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उम्मीद की किरण : जाको राखे साइयां मार सके न कोय…मरीज का निकल रहा था दम, १२ घंटे में मिला फेफड़ा

धीरेंद्र उपाध्याय
जाको राखे साइयां मार सके न कोय, बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय। यह दोहा अंधेरी में रहनेवाले विजय सोमन पर सटीक बैठा। मरीज इंटरस्टीशियल लंग डिजीज नामक एक दुर्लभ बीमारी से जूझ रहा था। इसमें फेफड़े के ऊतकों पर घाव होने से वे कठोर हो जाते हैं, जिस कारण मरीज को सांस लेने में बहुत अधिक परेशानी होती है। वहीं इस बीमारी का पता चलते ही विजय घबरा गए। उन्हें लगने लगा कि वे अब चंद दिनों के मेहमान हैं। इस बीच उन्होंने कई डॉक्टरों से इलाज कराया लेकिन उनकी सेहत में किसी तरह का कोई भी सुधार नजर नहीं आ रहा था, बल्कि उनकी सेहत लगातार बिगड़ती जा रही थी। दूसरी तरफ उनकी बिगड़ती सेहत को देखकर परिवार के सदस्य भी चिंतित हो उठे और उन्होंने उन्हें मुंबई के ग्लोबल अस्पताल भर्ती करा दिया। अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की देख-रेख में विजय का इलाज शुरू हुआ। चिकित्सा जांच में मरीज को इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस का पता चला, जो फेफड़ों की बीमारी है। इस बीमारी का एकमात्र विकल्प यही है कि मरीज के फेफड़ों की प्रत्यारोपण सर्जरी की जाए। अस्पताल के इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी एंड लंग ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. समीर गर्दे ने कहा कि मरीज के शरीर में ऑक्सीजन का लेवल बहुत हो गया था। फेफड़े की फाइब्रोसिस के कारण उन्हें फुफ्फुसीय उच्च रक्तचाप हो गया अर्थात फेफड़ों का रक्तचाप बढ़ने लगा। यह वह स्थिति है, जो हृदय के दाहिने हिस्से को प्रभावित करता है। इस कारण मरीज को सांस लेने में कठिनाई महसूस हो रही थी। उसकी स्थिति को देखते हुए यह साफ हो गया था कि अब मरीज के फेफड़ों के प्रत्यारोपण की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने मरीज का नाम प्रत्यारोपण प्रतीक्षा सूची में पंजीकरण करा दिया था। मरीज को पंजीकरण के बाद १२ घंटों के भीतर एक ब्रेनडेड व्यक्ति से फेफड़े मिल गए। ऐसी स्थिति में मरीज की तुरंत प्रत्यारोपण सर्जरी की गई। सर्जरी के बाद मरीज की सेहत में सुधार देखकर उन्हें डिस्चार्ज दिया गया है। अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार सीवीटीएस डॉ. चंद्रशेखर कुलकर्णी ने कहा कि इंटरस्टीशियल लंग डिजीज की बीमारी के कारण कई बार हृदय संबंधी कई गंभीर बीमारियां भी हो सकती हैं। हमने हृदय पर भार कम करने के लिए सर्जरी के दौरान वीए सीएमओ शुरू किया और इससे मरीज के तेजी से ठीक होने में मदद मिली। अस्पताल के सीईओ डॉ. विवेक तलौलिकर ने कहा कि इंटरस्टीशियल लंग डिजीज की बीमारी से पीड़ित मरीजों में फेफड़े के प्रत्यारोपण काफी फायदेमंद हैं। हमने हमेशा अंगदान अभियान को समर्थन दिया है, क्योंकि अंगदान के कारण अन्य जरूरतमंद मरीजों को नई जिंदगी मिलती है। उन्होंने कहा कि यह सर्जरी लंग ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. समीर गर्दे, डॉ. चंद्रशेखर कुलकर्णी, डॉ. विशाल पिंगले, डॉ. प्रशांत बोराडे, डॉ. खुशबू धर्माणी और डॉ. श्रुति तापियावाला की टीम ने मिलकर किया है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले पांच वर्षों में फेफड़े के फाइब्रोसिस की घटनाओं में १५ फीसदी की वृद्धि हुई है।

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