोगे उतना निखरोगे! -राजू श्रीवास्तव

टीवी की दुनिया में कई कॉमेडी कार्यक्रम का आयोजन होता रहा है। समय के साथ-साथ कॉमेडी का फॉर्मेट भी बदलता रहता है। कुछ लोगों का मानना है कि बीते दशक भर में कॉमेडी में फूहड़पन व अश्लीलता परोसी जाने लगी है, जो एक वर्ग व सीमित समय तक कारगर होती है। लगभग सभी पुराने कॉमेडियन इस बात का विरोध करते हैं। इस मुद्दे पर देश के मशहूर कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव से योगेश कुमार सोनी ने विस्तृत बात की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश-

 क्या आपको लगता है कि कॉमेडी का फॉर्मेट बदल गया है और अश्लीलता कॉमेडी की पर्यायवाची बनती जा रही है?
अब कॉमेडी भेड़चाल की भेंट चढ़ने लगी है। नए कॉमेडियन को बहुत जल्दी फेमस होने की लगी रहती है, जिसके चलते वह शॉर्टकट अपनाना चाहता है और कॉमेडी में शॉर्टकट मतलब अश्लीलता परोसना माना जाने लगा। सोशल मीडिया के दौर में बहुत सारे कॉमेडियन निकलकर सामने आ रहे हैं, जो अपने पर मजाक बनाते हैं और वैसे हम भी कर लेते हैं लेकिन कुछ अपने माता-पिता व परिजनों का भी बेहद गंदा मजाक बनाकर प्रस्तुत करते हैं, जो बेहद निंदनीय व दुर्भाग्यपूर्ण है।
 अब फिल्में सिनेमा घरों में ही नहीं, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी रिलीज होने लगीं। इससे कलाकारों और सिनेमा तंत्र को नुकसान हो रहा है या फायदा?
कलाकारों की बात करें तो वे अपनी उतनी ही फीस वसूल रहे हैं, जितनी लेते हैं। बात रही सिनेमा तंत्र की तो लगभग पिछले पांच वर्षों से लगातार लोग अब ओटीटी प्लेटफॉर्म का प्रयोग कर रहे हैं। बदलाव प्रकृति का नियम है, तो हमें उसका स्वागत करना चाहिए। ओटीटी के यदि किसी भी प्लेटफॉर्म पर एक बार सालाना शुल्क दे देते हो, जो लगभग दो सिनेमा की टिकटों की कीमत के बराबर होता है, उस पर कई फिल्में देखी जा सकती हैं।
 क्या अब फूहड़ता का भी मतलब कॉमेडी रह गया। इस मामले आपका क्या नजरिया है?
यहां हर किसी की अपनी सोच है लेकिन यदि मैं अपनी बात करूं तो मैं वैसे रोल करना बिल्कुल पसंद नहीं करता, जिससे आप मेरे कार्यक्रमों को परिवार के साथ न देख पाएं। मैं कभी भी कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता पसंद नहीं करता। जबसे मैंने करियर की शुरुआत की है, तबसे मैंने हर तरह के किरदार को निभाया। मेरा मानना है कि आप किसी घटना पर कॉमेडी कर सकते हैं, बशर्ते सधे हुए शब्दों का अर्थ निकलना चाहिए। ऐसी स्थिति में दर्शकों को हर तरह की कॉमेडी अच्छी लगती है। वैसे कॉमेडी करना हर किसी के बस की बात नहीं।
 नए कलाकारों का कहना है कि उन्हें सिनेमा जगत में आने के लिए पहले की अपेक्षा ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है। आपकी क्या राय है?
बिल्कुल गलत बात है। हर कोई बहुत संघर्ष करता है। दरअसल, नई पीढ़ी की समस्या यह है कि उन्हें सब कुछ बहुत जल्दी चाहिए। हमें तो ऐसा लगता है कि पहले जमाने में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए ज्यादा संघर्ष करना पड़ता था और अब तो तमाम सोशल माध्यम आ गए हैं, जिससे वह अपनी कलाकारी को उन पर दर्शा सकते हैं। इसके अलावा अहम बात यह है कि जिसकी कलाकारी बेहतर होगी वो चलेगा। यदि आप किसी बड़े स्टार के बच्चे भी हैं तो आपको एक-दो फिल्में तो मिल जाएंगी लेकिन लंबे समय तक टिके रहने के लिए मेहनत व बेहतर कलाकारी की जरूरत पड़ेगी।
 पाठकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
किसी भी क्षेत्र में सफलता पाना बहुत मुश्किल होता है लेकिन लगन से किया हुआ काम निश्चित तौर पर आपको विजय प्राप्त कराता है। शॉर्टकट मारने से कुछ समय तक तो फायदा लगता है लेकिन ऐसा व्यक्ति लंबी रेस का घोड़ा नहीं होता। जितना तपोगे, उतना निखरोगे।
 क्या आपको लगता है कि कॉमेडी का फॉर्मेट बदल गया है और अश्लीलता कॉमेडी की पर्यायवाची बनती जा रही है?
अब कॉमेडी भेड़चाल की भेंट चढ़ने लगी है। नए कॉमेडियन को बहुत जल्दी फेमस होने की लगी रहती है, जिसके चलते वह शॉर्टकट अपनाना चाहता है और कॉमेडी में शॉर्टकट मतलब अश्लीलता परोसना माना जाने लगा। सोशल मीडिया के दौर में बहुत सारे कॉमेडियन निकलकर सामने आ रहे हैं, जो अपने पर मजाक बनाते हैं और वैसे हम भी कर लेते हैं लेकिन कुछ अपने माता-पिता व परिजनों का भी बेहद गंदा मजाक बनाकर प्रस्तुत करते हैं, जो बेहद निंदनीय व दुर्भाग्यपूर्ण है।
 अब फिल्में सिनेमा घरों में ही नहीं, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी रिलीज होने लगीं। इससे कलाकारों और सिनेमा तंत्र को नुकसान हो रहा है या फायदा?
कलाकारों की बात करें तो वे अपनी उतनी ही फीस वसूल रहे हैं, जितनी लेते हैं। बात रही सिनेमा तंत्र की तो लगभग पिछले पांच वर्षों से लगातार लोग अब ओटीटी प्लेटफॉर्म का प्रयोग कर रहे हैं। बदलाव प्रकृति का नियम है, तो हमें उसका स्वागत करना चाहिए। ओटीटी के यदि किसी भी प्लेटफॉर्म पर एक बार सालाना शुल्क दे देते हो, जो लगभग दो सिनेमा की टिकटों की कीमत के बराबर होता है, उस पर कई फिल्में देखी जा सकती हैं।
 क्या अब फूहड़ता का भी मतलब कॉमेडी रह गया। इस मामले आपका क्या नजरिया है?
यहां हर किसी की अपनी सोच है लेकिन यदि मैं अपनी बात करूं तो मैं वैसे रोल करना बिल्कुल पसंद नहीं करता, जिससे आप मेरे कार्यक्रमों को परिवार के साथ न देख पाएं। मैं कभी भी कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता पसंद नहीं करता। जबसे मैंने करियर की शुरुआत की है, तबसे मैंने हर तरह के किरदार को निभाया। मेरा मानना है कि आप किसी घटना पर कॉमेडी कर सकते हैं, बशर्ते सधे हुए शब्दों का अर्थ निकलना चाहिए। ऐसी स्थिति में दर्शकों को हर तरह की कॉमेडी अच्छी लगती है। वैसे कॉमेडी करना हर किसी के बस की बात नहीं।
 नए कलाकारों का कहना है कि उन्हें सिनेमा जगत में आने के लिए पहले की अपेक्षा ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है। आपकी क्या राय है?
बिल्कुल गलत बात है। हर कोई बहुत संघर्ष करता है। दरअसल, नई पीढ़ी की समस्या यह है कि उन्हें सब कुछ बहुत जल्दी चाहिए। हमें तो ऐसा लगता है कि पहले जमाने में अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए ज्यादा संघर्ष करना पड़ता था और अब तो तमाम सोशल माध्यम आ गए हैं, जिससे वह अपनी कलाकारी को उन पर दर्शा सकते हैं। इसके अलावा अहम बात यह है कि जिसकी कलाकारी बेहतर होगी वो चलेगा। यदि आप किसी बड़े स्टार के बच्चे भी हैं तो आपको एक-दो फिल्में तो मिल जाएंगी लेकिन लंबे समय तक टिके रहने के लिए मेहनत व बेहतर कलाकारी की जरूरत पड़ेगी।
 पाठकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
किसी भी क्षेत्र में सफलता पाना बहुत मुश्किल होता है लेकिन लगन से किया हुआ काम निश्चित तौर पर आपको विजय प्राप्त कराता है। शॉर्टकट मारने से कुछ समय तक तो फायदा लगता है लेकिन ऐसा व्यक्ति लंबी रेस का घोड़ा नहीं होता। जितना तपोगे, उतना निखरोगे।

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