मुख्यपृष्ठस्तंभउम्मीद की किरण : मौत को मात!

उम्मीद की किरण : मौत को मात!

-बहन जता चुकी थी लीवर दान की इच्छा…सर्जरी से ही टल गया खतरा

धीरेंद्र उपाध्याय

गुजरात के अंकलेश्वर में रहनेवाली १९ वर्षीय युवती कृष्णा भानुशाली को अचानक पीलिया हो गया। पीलिया होने के महज तीन दिनों में ही उसे जमकर नींद आने लगी। ऐसे में वो धीरे-धीरे मौत के करीब जाने लगी थी। कृष्णा को चिंताजनक स्थिति में मुंबई के ग्लोबल अस्पताल में भर्ती कराया गया। जिस समय उसे लाया गया था, उसे देखते हुए चिकित्सकों ने यह अनुमान लगा लिया था कि वो किसी भी समय कोमा में जा सकती है। उसका ब्लड प्रेशर लो हो चुका था और दिल की धड़कन तेज चल रही थी। उसका लीवर फेल हो चुका था, जिस कारण उसका खून पतला हो गया था और उसके मुंह और नाक से रक्तस्राव हो रहा था। लीवर की विफलता के कारण मस्तिष्क के अंदर सूजन और ग्रेड पांच कोमा के कारण उसका अमोनिया स्तर बहुत अधिक हो गया था। मरीज को लीवर फेलियर के साथ अस्पताल में भर्ती किया गया था। ऐसी स्थिति में कई बार मरीज को लीवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है।
कृष्णा की स्थिति को देखते हुए चिकित्सकों ने लीवर ट्रांसप्लांट की सलाह दी। ऐसे में कृष्णा की बहन ने लीवर का कुछ हिस्सा देने की इच्छा व्यक्त की। इसके बाद लीवर प्रत्यारोपण करने की सभी तैयारियां कर दी गई थीं, क्योंकि ऐसा न करने से कृष्णा की मौत होने का खतरा था। हालांकि, उससे पहले चिकित्सकों ने धीमी किडनी डायलिसिस में उसकी सहायता की। इससे मस्तिष्क के अंदर मौजूद सूजन को कम करने के लिए अमोनिया को हटाने में मदद मिली। निरंतर रीनल रिप्लेसमेंट थेरेपी और प्लाज्मा एक्सचेंज जैसी उन्नत चिकित्सा तकनीकों का उपयोग करके उसका सफलतापूर्वक इलाज किया गया। इस कारण मरीज को यकृत प्रत्यारोपण की जरूरत नहीं पडी। मरीज कृष्णा भानुशाली ने कहा कि लीवर फेल होने की बात सुनते ही मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई थी। मैंने यह मान लिया था कि अब मौत नजदीक आ गई है, जिसे मैंने करीब से देखा। हालांकि, चिकित्सकों ने मेरे जीवन में ईश्वर की भूमिका अदा की है। उनके प्रयासों से ही आज मैं मौत को मात दे सकी हूं।
ग्लोबल अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार हेपेटोलॉजिस्ट, क्लिनिकल लीड लीवर और ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. उदय सांगलोडकर ने बताया कि प्लाज्मा एक्सचेंज (एक प्रकार का एक्स्ट्राकोर्पोरियल डायलिसिस) किया जाता है। इसमें मरीज के विषाक्त पदार्थों और हानिकारक अपशिष्ट वाले रक्त को ताजा प्लाज्मा से बदल दिया जाता है, ताकि लीवर को सहारा दिया जा सके। साथ ही जमावट और हेमोडायनामिक मापदंडों को सही किया जा सके। इस तकनीक के इस्तेमाल से एक सप्ताह तक चले उपचार के बाद उसे वेंटीलेटर से हटा दिया गया। मरीज की सेहत में सुधार देखकर उसे ३-४ दिनों में डिस्चार्ज कर दिया गया। उन्होंने कहा कि हिंदुस्थान में एक से दो फीसदी लोग तीव्र लीवर की बीमारी के शिकार होते हैं। यदि समय पर इलाज न किया जाए तो एएलएफ में मृत्यु दर लगभग ५०-७५ प्रतिशत है। आमतौर पर यह वायरल संक्रमण (एचएवी, एचईवी) अस्वच्छ भोजन और पानी के माध्यम से फैलता है।

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