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पाठकों की रचनाएं

`तन्हाईयां’
इश्क में तेरे गुम हूं मैं,
खामोश और गुमसुम हूं मैं।
नाम से तेरे इश्क मुकम्मल,
बिन तेरे गुमनाम हूं मैं।।
तुमसे मोहब्बत की थी मैंने,
तुमको ही बस चाहा था।
दुनिया की इस भीड़ में मैंने,
बस अपना तुमको माना था।।
तन्हाइयों के ये स्याह अंधेरे,
हर दम बढ़ते जाते हैं।
जिंदा है कहने को बस हम,
पल-पल मरते जाते हैं।।
-डॉ. वासिफ काजी, इंदौर, मध्यप्रदेश

`ये चारदीवारी’
यह चारदीवारी हमारे घर की,
बांधती है जिंदगियां हम सबकी!
समाज के बीच में इज्जत की,
परिवार के बीच में धन‌-संपत्ति की!
करती है रक्षा तन-मन-धन की,
हमारे जन्म से लेकर अंत तक की!
पड़ोसियों के खाने खजाने की,
गली के युवाओं के प्रेम-प्रसंगों की,
मुहल्ले के समस्त प्रपंचों की,
जानकारी रखती हर एक परिवार की!
सुबह सवेरे से लेकर सांझ ढलने तक की,
रखती खबर हर आने जानेवाले व्यक्ति तक की!
रात के अंधेरे में जब ये चारदीवारियां कहीं खो जाती हैं,
ये गलियां जब मुहल्ले के कुत्तों के हवाले हो जातीं हैं,
तब बस `जागते रहो’ की आवाजें ही कानों में आती जाती हैं,
और आंखें मेरी दोनों
दिन-भर की थकान से
एक नई सुबह की आस में
बोझिल होती जातीं हैं!
-पंकज गुप्ता,मुंबई

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