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बलात्कार, मुआवजा और चेक!

पीड़िता का शव जब दिल्ली से निकल रहा था तब हाथरस जिला प्रशासन गुपचुप तरीके से शव को ठिकाने लगाने की तैयारी में था। परिजनों, मीडिया, गांव वालों किसी को कानोंकान भनक तक नहीं हुई। लेकिन इतना जरूर है कि शव के साथ जो अमानवीय व्यवहार हाथरस प्रशासन ने किया, उसकी माफी जिंदा इंसान नहीं दे सकता। उसकी सजा देर-सबेर भगवान ही देगा। प्रशासन ने सनातन संस्कृति का भी ख्याल नहीं रखा। दिन छिपने के बाद मृत शरीर को अग्नि नहीं दी जाती। लेकिन पुलिसकर्मी रात के अंधेरे में शव को आग के हवाले करके भाग गए। घटना पिछले माह १४ तारीख को घटी, तब से लेकर ३० तारीख की रात ढाई बजे तक पर्दे के पीछे जो हुआ, उसकी हम-आप कल्पना भी नहीं कर सकते। पीड़िता के परिवार को कुल १० लाख रुपए दिए गए हैं। दो किस्तों में, पहली किस्त ४ लाख १२ हजार ५०० रुपए २७ तारीख को दिए। वहीं, दूसरी किस्त शव को जलाने से पहले। प्रशासन ने जो कृत्य किया है, उसकी आलोचना न सिर्फ हिंदुस्थान में हो रही है, बल्कि कई अन्य देशों में भी थू-थू हो रही है। हाथरस घटना पर केंद्र सरकार की चुप्पी बहुत कुछ कहती है।

हुकूमतें जानती हैं गरीबी की खुराक क्या है? सरकारी भाषा में उस खुराक को ‘मुआवजा’ कहते हैं। जो पीड़ितों की बेबसी के घाव पर मरहम-पट्टी का काम करती हैं। गरीबों के साथ घटित किसी भी भयानक, दिल दहला देनेवाली बड़ी घटना में सरकारें पुलिस-प्रशासन मुआवजे को ही हथियार बनाती हैं। हाथरस रेपकांड में भी यही हुआ। सामूहिक बलात्कार पीड़िता का शव दिल्ली से रात डेढ़ बजे जैसे ही उनके घर पहुंचा, प्रशासन ने झट से परिजनों को ५ लाख ८७ हजार का चेक थमाया और शांत रहने को कहा। परिजन नहीं माने तो उनको घर में बंद कर शव को लेकर निकल गए किसी अज्ञात जगह। उस वक्त उनसे किसी ने भी यह सवाल नहीं किया कि मुआवजे का चेक क्या पहले से तैयार किया हुआ था? ऐसा प्रतीत होता है, सब कुछ प्लानिंग के तहत किया गया। पीड़िता का शव जब दिल्ली से निकल रहा था तब हाथरस जिला प्रशासन गुपचुप तरीके से शव को ठिकाने लगाने की तैयारी में था। परिजनों, मीडिया, गांव वालों किसी को कानोंकान भनक तक नहीं हुई। लेकिन इतना जरूर है कि शव के साथ जो अमानवीय व्यवहार हाथरस प्रशासन ने किया, उसकी माफी जिंदा इंसान नहीं दे सकता। उसकी सजा देर-सबेर भगवान ही देगा। प्रशासन ने सनातन संस्कृति का भी ख्याल नहीं रखा। दिन छिपने के बाद मृत शरीर को अग्नि नहीं दी जाती। लेकिन पुलिसकर्मी रात के अंधेरे में शव को आग के हवाले करके भाग गए। घटना पिछले माह १४ तारीख को घटी, तब से लेकर ३० तारीख की रात ढाई बजे तक पर्दे के पीछे जो हुआ, उसकी हम-आप कल्पना भी नहीं कर सकते। पीड़िता के परिवार को कुल १० लाख रुपए दिए गए हैं। दो किस्तों में, पहली किस्त ४ लाख १२ हजार ५०० रुपए २७ तारीख को दिए। वहीं, दूसरी किस्त शव को जलाने से पहले। प्रशासन ने जो कृत्य किया है, उसकी आलोचना न सिर्फ हिंदुस्थान में हो रही है, बल्कि कई अन्य देशों में भी थू-थू हो रही है।
हाथरस घटना पर केंद्र सरकार की चुप्पी बहुत कुछ कहती है। अभी तक किसी बड़े नेता ने घटना के संबंध में बयान नहीं दिया। कोई पूछता भी है तो सवालों से बच निकलते हैं। घटना को लेकर यूपी सरकार चारों तरफ से घिर चुकी है। घटना वाले गांव को सील कर दिया गया है। हजारों पुलिसकर्मियों की तैनाती है। मामला ज्यादा बढ़ने पर आनन-फानन में जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक से लेकर जिले के तकरीबन सभी आला अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया है जबकि, ये सभी अधिकारी शासन के आदेश का ही पालन कर रहे थे। उपर से जो आदेश मिल रहे थे, उसे ही फॉलो कर रहे थे। पीड़ित परिवार को नजरबंद किया हुआ है, किसी से बातचीत करने की इजाजत नहीं है। पूरे इलाके में धारा-१४४ लागू कर दी गई। सवाल उठता है ऐसा क्यों किया जा रहा है? क्या छुपाया जा रहा है? कौन सा ऐसा राज है जिसके खुलने से शासन को परेशानी होगी? अगर कोई राज है भी तो वह आज नहीं तो कल खुलेगा जरूर?
हाथरस पीड़ित परिवार की परेशानियों का दूसरा दौर गांव से मीडिया के कैमरों के हटने के बाद शुरू होगा। मामला जब थोड़ा ठंडा पड़ेगा, तब सांकेतिक रूप से परिवार शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना का वह दंश झेलेगा, जिसे हम-आप और स्टूडियो में बैठे डिजाइनर पत्रकार कल्पना तक नहीं कर सकेंगे? आरोपियों का परिवार अभी शांत है। सिर्फ धमकियां ही दे रहा है। पीड़ित परिवार को नर्क जैसा जीवन देने की फुल प्लानिंग है। हाथरस का नासमझ जिलाधिकारी वैसे, ठीक ही बोल रहा था कि मीडिया आज है कल नहीं होगा? मामले की तपिश से सूबे की हुकूमत भी तपने लगी है। हालांकि उन्हें डरने की जरूरत नहीं, सभी सबूत मिट चुके हैं। बावजूद इसके अगर तपिश और बढ़ी तो दोष अधिकारियों पर मढ़ कर उन्हें हटा दिया जाएगा या फिर बर्खास्त कर देंगे। हुआ भी वैसा ही। सभी अधिकारियों को नाप दिया गया है। लेकिन बावजूद इसके सरकार पर लगे दाग धुल नहीं सकते।
मामले का आक्रोश पूरे देश में व्याप्त है। हाथरस के बाद राजस्थान, बलरामपुर आदि जगहों से भी ऐसी ही खबरें चर्चा में हैं। दिल्ली में विपक्ष की सभी पार्टिययां विरोध प्रर्दशन कर रही हैं। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी से लेकर कई बड़े नेता सड़कों पर उतरे हुए हैं। केंद्र सरकार पर्दे के पीछे से मामले को शांत करना चाहती है। लेकिन मामला शांत होने की बजाय उग्र हो रहा है। बिहार विधानसभा चुनावों की तैयारियों में भी खलल पड़ रहा है। फिलहाल विपक्ष को हाथरस का बड़ा मुद्दा हाथ लग गया है। हाथरस घटना में अभी सफेद हाथी जैसी संस्थाएं भी ड्रामा करने पहुंचेंगी। मानवाधिकार आयोग की टीम भी जाएगी। तो उनके लिए भी बिस्किट और चाय का बंदोबस्त ठीक उसी तरह से किया जा चुका होगा, जैसे पीड़िता का शव दिल्ली से गांव पहुंचने से पहले ही प्रशासन ने जलाने के लिए अंधेरी रात में चिता का इंतजाम किया हुआ था।
चिता के लिए रात में लकड़ी कहां से लानी है, शव आग में जल्दी स्वाहा हो, इसके लिए दस लीटर पेट्रोल का इंतजाम, शव को कहां जलाना है, सब कुछ पहले से सुनिश्चित किया जा चुका था। चिता सज चुकी थी, बस शव के आने का इंतजार था। दाद देनी चाहिए हमें हाथरस जिला प्रशासन की जिन्होंने रात में ही मुआवजे का चेक भी तैयार कर लिया। एक बुजुर्ग को अपने बुढ़ापे की चंद रूपयों की पेंशन के लिए अधिकारियों के कार्यालयों में धक्के खाने पड़ते हैं। फिर भी उन्हें पेंशन समय से नहीं मिल पाती। लेकिन मुआवजे का चेक तुरंत तैयार हो जाता है। तभी तो जनाक्रोश और गरीबों को शांत करने के लिए हुकूमतें मुआवजे का चेक बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं।