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पाठकों की रचनायें : लड्डू और केक

लड्डू और केक
लड्डू और केक की हुई हिंदुस्तान में भेंट
बैठा चुपचाप लड्डू अपने में
ढूूंढता वजूद का मिसाल
जब से ला दिया लोगों में पुराना खयाल।
तभी आया गत्ते पर लेट सीना फुलाए केक
कहता कुछ लड्डू से इतराता,
मैं हूूं अब जमाने का सेठ
चिल्लाया लड्डू अचानक बड़ा तेज
अबे सुन बे केक
तू क्या बनेगा जमाने का सेठ,
तू देता संदेश लेकर चलने को टेक
मदद छोड़ दे जीने का टेक
तो अभी फट जाए तेरा पेट
पुन: एक बार साहस कर बोला केक,
तू पल्ले की तरह फड़फड़ा ले अपनी टेल
पर क्या मेरी तरह अपनाएगा तुझे तेरा देश।
अब लड्डू फन फनाया गर्दन उठाया
चल बे अंग्रेजों की औलाद,
तुझे काटकर देते थे समाज को बांटने का संदेश
मैं हूूं हिंदुस्थान की पहचान जो रहता था।
हिंदुस्थान के दलालों जान लो
संसार को एक-एक बूूंदी से जोड़ने का संदेश,
पहचान लो जल्दी से लड्डू और केक
पर न जाने कब मिलेगा
समाज को लड्डू तेरा संदेश।
-रत्नेश कुमार पाांडेय, मुांबई

विश्वास
अगर चुप हूं तो फिर मेरा काम बोलेगा
विश्वास है खुद पर हिंदुस्थान बोलेगा।
चमचे भक्त शोर-शराबा मचा ले कितना
हुनरमंदों का हुनर सैकड़ों बार बोलेगा।
सच को झूठ कहने की कला सीखी है
खून को पानी गुलों को खार बोलेगा।
न आंखों पर यकीन न सच से वाकिफ है
अक्ल का अंधा बस जयकार बोलेगा।
सच अगर बोलें तो सारे रिश्ते टूट जाएंगे
बता आईना कब तलक इंकार बोलेगा।
खामोश लहजा, तहजीब की खुशबू ‘उमेश’
पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा आकाश बोलेगा।
-डॉ. उमेशचंद्र शुक्ल, मुंबई

जीत की कोशिश
उठो, चलो, करो जो सोचा है
कुछ नहीं होता बैठे-बैठे सिर्फ हाथ के मलने से,
दिल में उजाला जरूरी है, बनाए रखिए जनाब
अंधेरा तो आया है सूरज के ढल जाने से।
वादा किया तो पूरा करो, बहाने बनाना अच्छी बात नहीं
दिल छलनी हो जाते हैं किसी को छलने से,
ट्विटर, फेसबुक ये रिश्ते तो दिखावा है
मजबूत रिश्ते बनते हैं लोगों से मिलने मिलाने से।
ग़ुस्सा करके गुमशुम बैठे कोई हल नहीं निकलता
ऊर्जा आती है सिर्फ मांफ करने, हंसने से।
कहा था न चलेंगे साथ हम आओ फिर चलें
यूं ही कट जाएगा सफर साथ चलने से,
करते रहो कोशिश जीतने की कोशिश
चाहत लाख बेहतर है किसी एक को हराने से।
-अनिल ‘अंकित’, गुरुग्राम

पसंद कहां है हमको?
पसंद कहां है हमको ये सर्दी
पसंद कहां है हमको ये सर्दी
फिर भी चिपकती जाती है
कपड़े खूब पहनते फिर भी
अंदर घुसती जाती है।
इस तरह के मौसम में
यूं तो हम हफ्ते भर नहीं नहाते
मगर जब भी नहाते हैं
ये सर्दी बदन में बसती जाती है,
पसंद कहां है हमको ये सर्दी
फिर भी चिपकती जाती है।
फिर होता है हमको जुकाम
रुक जाते अपने सब काम
कभी-कभी तो बैठने के गले से
आवाज भी बैठ सी जाती है,
पसंद कहां है हमको ये सर्दी
फिर भी चिपकती जाती है।
दया जरा न दिखाती है
हमको जरा न भाती है
हमको बना के शिकार ये अपना
मंद-मंद मुस्काती है,
पसंद कहां है हमको ये सर्दी
फिर भी चिपकती जाती है,
कपड़े खूब पहनते फिर भी
अंदर घुसती जाती है।
-अमित त्रिपाठी, लखनऊ

सपने और
यथार्थ
सपने देखना अच्छा तो लगता है।
हवा में महल बनाना मन को खूब भाता है।
कल्पना लोक में विचरण करना सुख तो देता है।
पर सपने तो आकाश तत्व है।
नभ में केवल शून्य व्याप्त है।
फिर कुटिया कहां बनेगी।
ज़िन्दगी कहां चलेगी।
जहां पांव तले ज़मीन होगी।
वहीं यथार्थ की नींव बनेगी।
कुटिया भी वहीं बनेगी।
जिंदगी भी वहीं चलेगी।
-प्रेम कुमार ‘प्रेम’ प्रयागराज

झंझट न होय पसीने की!
काहे तू ठंड-ठंड-ठंड करे
ठंड तो अपनी जान बचाय
औरन का तो पता नहीं
अपने काम बहुत ये आय,
पता जरा न किसी को चलता
एक महीना जो न नहाय
झंझट न होय पसीने की
न सूरज ही है मुंह झुलसाय,
खर्चा पाउडर, डीओ का सब
रोज ही देखो बचता जाय
ढंका रहे जो तन ये अपना
मच्छर भी काटन को न पाय,
परेशानी कोई भी न होवे
जो सोते-सोते लाइट जाए
घुसे-घुसे रजाई में ही
पता न चले सुबह हो जाय,
काहे तू ठंड-ठंड-ठंड करे।
ठंड तो अपनी जान बचाय
औरन का तो पता नहीं
पर अपने काम बहुत ये आय।
-अमन कुमार, आजमगढ़
मनुष्यता का दुश्मन!
जिनकी आंखे ‘हरी’-भरी रही,भगवा उनको चुभने लगा।
राम नाम कहने वाला मनुष्यता का दुश्मन दिखने लगा।
तुम धर्म विरोधी होते-होते देश विरोधी हो चले।
पीठ पीछे मारा खंजर जब भी तुमसे गले मिले।
देखकर एक होते हिंद को इतना बिगड़ते क्यूं हो?
सच-सच बताओ भगवा रंग से इतना चिड़ते क्यूं हो?
सुबह का सूरज भगवा है ढलती हुई शाम भगवा है।
पूर्व से पश्चिम, उतर से दक्षिण चारो धाम भगवा है।
भगवा है शान हमारी भगवा ही हमारी पहचान है।
भगवान के भगवा में भीगा ये सारा हिंदुस्थान है।
सनातन सत्य स्वीकारने से इतना डरते क्यूं हो?
सच-सच बताओ भगवा रंग से इतना चिड़ते क्यूं हो?
इतिहास उठाकर देख लो भगवा सब पर भारी था।
वो लहरा गगन में तब भी जब हिंदू संहार जारी था।
एड़ी-चोटी का पूरा जोर लगा दिया मलेक्छ बाबर ने,
पर मिटा न पाया इसको औरंगजेब जैसे कायर ने।
फिर तुम इस पर उंगली उठाने की भूल करते क्यों हो?
सच-सच बताओ भगवा रंग से इतना चिड़ते क्यूं हो?
इतिहास खंगालो पुरखे सबके ही भगवाधारी मिलेंगे।
जड़ खोदो सभ्यता की उसमे सनातन बीज निकलेंगे।
संस्कारों का पालन करता संस्कृति का जन्मदाता है।
गर्व करते है इस पर हम हमे बस भगवा ही भाता है।
खिलाफत में भगवे की तुम झूठे मंसूबे गड़ते क्यूं हो?
सच-सच बताओ भगवा रंग से इतना चिड़ते क्यूं हो?
-अक्षेश श्रीवास्तव, दतिया (मध्य प्रदेश)

नई राह स्वयं बनाता!
नई राह वह स्वयं बनाता
रास नहीं उनको आता अब
कोई लीकों को जब मोड़ें
मुखर हो उठे उन पर कोई
उनकी मंशा को जब तोड़े
बुरा-भला सुन करके वह
उनकी नजरों में गिर जाता
गिरता-उठता फिर वह चलता
नई राह वह स्वयं बनाता।
सृजन जगत के मंदिर के
वे तथाकथित ठेकेदार हैं
उनकी जयकारों के बिना
मंदिर में आना बेकार है
विकल्प रहित संकल्पों से
युवा सतत् बढ़ता जाता
शूलों पर डग भरकर वह
नई राह वह स्वयं बनाता।
ठेकेदारों साफ समझ लो
तुम्हे बदलना होगा
संकल्पित हो बढ़ रहे युवा के
साथ-साथ चलना होगा
सस्ती लोकप्रियता छो़ड़ों
लाओ वैचारिक व्यापकता
युवा राष्ट्र का नव निर्माता
नई राह वह स्वयं बनाता।
-डॉ. शिवम तिवारी, विशाखापट्टनम

हम
निर्माण नहीं कर सकते न करेंगे
अभी तो बिल्कुल नहीं अभी तो हम
मलबा हटाने में लगे हैं
जितना हटाते हैं उसका डबल
आ जाता है मालूम नहीं कहां से।
हम उसे हटाने लगते हैं
जी जान लगाकरमगर मलबा है
कम होता ही नहीं बढ़ता जाता है
सुरसा के मुंह की तरह हम परेशान हैं
प्रतिरोधी इंसान हैं।
फिर भी भारत की शान हैं
जीता जागता हिंदुस्थान हैं।
-अन्वेषी

वृक्ष
वृक्ष हूं मैं शांत निश्चल
निष्कपट अचल अडिग
परोपकारी साधु स्वभावी
निर्मल दाता सब कुछ लुटाता
इसी नाम से मैं जाना जाता।
पर क्या किसी ने जानी मेरी व्यथा
स्वयं लुटना और लूटे जाने में फर्क
परोपकारी होने और ले जाने में फर्क
क्या जाना किसी ने मेरी चुप्पी में सैलाब
धधकती आग को क्या समझा किसी ने
अचल प्रवृत्ति में छिपी निरंतर चिंता को
मेरे खत्म होते अस्तित्व के ढांचे को
हां हूं मैं वृक्ष शांत, निश्चल
क्या किसी ने जानी मेरी व्यथा मेरी चिंता।
-गायत्री शर्मा, ठाणे

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