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उम्मीद की किरण : डैंडी वॉकर बन रहा था डेडली … जन्म के समय ही बड़ा दिखने लगा था सिर

धीरेंद्र उपाध्याय
जन्मजात तकलीफें कई बार जिंदगी को खतरे की जद में ले आती हैं। खासकर, वे बीमारियां जो शारीरिक या मानसिक विकास से जुड़ी होती हैं। डैंडी वॉकर सिंड्रोम ऐसी ही एक समस्या है, जिससे मानसिक विकास पर असर पड़ता है। हालांकि, यह एक दुर्लभ बीमारी है लेकिन कई मामलों में त्वरित इलाज जीवन की अवधि बढ़ा सकता है। बीमारी सिस्ट का साइज बढ़ने और मस्तिष्क में भरे तरल की वजह से मस्तिष्क पर दबाव पड़ने लगता है। सबसे खास बात यह कि इस सिंड्रोम में मस्तिष्क का एक विशेष हिस्सा ही गायब होता है, जिसकी वजह से दिमाग और शरीर के बीच सही संतुलन नहीं बैठ पाता। ऐसे ही एक मामले में मीरा रोड निवासी महिला पूजा खुंट गर्भवती थीं। वह स्थानीय चिकित्सक की निगरानी में थीं। इसी बीच जब गर्भावस्था का २६वां सप्ताह शुरू हुआ, तो डॉक्टर ने उसे अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दी। अल्ट्रासाउंड कराते ही महिला के पैरों तले जैसे जमीन ही खिसक गई। उसे बताया गया कि बच्चा डेडली डैंडी वॉकर सिंड्रोम का शिकार है। ऐसी स्थिति में महिला ने मीरा रोड के वॉक्हार्ट अस्पताल के डॉक्टरों की सलाह ली। भ्रूण काल में अरच्नोइड सिस्ट की व्यापकता लगभग ०.२-०.९ फीसदी बताई गई थी। सिर के बढ़ते आकार पर नजर रखने के लिए गर्भ में ही बच्चे की चिकित्सकीय और अल्ट्रासाउंड की मदद ली गई। इसके बाद तीन मई यानी गर्भधारण के बाद ३७वें सप्ताह में डॉ. राजश्री तायशेटे द्वारा किए गए एलएससीएस के माध्यम से बच्चे का जन्म हुआ। हालांकि, महिला पूजा ने अपने कोख से पैदा हुए इस बच्चे के बचने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। अस्पताल में कार्यरत चिकित्सकों ने महिला और उसके परिवार को हिम्मत देते हुए नवजात का इलाज करने का पैâसला किया। चिकित्सकों ने तुरंत जांच शुरू की, जिसमें पाया गया कि बच्चा हाइड्रोसेफलस नामक दुर्लभ बीमारी से जूझ रहा है। इस बीमारी में बच्चे के ब्रेन में तरल पदार्थ बन रहा था। इसके चलते उसके सिर का आकार बढ़ता जा रहा था। ऐसे में अस्पताल की सलाहकार नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. नीतू मुंदडा की देखरेख में नवजात को एनआईसीयू में रखा गया। न्यूरो सर्जरी (ब्रेन एंड स्पाइन सर्जन) डॉ. अश्विन बोरकर ने कहा कि बच्चे की पूरी रीढ़ की स्क्रीनिंग के साथ मस्तिष्क का एमआरआई किया गया, जिसमें बच्चे के डैंडी वॉकर सिंड्रोम का भी पता चला। यह एक ऐसी स्थिति है, जो बड़े पोस्टीरियर फॉसा सिस्ट, सेरेबेलर एट्रोफी और ग्रॉस ऑब्सट्रक्टिव हाइड्रोसेफलस से जुड़ी होती है। इस स्थिति में मस्तिष्क द्रव का प्रवाह बाधित हो जाता है, जिससे सिर का आकार बढ़ जाता है। डॉ. अश्विन बोरकर और डॉ. विनोद रामबल की न्यूरोसर्जरी टीम ने इस बच्चे की सर्जरी की है। सर्जरी के लिए बच्चे के सिर में एक छोटा-सा छेद किया गया। साथ ही एक छोटी-सी ट्यूब को सिरे से वेंट्रिकुलर में डाला गया। यह प्रक्रिया मस्तिष्क के सामान्य विकास में मदद करती है। इस सर्जरी के बाद बच्चे की सेहत में सुधार देखकर उसे डिस्चार्ज दिया गया है। मरीज की मां पूजा खुंट ने कहा कि बच्चे की बीमारी का पता चलने पर हम काफी डर गए थे। लेकिन डॉक्टरों ने समय रहते इलाज किया, जिसके चलते मेरे बच्चे की जान बची है।

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