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रविवार को नमस्ते सामना में प्रकाशित पाठकों की रचनाएं

हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे!
हिंदुत्व का तिलक लगाकर, भगवा को लहराया था,
राष्ट्रवाद की विराट मशाल को, बालासाहेब ने जलाया था।
साहस उनमें बाघ के जैसा, बेबाक सी बातें करते थे
राजनीति के गीदड़ सारे ठाकरे नाम से डरते थे।
हिंदू नारे को जो दुनिया के कोने तक पहुंचाया था,
हिंदूहृदयसम्राट का तमगा जनमानस से पाया था।
हर बाधा को तोड़ा जिसने जो एकता का रोड़ा था,
सारे भेद मिटाकर जिसने हिंदू समाज को जोड़ा था।
घंटाधारी हिंदू को भी तलवारधारी बना दिया,
र्इंट का उत्तर लोहे से दो बालासाहेब ने सिखा दिया था।
हिंदू के स्वाभिमान को जिसने जन-जन में जगाया था,
हिंदू अस्मिता का भगवा पताका सर्वत्र फहराया था।
समाजवाद के छद्म नाम पे जो सरकारों का गठन किया,
कश्मीर में अनदेखी कर नैतिकता का पतन किया।
हिंदू कत्लेआम हो रहा था खूनी जिहाद के नारों पे,
सरकारों में चुप्पी थी तब कट्टरपंथी के इशारे पे।
बालासाहेब अकेले गरजे हिंदू हित का साथ दिया,
पीड़ितों के न्याय की खातिर जिसने खुलकर बात किया।
धरती पर है नाम गूंजता और गूंजता गगन है,
भारत मां के इस सपूत को को कोटि-कोटि नमन है।
-हर्षित पाण्डेय, पडरौना (उ.प्र.)

मनुष्यता से प्रेम कर
कहां चला तू जा रहा
खुद से कुशल क्षेम कर
मनुष्यता से प्रेम कर
मनुष्यता से प्रेम कर
मनुष्य हो जन्म लिया
मनुष्यता रही नहीं
है श्रेष्ठ कृति तू ब्रह्म की
पर श्रेष्ठता कहीं नहीं
बस स्वार्थ में है लिप्त तू
कुछ तो काम नेक कर
मनुष्यता से प्रेम कर
मनुष्यता से प्रेम कर
न प्रेम, दया, भाव है
लालच की बस अलाव है
बातों से नेह जोड़ता
मन में नहीं लगाव है
बस पाप में डूबा रहा
कुछ तो धरम नेम कर
मनुष्यता से प्रेम कर
मनुष्यता से प्रेम कर
कभी तू बैठ खुद के संग
खुद से भी हो ले अंतरंग
गिरगिट की तरह जी रहा
मनुष्य जैसा तेरा अंग
भ्रम यहां सर्वस्व है
कर्तव्य से तू नेह कर
मनुष्यता से प्रेम कर
मनुष्यता से प्रेम कर
बस प्रेम, दया भाव ही
संसार का आधार है।
मन में तेरे पल रहा
बस स्वार्थ अहंकार है।
क्लेश पाप कर्म है
पाप से तू द्वेष कर
मनुष्यता से प्रेम कर
मनुष्यता से प्रेम कर
धन के संग ये रुतबा भी
सब यहीं रह जाएगा
तूने दिया जो इस जहां को
संग तेरे आएगा
सत्कर्म तेरे और प्रेम
रख ले तू सहेज कर
मनुष्यता से प्रेम कर
मनुष्यता से प्रेम कर
-रमाशंकर ‘यदुवंशी’ मुंबई

रात के रंग
एक ही रात के अलग-अलग रंग होते हैं,
जिनको ‘सफेद-रोटी’ नसीब नहीं होती
वो रात ‘काली-रोटी’ की तलाश में निकलते हैं।
हर रात के अलग-अलग रंग होते हैं।
दु:ख-दर्द, बीमारी को मिले ठिकाना रात को
रंगती जाए और ये ‘कालिमा’,
मुसीबत में पड़ा जब कोई साथ हो।
दिन के चकाचौंध में ‘तन्हाई’ यूं दुबक जाती है
रात को अकेला पाकर, साथ निभाने आ जाती है।
तन्हाइयों भरी रातें, कुछ ऐसी गहरी होती हैं,
दु:ख यूं उभर आते हैं जब चैन से दुनिया सोती है।
काले कर्मों वालों पर रात यूं ‘चुनर’ ओढ़े है
एक रात ही है फिर ये असर अलग-अलग छोड़े हैं।
कोई रात किसी-किसी की
सपनों की रात होती है
उम्मीदों भरे दिलों की राहत-की-रात होती है
कुछ ही खुशनसीबों की ये रात यादगार होती है
कई बदनसीबों की ‘चुभते-सपनों’ की शुरुआत होती है।
कोई रातभर गिने तारों को, चांद से बतियाते हैं,
सपने भर आंखों में कोई नींद में खो जाते हैं।
शहरों के चकाचौंध में,
एक रात आज ऐसी आई है
जिस पर है बड़ी जिम्मेदारी
करना इसे नए साल का स्वागत
जानेवाले साल को विदाई है।
युवा पीढ़ी डूबी मस्ती में
जोश में यूं होश गंवाए
एक रात की मौज के खातिर
पिता की गा़ढ़ी-कमाई लुटाए।
फिर भी हर रात के रंग हैं खास
चाहे जितनी भी हो जाए गहरी
इसमें हैं छुपी ‘एक नई सुबह की आस’
एक नई दिलासा फिर जगाए जीने की आस…
बस यही है अपने पास
बस यही है अपने पास।
-नैंसी कौर, नई दिल्ली

उम्मीद
चोट के निशां जिंदगी पे गहरे हैं,
जीने को मरहमपट्टी के साथ
मुस्कुराते चेहरे हैं।
मन के मोती कुछ बिखरे-बिखरे से हैं,
कहने को तो बहुत कुछ है मगर
इस जुबां पे हजार पहरे हैं।
खुद को खुद की नजरों में है अब उठने की बात,
निहारा आईने में खुद को इस उम्मीद के साथ,
चंद बूंदें आज भी अमृत की झलक रहीं चेहरे पर, बस एक
जोर के हमले की जरूरत है
जुबां के इस पहरे पर।
बेहतर सबकुछ हो गया बिगड़ के भी,
सुकून ये महसूस किया होगा वक्त ने भी,
खुश रहना यारों वक्त की जरूरत है,
उम्र के हर दौर में जिंदगी खूबसूरत है।
-मीनाक्षी शर्मा ‘पंकज’, नई मुंबई

अभिनय ही जीवन है
पूरी दुनिया अभिनय के रस में डूबी है,
जिसने अभिनय को नहीं समझा-उसकी जिंदगी अधूरी है,
जीवन का सार ही अभिनय है,
जीवन का मतलब ही अभिनय है,
अभिनय न जाने जाति-धर्म,
अभिनय न माने ऊंच-नीच,
अभिनय न जाने सच्चा-झूठा,
अभिनय न माने काला-गोरा,
अभिनय न जाने देशी-विदेशी,
अभिनय न माने गरीब-अमीर,
अभिनय न जाने लंबा-नाटा,
अभिनय न माने दुबला-मोटा,
अभिनय से इंसान ज्ञानी बन जाता,
अभिनय से जीवन सफल हो जाता,
अभिनय पर है सबका हक,
अभिनय पर कभी न करना शक,
अभिनय से ही खुशियां हैं जीवन में,
अभिनय ही तो हम करते जीवन में,
अभिनय जो नहीं करता वो मृत घोषित हो जाता है,
अभिनय को जो नहीं समझा वो दुख में जीवन जीता है,
अभिनय को जिसने समझा,
उसने जीवन के असली मर्म को समझा,
जिसने जीवन को समझा, उसने ही मोक्ष पाया,
अभिनय…जीवन का है एक अभिन्न अंग,
अभिनय में ही डूबा है अंग-प्रत्यंग,
अभिनय से ही हर काम संभव है,
अभिनय जो अच्छा करता है
वही सफलता पाता है,
अभिनय का जादू जिस पर चलता है
उसका राजयोग आ जाता है,
अभिनय को जानना-समझना,
उसका अवलोकन करना, ज्ञान अर्जित करना,
है मानव धर्म, जिसने धर्म निभाया है,
सबकुछ ही उसने जीवन में पाया है,
पूरी दुनिया अभिनय के रस में डूबी है,
जिसने अभिनय को नहीं समझा उसकी जिंदगी अधूरी है।
-रंजय कुमार, मुंबई

खुद ही बन जा एक मशाल!
यह न हमारा भोलापन है,
है जनता में उपजा रोष
वादे सारे हुए न पूरे,
जिससे फूटा है आक्रोश
बिना वजन के फाइल न बोले,
दफ्तर-दफ्तर एक समान
उधर सुशासन का सत्ताधीशों को होता है बहुत गुमान
मत देकर मतदाता जाता बैठ नए सपने लेकर,
सच्चाई से पाला पड़ता जब जाते हैं वे दफ्तर
धरकर सिर पर हाथ न बैठो
बन जा खुद ही एक मशाल
सिंहनाद के बिना न होता न्याय प्राप्ति से ऊंचा भाल।
-डॉ. हीरानंद सिंह ‘हीरा’, मालाड, मुंबई

वृक्ष बचाओ
विश्व बचाओ
वृक्ष लगाने से ही संभव है
यहां मानव का कल्याण,
वरना प्रदूषण ले लेगा
हर एक प्राणी की जान!
-डॉ. मुकेश गौतम, वरिष्ठ कवि

जागो
जागो-जागो फिर से जागो।
अपना सारा हिस्सा मांगो।।
एक बार तुम खूब लड़े थे।
अब की बार सफलता लाओ।।
अत्याचारी हर निजाम को।
सबसे पहले दूर हटाओ।।
मेहनत करके किसी तरह तुम।
भगत सिंह को यहां बुलाओ।।
जैसे तुम उस बार लड़े थे।
वैसा जौहर आज दिखाओ।।
शोषण की जंजीरें तोड़ो।
और नई आजादी लाओ।।
कर्ज मुक्त हो अपना भारत।
ऐसा कुछ षड्यंत्र चलाओ।।
इंसानों पर पैसा फूंको।
अब मत यूं बारूद बिछाओ।।
इंसानों को राहत देकर।
उछलो, कूदो, नाचो, गाओ।।
यह जो झूठी आजादी है।
इसे आज जल्दी दफनाओ।।
खुशबू वाली आजादी को।
लाकर अपना देश सजाओ।
धोखे से इस बार बचो तुम।
उठो और अब आगे आओ।।
खूब संवारो इस भारत को।
चारों तरफ चमक चमकाओ।।
मन में उज्ज्वल भाव जगाकर।
रोशनियों में खूब नहाओ।।
जागो जागो फिर से जागो।
अपना सारा हिस्सा मांगो।
-अन्वेषी

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