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उम्मीद की किरण : दिल धड़कनें दो… ७६ की उम्र में मौत को मात!

धीरेंद्र उपाध्याय
दुर्लभ दिल की बीमारी से जूझ रहा था वृद्ध
नई मुंबई में रहनेवाले ७६ वर्षीय संतोष कदम (परिवर्तित नाम) की जिंदगी अब पूरी तरह बदल गई है। दिल की दुर्लभ बीमारी से संघर्ष करते हुए उन्होंने कई साल निकाल दिए। हालांकि, इस बीमारी का पता उन्हें बचपन से ही था, जिसे विज्ञान की भाषा में एब्स्टेनॉइड हार्ट डिजीज कहते हैं। कदम बताते हैं कि उन्होंने कई अस्पतालों में इलाज करवाया। लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। इसके चलते उनके शरीर की तकलीफें बढ़ने लगीं। उनको हांफने सहित बदन में कमजोरी, पैर की सूजन आदि लक्षण दिखने लगे। इस वजह से वे दैनिक गतिविधियां सही तरीके से नहीं कर पा रहे थे। बिगड़ती सेहत को देखकर परिवारवालों ने मुझे मेडिकवर अस्पताल में भर्ती करा दिया। यहां डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू कर दिया। यहां तमाम जांच करने के बाद सीवीटीएस सर्जन डॉ. अभय जैन ने हार्ट में गोली के आकार का पेसमेकर लगाने का पैâसला किया। इसके तहत डॉ. जैन और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अनूप महाजनी के नेतृत्व में एक अन्य डॉक्टर की टीम ने बायोप्रोस्थेटिक वाल्व से वाल्व रिप्लेसमेंट के लिए यह सर्जरी की। करीब १५ मिनट तक चली इस सर्जरी के बाद कदम को आईसीयू में रखा गया था। सेहत पूरी तरह से ठीक हो गई तब उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। कदम कहते हैं कि चिकित्सकों के प्रयासों के कारण मुझे नई जिंदगी मिली है।
डॉ. जैन ने कहा कि एब्स्टेनॉइड दुर्लभ दिल का रोग है, जो दो लाख लोगों में से किसी एक को होता है। उन्होंने कहा कि जन्मजात हृदय रोगों में इसकी हिस्सेदारी ०.२ प्रतिशत है।
डॉ. जैन ने बताया कि ट्राइकसपिड रेगुर्गिटेशन एक प्रकार का हृदय वाल्व रोग है, जिसमें दाएं आलिंद और दाएं वेंट्रिकल हृदय कक्षों के बीच स्थित ट्राइकसपिड वाल्व सही तरीके से बंद नहीं होता है। इससे रक्त का प्रवाह उल्टा हो जाता है, जिसका रिसाव वापस दाहिने आलिंद में होता है। कुछ मामलों में ट्राइकसपिड वाल्व रेगुर्गिटेशन जन्म से मौजूद जन्मजात विकार के रूप में विकसित होता है, जबकि अन्य मामलों में यह अन्य अंतर्निहित स्वास्थ्य विसंगतियों के कारण उत्पन्न होता है।
गौरतलब है कि इंसान का दिल चार कक्षों से बना होता है, जहां ऊपरी हिस्से में दायां अलिंद और बायां अलिंद रक्त प्राप्त करता है और निचले खंड में दायां निलय, बायां निलय रक्त पंप करता है। सामान्य स्वस्थ लोगों में दो दाएं कक्षों के बीच स्थित ट्राइकसपिड वाल्व दाएं आलिंद से दाएं वेंट्रिकल तक रक्त के प्रवाह की अनुमति देने के लिए खुलता है, जिसके बाद यह रक्त के पिछड़े प्रवाह को रोकने के लिए तुरंत बंद हो जाता है। हालांकि, ट्राइकसपिड रेगुर्गिटेशन से पीड़ित व्यक्तियों में, वाल्व जल्दी बंद होने में विफल रहता है। गंभीर ट्राइकसपिड रेगुर्गिटेशन के रूप में पहचानी जानेवाली इस बीमारी में दिल के दाहिने निचले कक्ष (वेंट्रिकल) में दबाव बढ़ जाता है। इसके चलते पीड़ित व्यक्ति को सांस फूलने, घबराहट, पैरों में सूजन और लीवर की क्षति जैसी समस्याएं होती हैं। ऐसी स्थिती में तुरंत सर्जरी करना काफी जरूरी हो जाता है। अस्पताल के कंसल्टेंट इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अनूप महाजनी का कहना है कि मरीज की चिकित्सकीय जांच के बाद दुर्लभ बीमारी दिखाई देने पर रिश्तेदारों के साथ चर्चा करने के बाद मरीज के सीने में गोली के आकर का पेसमेकर लगाया गया। उन्होंने कहा है कि दुनिया का सबसे छोटा पेसमेकर इस मरीज को बिठाया गया है।

 

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