मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनापाठकों की रचनाएं : कटघरे में खुदा!

पाठकों की रचनाएं : कटघरे में खुदा!

जब से होश संभाला हमने
सुनते आ रहे हर मुख से
तेरी `जय जयकार’ तेरा ही `बोलबाला’
स्कूल, मंदिर, मस्जिद,गुरुद्वारे
तूने ही हाथ, जुड़वाए हमारे,
शीश नवाकर शाम-सवेरे
हर दिन हर पल, समर्पण किए
अहम को अपने तज डाला।
तुझको अपने हर पल, हर क्षण, हर कण, हर कर्म में जाने-अनजाने शामिल कर डाला।
ये माना तू हर दिन, हर पल रहता है साथ हमारे
मान लिया लो `रबजी’ हमने
हम `कटपुतली’ तू `कर्ता’ रे…।
फिर क्यों कोई जना बार-बार
दोष, अवगुण, हमारे गिनवाए?
स्वर्ग-नर्क के द्वार तूने बनवाए?
जब सब कुछ जनम-मरण, मिलना- बिछड़ना,
कौन, कहां, कब, किससे मिले,
कब, कैसे बिछड़े?
कैसे जुड़े जज्बात?-सब है तेरे हाथ,
तू ऊपर बैठ कहानियां रचता
तेरा किया `फर्क’… क्या तुझे
कुछ नहीं दिखता?
कोई तो सब खुशियां माने
किसी के दर्द में डूबे पैमाने
दुख में ही आए… दुख झेलते हुए चले जाए…
जब तू ही करे, तू ही करवाए?
सब की तकदीर तू ही बनाए?
फिर क्यों तेरे सिर कोई इल्जाम न आए?
`कर्म-फल’ क्यों हमसे जुड़े?
स्वर्ग-नर्क क्यों हमें दिखाए?
-नैंसी कौर, नई दिल्ली

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