मुख्यपृष्ठस्तंभउम्मीद की किरण : आज फिर जीने की तमन्ना है...

उम्मीद की किरण : आज फिर जीने की तमन्ना है…

धीरेंद्र उपाध्याय

अक्सर हम छोटी-छोटी मुश्किलों में बेचैन हो जाते हैं। बेचैन मन समस्याओं को विकराल बनाने में ही मदद करता है, उससे निपटने में नहीं। लेकिन हौसला कठिन से कठिन चुनौतियों को भी मात दे सकता है। इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि कोई व्यक्ति हिम्मत से लबालब होकर जटिल बीमारी को मात दे देता है। एक शख्स ने उस बीमारी को मात दी है, जिसका नाम सुनते ही बड़े-बड़ों के पसीने छूट जाते हैं। पनवेल निवासी अनिल शिवदे (बदला हुआ नाम) एक निजी फर्म में काम करते हैं। वे एटैक्सिया (मांसपेशियों का खराब समन्वय), निगलने में कठिनाई, उल्टी,कमजोरी और अंगों में संवेदनशीलता आदि शिकायतों से जूझ रहे थे। उन्होंने आस-पास के चिकित्सकों से इलाज कराया लेकिन उनके द्वारा दी जा रही दवाओं का कोई भी लाभ नहीं हो रहा था। दवा करने के बाद भी जब उन्हें आराम नहीं मिला तो वे हताशा और निराशा के शिकार होने लगे। उन्हें लगने लगा था कि अब वे बहुत अधिक समय तक जिंदा नहीं रहेंगे। इस बीच उनमें फिर से जीने की चाहत जागी और हिम्मत से लबालब हो गए। वे इलाज कराने के लिए नई मुंबई के मेडिकवर अस्पताल में भर्ती हो गए। चिकित्सकों ने मेडिकल जांच में पाया कि मरीज जटिल बीमारी से पीड़ित था। यह जानकारी भी सामने आई कि युवक के दिल में कार्डियक ट्यूमर है, जिसके चलते उसे स्ट्रोक आया था। इसे चिकित्सकीय भाषा में एलए मायक्सोमा भी कहा जाता है। अस्पताल के इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सिद्धार्थ सोनकांबले के नेतृत्व में सीटीवीएस सर्जन डॉ. अभय जैन, डॉ. आशीष बाविस्कर, फिजिशियन डॉ. श्रीराम की टीम ने युवक का इलाज शुरू किया। डॉ. सिद्धार्थ सोनकांबले ने कहा कि मरीज के किए गए एमआरआई मस्तिष्क में नॉन हेमोरेजिक रोधगलन दिखा, जो स्ट्रोक है। उन्हें स्ट्रोक के लिए रक्त पतला करनेवाली और मिर्गी रोधी दवाईयां दी गर्इं। नौ अगस्त को किए गए विस्तृत मूल्यांकन में उनके ईसीएचओ ने एट्रियल मायक्सोमा दिखाया, जिसका मतलब यह था कि उनके दिल के बाएं आलिंद में एक बड़ा ट्यूमर था। यह ट्यूमर बाएं कक्ष से बाएं वेंट्रिकुलर (एलवी) नामक दूसरे कक्ष तक भी पैâला हुआ था। शुरूआत में कार्डियक ट्यूमर, बड़ा थक्का या वेजीटेशन की आशंका जताई गई थी। कार्डिएक एमआरआई से दुर्लभ ट्यूमर एट्रियल मायक्सोमा की मौजूदगी की पुष्टि हुई। एलए मायक्सोमा एक दुर्लभ कार्डियक ट्यूमर है, जिसके टूटने से रोगी को स्ट्रोक, दिल की विफलता, कार्डियक अतालता या संक्रमण जैसी कार्डियो-एंबोलिक का सामना करना पड़ सकता है। यह ट्यूमर हृदय के एक कक्ष से दूसरे कक्ष तक रक्त के प्रवाह को बाधित करने के लिए भी जाना जाता है। रोगी को बिना किसी जटिलता के ओपन-हार्ट सर्जरी करके एलए मायक्सोमा को सफलतापूर्वक हटाया गया। यह सर्जरी तीन घंटे तक चली और एक सप्ताह के भीतर मरीज को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। मरीज अब स्थिर है। साथ ही वह अब पहले की तरह चल, खा, बोल और निगल सकता है। शीघ्र स्वस्थ होने के लिए उन्हें मेडिकवर अस्पताल में व्यापक फिजियोथेरेपी दी गई। फिलहाल, मरीज ने अब आसानी से अपनी दैनिक दिनचर्या फिर से शुरू कर दी। उन्होंने कहा कि तुरंत इलाज न करने से बार-बार स्ट्रोक हो सकता था और यहां तक कि अचानक मौत भी हो सकती थी। डॉ. सिद्धार्थ सोनकांबले ने बताया कि असंतुलन, घबराहट, कमजोरी, चक्कर आना जैसे किसी भी लक्षण को नजरअंदाज न करें और इतने बड़े ट्यूमर के होने से बचने के लिए २० साल की उम्र के बाद नियमित हृदय जांच करानी चाहिए।

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