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पाठकों की रचनाएं : बड़ी बात

बड़ी बात
पहले हम कितनी बातें करते थे,
दिन तो दिन कई रातें करते थे।
भले ही कितनी कच-कच करते थे,
जैसी कथनी वैसी करनी को सच करते थे।
कभी अपनों की बातें,
कभी सपनों की बातें।
कभी घर के अंदर की बातें,
कभी उफनते समंदर की बातें।
कभी बिना सिर बिना पैर की बातें,
कभी खुद का हाल-चाल कभी गैर की बातें।
कभी मीठी-मीठी तो कभी खरी-खरी,
लेकिन रिश्ते में तहजीब, दोस्ती हमेशा हरी-भरी।
कभी तो होती खुसर-फुसर  ,
कभी खुले धूप में पसर-पसर।
अब तो देखो कैसा  जमाना आ गया है,
बात नहीं करने का सौ बहाना आ गया है।
फेसबुक  में पोस्ट पर कमेंट तो समझो कि बात है,
इंस्टाग्राम में फोटो लाइक तो समझो कि मुलाकात है।
कभी ट्विटर का ट्वीट कर दिया रीट्वीट फिर तो समझो बड़े ही जज्बात हैं,
मिलके बात करने न समय है न हालात हैं।
अब तो फोन पर बातें भी कम हो रही हैं,
टेक्स्ट अथवा चैट की इमोजी से ही खैर मकदम हो रही हैं।
पहले हम बड़ी बातें करते थे लेकिन वो तो कोई बात न थी,
बड़ी बात ये है कि अब हम बातें नहीं करते।
-अनिल `अंकित’, गुरुग्राम

मानवता
अपनापन होता है जिनमें,
पराए होकर भी अपने हैं।
बेगानों सा व्यवहार करें जो,
अपने होकर भी सपने हैं।
आज के अर्थ प्रधान युग में,
दिखता स्वार्थ का बोलबाला।
संबंध रक्त के धूमिल हो रहे,
सगा नहीं अक्सर रखवाला।
ऐसे भी सच्चे लोग यहां पर,
पराएपन का कोई भाव नहीं।
कुछ तो अपनों से भी श्रेष्ठतर,
मानवता का कोई अभाव नहीं।
स्वयं पर भी निर्भर यह,
हमारी सोच भी कैसी होगी?
जिनको अपना ही समझोगे,
उनकी सोच अपने जैसी होगी।
अपने भी कभी राह भटक कर,
पराश जैसे ही हो जाते।
किस्मत ने यदि सद्बुद्धि दिया,
वापस अपनों में खो जाते।
-चंद्रकांत पांडेय, मुंबई

आदमी
झूठी ही शान अपनी दिखाता है आदमी।
रिश्ता भी झूठ का ही जताता है आदमी।।
करता है कत्ले आम हमेशा ही वो मगर।
इल्जाम औरों पे ही लगाता है आदमी।।
है पेट में तो भूख का लावा यूं पक रहा।
ऐसे में यार जान गंवाता है आदमी।।
दौलत के वास्ते ही वो ईमान बेचकर।
इंसानियत की लाश उठाता है आदमी।।
रहता है ख्वाबों और खयालों में रात दिन।
खुद अपनी मुश्किलों को बढ़ाता है आदमी।।
ललकारता कोई जो तिरंगे की आन को।
फिर तो दिलो व जान लुटाता है आदमी।।
राही खुशी तलाशता है गम के शहर में।
यह देखकर मजाक उड़ाता है आदमी।।
-अनिल कुमार `राही’, मुंबई

`आदमी की अभिलाषा’
बचपने का गांव हो
पीपल की ठंडी छांव हो
बारिश हो प्रेम की
कागज की एक नाव हो!
लाखों की मिले नौकरी
पैसों की मिले टोकरी
महफिल में यार दोस्तों की
हर रोज मिले छोकरी!
तंग सी इक शाम हो
हाथों में इक जाम हो
संग हो प्रियतमा
खुद का इक मकान हो!
बीवी मतवाली हो
होठों पर उसके लाली हो
साला हो गुलाम सा और
सुंदर सी इक साली हो!
घर खुशहाल रहे
कोई न बवाल रहे
पिंकी और पिंटू से
दिनभर धमाल रहे!
तंदुरुस्त काया रहे
साथ सदा माया रहे
पिता का दुलार और
मां की सदा छाया रहे!
-नेहा सोनी, दतिया (मध्य प्रदेश)

… गाना चाहते हैं
वो यादों को मिटाना चाहते हैं।
जुदाई का बहाना चाहते हैं।।
मुझे देखे बिना जो रह न पाते।
वो नजरों से हटाना चाहते हैं।।
ये कैसा  दौर है जो भी हैं अपने।
अलग अपना ठिकाना चाहते हैं।।
परिंदों की करूं तारीफ कम है।
इकट्ठा आशियाना चाहते हैं।।
जमीनी लोग अब दिखते कहां हैं।
नई दुनिया बनाना चाहते हैं।।
दयारे-दिल भी संकरा हो गया अब।
जहां सब ही समाना चाहते हैं।।
गमों के साज ले, बैठे हैं ‘शिब्बू’।
खुशी के गीत गाना चाहते हैं।।
– `शिब्बू’, गाजीपुरी

मतलबी दोस्त
वक्त-बेवक्त चले आते हो,
अपने मतलब की रोटियां सेंकने चले आते हो,
कभी हाल मेरा भी पूछ लिया करो,
चूल्हे में अभी भी आंच बाकी है क्या?
जरा ये भी पूछ लिया करो,
कभी खयाल मेरा भी आता है?
या सिर्फ अपने मतलब से ही आते हो?
मतलब की यारी,
मतलबी औपचारिक बातें,
जीवन के असली मायनों को भूल,
क्यों निभाते हो झूठे रिश्ते-नाते,
दिन, महीने, साल गुजर जाते हैं
पर याद आती नहीं मेरी,
मतलब की बातें जब हो,
तो खूब याद आती है मेरी,
हो जाए जब मतलब की बातें,
तो कभी हाल-ए-दिल मेरा भी पूछ लिया करो,
मैं भी तुम्हारी तरह इंसान हूं,
कभी मेरी भी बात कर लिया करो…
-रंजय कुमार, मुंबई

बैठ जाते हो
हर बार कुछ फसाने लेकर बैठ जाते हो,
हमें ठगने के बहाने लेकर बैठ जाते हो।
हम अपनी बात कहने भी नहीं पाते कि तुम,
नजर टेढ़ी दिखाने लेकर बैठ जाते हो।
हम तो कभी भी शिकायत नहीं करते फिर भी,
तुम वक्त बेवक्त ताने लेकर बैठ जाते हो।
बुलाकर भीड़ तुम हमें सोया पाकर हरदम,
सर पर शोर मचाने लेकर बैठ जाते हो।
कुछ नहीं मिले तो गड़े मुर्दे ही उखाड़ो तुम,
हमें ही गलत बताने लेकर बैठ जाते हो।
-डॉ. एमडी सिंह

झूम के आई बारिश
बारिश आई झूम के, ठुमक के हंस के बोल के
रात्रि के रास्ते आसमान से जमीन पर उतरी बड़े ठाठ से
वृक्षों पर अपनी बूंदे कुछ ऐसे उड़ेली
मानव प्रियतम से उसकी प्रियतमा मिली
कुछ ऐसे खिलखिलाए ये वृक्ष
मानो हरी अपनी पगड़ी सिर बांध लिए
शृंगार रस का यह साथ देख
धरती भी खिलखिला उठी
साल भर बाद का ये प्रेम देख
अपनी सोंधी खुशबू फैला  दी
छोड़ अपनी मिट्टी की सोंधी खुशबू
हवाओं को भी नचवा दी
मधुर बोली कोयल की
हल्के से कानों में कुछ कह गई
छू गई बूंदें मन के उस कोने को
जहां यादें थी बचपन की कुछ हल्की सी दबी
देख बारिश की बूंदों को
नदिया भी लहलहा उठी
बारिश आई झूम के, ठुमक के, हंस के, बोल के।
-नेहा त्रिपाठी, मुंबई

हाल-ए-दिल
आज कलम उठाई हमने, सोचा कुछ लिख दें।
लफ्जों में जो बयां न कर सके, उनको पन्नों पर लिख दें।।
सुबह उनकी शाम उनकी, उनको ही रातें लिख दें।
जर्रा-जर्रा सिर्फ उनका है, सब अपना ख्वाब लिख दें।।
वो भी लुटाते हम पर प्यार, उनको सरेआम कर दें।
लिखा है जो दिल में नाम, उनको बदनाम कर दें।।
नाम उनका आते ही, लगा कलम को विश्राम दें।
जिन्हें सदा से बसा रखा है दिल में, उसे मुकाम दें।।
जिनको अपना माना, उनको कैसे  गंवारा कर दें।
छिपा रखा है जिन्हें शिद्दत से, कैसे `शिवा’ खुलेआम कर दें।।
-सुशील राय `शिवा’

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