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पाठकों की रचनाएं : दहेज समाधान

`दहेज पर लगने लगी लगाम, लड़कियां कर रहीं शादी अब खुलेआम’
दौर विश्व में ऐसा चला अब,
लड़के-लड़की का डोरा बंधा अब,
नहीं रहा अब देश का चक्कर,
दूसरे देश हो रहे रफू -चक्कर,
बेटा भागे रशिया जाए,
रशियन लुगाई को घर ले आए,
फिर रशियन घर जमाई बन जाए,
बिटिया को अब अमरीका भाए,
जोरू का वो बैल बनाए,
अमरीकन को उंगली पर नचाए,
माता-पिता सब भाड़ में जाएं,
बॉलीवुड से हॉलीवुड तक सबको यही है भाये,
नहीं रहा अब उम्र का बंधन,
छोरी बड़ी, लड़का जस बच्चन,
फूल बड़ा और भंवरा छोटन,
नहीं मानते सत्य सनातन,
साथ खड़े दोनों हैं अंग-प्रत्यंग तन,
ऐसा बढ़ा ये वैवाहिक बंधन,

यही कथा है, यही है क्रंदन,
हाय-हैलो मॉम-डैड अभिनंदन,
भूल गए संस्कृति का वंदन,
कोई करे इटली को नमन,
कोई करे अमेरिकी अभिवादन,
अब न दोष दें लड़की-लड़का को,
खुशी-खुशी अपनाएं उनको,
नर-मादा में नहीं कोई अंतर,
जींस-टी शर्ट मारे अब मंतर,
दहेज पर लगने लगी लगाम,
लड़कियां शादी करतीं खुलेआम,
खतम हुआ दहेज का काम,
बच्चों ने ही आगे बढ़कर कर दिया अब काम तमाम,
युवा सोच में बढ़ा ये चिंतन,
नहीं रहेगा अब जाति बंधन,
मिले साथ रहें लिव इन रिलेशन,
गर्लफ्रेंड संग है प्यार-इमोशन,
राजपूताना में हरिजन बहुरी,
ब्राह्मण घर में आदिवासी बहुरी,
मंडल मांझी संग राजपूतनी बहुरी,
लालाजी की बिटिया संग बाउरी,
सिख-ईसाई संग हिंदू बहुरी,
मुस्लिम संग हिंदू-सिक्खनि बहुरी,
हिंदू संग हैं मुस्लिम बहुरी,
बड़ी खुशी है बड़ा स्नेह में दिखते रिश्ते आज,
मस्त है जोड़ी मदमस्त विषात,
दुनिया में बस यही है अब तो आगाज,
गांव बना लो, शहर बना लो, नगर बसा लो,
अब तो बच्चों को अपना लो, गुस्से में न इन्हें भुला दो,
नहीं रहेंगे आपके साथ, न आपके हृदय का उपकार चाहिए,
बच्चों को अपना प्यार चाहिए, यौवन, सेक्स, बहार चाहिए,
यही है उनकी अगली दुनिया, अमरीका, कुवैत, कनाडा, इटली, रूस, चीन तक यार चाहिए,
भारत के आई.टी. मेट्रोपोलिटन सिटी बंगलुरु, पुणे, नोएडा, चेन्नई, नई दिल्ली, हैदराबाद में प्यार चाहिए,
जहां अपनी-अपनी इच्छा से वर-वधू चयन का अधिकार चाहिए,
बड़े जतन से ढूंढ़ा बेटी ने जोश, होश, खामोश युवक,
साथ जिएगी साथ मरेगी देख के उस लड़के की झलक,
भोले बाबा की अजीब है माया, मायापुरी लोक दिखाया,
दोनों मिलकर शादी भी करते, दिव्य दृश्य आलोक दिखाया,
जाति-भेद का दंभ नहीं था, खूब कमाते खूब खिलाते,
झोले भरकर फास्ट फूड वो लाते,
मम्मी-पापा संग दोनों खाते,
गजब प्रेम का दृश्य दिखाते,
रात का डीनर फिर भी मंगाते, ऑनलाइन `जोमेटो’ से डिलिवरी पाते,
सारे कपड़े घर में ही आते, खरीद का ऑर्डर ऑनलाइन ही देते,
पापा को बरमूडा संग टी शर्ट मंगवाया,
मम्मी को साड़ी संग नाइटी मंगवाई,
ऑनलाइन सिस्टम समझाया,
खूब लुभाया, खूब घुमाया,कैफे, मॉल एक-एक जी भर के घुमाया, हमें बहुत वो रास न आया,
फिर भी देश-विदेश में आधुनिकता, भौतिकता का नया फैशन और दौर दिखाया,
बेटे-बहू में बहुत प्यार है, यारी का अद्भुत नजारा है, खुशियां वहां अब खूब अपार है,
नहीं कहीं अब द्वेष द्वार है, नई बहुओं संग-बेटियों का हम पर पूरा आभार है,
अब दिखता हमें बस प्यार ही प्यार है प्रेम-विवाह ही है अपरंपार, असंवैधानिक इस दौर में चला यह जोर बयार,
लगता है जैसे ऐसे रिश्तों से भारत की सरकार भी है तैयार,
जाति, मजहब, पंथ का खतम हो रहा दौर,
सबका सबसे प्रेम बढ़ा, शादी तक सिरमौर,
नहीं टिकेगी `दहेज प्रथा’ अब न रहेगा उसका ठौर,
युवक-युवती के खेल में मां-बाप हुए थे फेल,
न जाति बंधन रहा, न दहेज न जेल,
प्रेम नशा ऐसा चढ़ा, जोड़ी दिखे बेमेल,
नौकरी पर है सब अड़ा, प्यार ही उनका खेल,
अब न कोई मेल रहा, न रही कोई फीमेल,

पाश्चात्य की आंधी में बराबरी का ठेलमठेल,
बहू चाहिए आई.टी. से दूल्हा भी आई.टी. मेल,
खुद को भी तैयार करें, बेटी ही अब वर ढूंढ़ेगी, नई दुनिया में नया- नया है खेल,
मां-बाप तैयार हो गए, जोड़ी अनोखी मेल,
कहीं है जोड़ी प्लेन में, कहीं पकड़ती रेल,
आरक्षण की नीति टूटेगी, सबमें सबका मिलेगा मेल,
लड़के-लड़की की प्रतिभा से सुसज्जित शादी का बहूमुल्य ये खेल,
टीका-टिप्पणी करनवाले को नहीं मिलेगा बेल,
बीच में टांग अड़ानेवाले सीधे जाएंगे जेल।
(आधुनिकता और पाश्चात्य की परिपाटी पर वर्तमान युग से दहेज का निदान)
संजय सिंह `चंदन’ मुंबई, महाराष्ट्र

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