मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनापाठकों की रचनाएं : तुम बिन...

पाठकों की रचनाएं : तुम बिन…

तुम बिन…
तुम बिन मेरा मन जलता है
तन में, मन में, रण चलता है
जड़ को चेतन करते करते
स्वप्नों का हिम, श्रृंग गलता है
तुम बिन मेरा मन जलता है।
तुम्हारे सपनों का सम्मोहन
आकांक्षाओं का सुर मादन
आवेगों का नित संघर्षण
रंजित रंजित उर तमिस्त्र घन
कब उड़कर नभ में छा जाता
छा कर फिर कण कण, छलता है
तुम बिन मेरा मन जलता है।
मन के कुंज में कहीं अंतरित
स्पर्शों से चैतन्य भी पुलकित
उन्माद से उर-उर स्पंदित
अब रूह हुआ है चिर ज्योतित
यह प्रकाश किरणें बरसाता
तम का क्षण क्षण, ढलता है
तुम बिन मेरा मन जलता है।
मन से कर तुझे प्रज्वलित
भीतर बाहर मन होता नित
सुख दुख के पुलिन प्लवित
उनकी आभा कर देता जीवित
आदान प्रदान क्या सिखलाता
नित नव परिवर्तन, ढलता है
तुम बिन मेरा मन जलता है
तन में, मन में, रण चलता है
तन, मन, फिर कटकर, छंटकर
सर्वशक्ति बन प्रण पलता है
तुम बिन मेरा मन जलता है
– डॉ. वीरेन्द्र प्रसाद, पटना, बिहार

नहीं मैं रोया
जब बालक सा व्याकुल
तेरी गोद में छिपकर सोया
उस रात नहीं मैं रोया।
जीवन के दुख सारे भूल
हर्षित मन बरसाये फूल
विस्मृत करके सारे हार
नोन जैसे जल में खोया
उस रात नहीं मैं रोया।
पथ कंटकित नहीं याद किया
स्वर्ग भी नहीं फरियाद किया
गतिमान बन किरणों जैसे
भार दर्द नहीं मैं ढोया
उस रात नहीं मैं रोया।
स्वर्णिम सी धीर छाया
छोड़ जगत की मोह माया
प्यासी धरा पर सोम बन
हर्षित वर्णित मैं जोया
उस रात नहीं मैं रोया।
जीवन बगिया अब महका
ज्वार कोई उर में दहका
नव जीवन सा ले आकार
मधुमय बीज बताए बोया
उस रात नहीं मैं रोया।
– डॉ. वीरेंद्र प्रसाद,
पटना, बिहार

मैं गंगा मां हूं
तुम ढूंढोगे जहां मैं वहां हूं
मैं गंगा मां हूं मैं गंगा मां हूं
स्वर्ग से धरा गई हूं मैं उतारी
कहते हैं लोग मुझे महतारी
शंकर की जटा में मैं समाईं
गंगा स्तुति सारी दुनिया गाई
पावन पवित्र मेरी जल धारा
जो डुबकी लगाया उसे‌ तारा
परम पूज्यनीय हूं मैं धरा पर
भागीरथ के द्वारा वसुंधरा पर
पावन हूं नहीं करो मुझे दूषित
सारा‌ जहान पानी पर‌ आश्रित
लहराती धरा पर उतर चलती
पाप मुक्त हो जा लगा डुबकी
जल हूं जड़ चेतन का जीवन
पापी को भी कर देती पावन
जिसने की मेरी मन से भक्ति
उसे मिला है सदा मोक्ष मुक्ति
मैं हूं गंगा फैली सारा जहां हूं
मैं गंगा मां हूं मैं गंगा मां हूं
– घूरण राय ‘गौतम’, मधुबनी, बिहार

हल
हल बहरहाल नहीं मिला है
जिंदगी के उलझे सवालों का
ऊपर से चिंतामग्न हूं मैं
क्या होगा बेतरतीब खयालों का
पेट के आगे बेबस दुनियां
भाग रही है बरबस दुनियां
प्रश्न जस का तस है खड़ा
ये प्रश्न है महज निवालों का
हल बहरहाल नहीं मिला है
जिंदगी के उलझे सवालों का
फिकर महज खुद तक सीमित है
पर दूजों से चाह असीमित है
मैं सोच-सोच के परेशां हूं
क्या होगा भोले-भालों का
हल बहरहाल नहीं मिला है
जिंदगी के उलझे सवालों का
कठिन प्रश्न है कठिन डगर है
हर एक बात में अगर-मगर है
जिंदगी पे साया है मानो
अनेकानेक भ्रमजालों का
हल बहरहाल नहीं मिला है
जिंदगी के उलझे सवालों का
-सिद्धार्थ गोरखपुरी, गोरखपुर, उ.प्र.

पराई
घर तो दो थे मेरे पास
बेटी थी और किसी के
घर जाकर बेटी बनी
पराई थी मैं अपने ही घर में
किसी और के घर भी
जाके भी पराई रही मैं
दो घरों पे हक होकर भी
बे-हक सी होकर
इस घर से उस घर दौड़ती रही मैं
पराई रह गई अपनों के लिए
अपनी होकर भी
पराई होकर जी अपनी जिंदगी मैंने
आप ही बताओ भगवन
ऐसा भाग्य लिखा ही क्यों तूने
अपने घर की इज्जत थी
किसी और के घर की इज्जत क्यों बनी मैं
अपने पापा की बेटी होकर भी
क्यों पराई उम्रभर कहलाई मैं
क्या कोई हक नहीं था
मेरा मेरी जिंदगी पे
जो अपने लिए ही न जी पाई मैं
क्यों लिखी तूने रब
ऐसी किस्मत हम बेटियों की
की मरने के बाद भी पराई कहलाईं हम
क्यों अपनों की अपनी होकर भी
अपनी न कहलाईं हम…
– विद्या प्रजापति

दौर आज का
इंसानियत की खुशबू से परिचित न रहे
कागज के फूलों से घर सजाने निकले
मेरे घर में आग लगी देख सबसे पहले
मोम से बने लोग मुझे बचाने निकले
उसके किस्से शहर में सबको पता है
फिर किस भरोसे वो दिल लगाने निकले
वही शोख नजर, वही अल्हड़ बांकपन
यूं तुमसे बिछुड़े जमाने निकले
वृक्ष वही हर बार क्यूं गिर गए
जिन पर हम घोंसले बनाने निकले
– डॉ. रवींद्र कुमार

अन्य समाचार

लालमलाल!