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पाठकों की रचनाएं : सिपाही हूं

इस धरा पर
गिरते-उठते बढ़ा हूं।
वीर शहीदों के शौर्य,
किताबों में पढ़ा हूं।
अब जवान होकर,
सरहद में खड़ा हूं।
सर पे कफन बांध कर,
अनेकों जंग लड़ा हूं।
थार-मरूस्थल पर दौड़,
हिमालय पर चढ़ा हूं।
जब-तक रहेगा दम,
चट्टानों-सा अड़ा हूं।
मां भारती के सर पे,
अनेकों कीर्ति जड़ा हूं।
-इंद्रपाल विश्वकर्मा,मुंबई

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