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पाठकों की रचनाएं : त्योहार

त्योहार
ये त्योहार भी जीवन के रंग दिखा जाता है,
चंद पल की रौनक फिर वीरां कर जाता है
खुशियों को हम बांट सकते हैं गम के होते भी,
जीवन जीने की कला ये त्योहार अक्सर सिखा जाता है
हजार मुसीबतें हों जीवन में तो घबराना क्या,
खुशी भरे चंद पल सारे गमों को भुला जाता है
उतार-चढ़ाव तो आता रहता है अक्सर जटिल से जीवन में,
ये त्योहार भी जीवन को कितना आसां बना जाता है
दुनिया तो खुद से बिछड़ती है जज्बातों की आंधी में,
ये त्योहार बिछड़ी हुई दुनिया को मिला जाता है
कहीं अंधेरा, कहीं मायूसी कहीं सन्नाटा सा पसरा होता है,
त्योहार का दीपक हर आफत से लड़ने का रास्ता दिखा जाता है
-हर्षित पांडेय
पडरौना, उत्तर प्रदेश

वजूद
पत्ते पर पड़ी
बूंद ही तो हूं पानी की
कभी बारिश तो
कभी ओस की
हवा के तेज झोंके से
हिलते हुए पत्ते पर
इधर से उधर लुढ़कती हुई
जमीन पर गिरने से
किसी तरह
अपने को बचाते हुए
गिरना नहीं चाहती
जमीन पर
वरना सोख लेगी
मुझे अपने में
कुछ पलों की नमी के बाद
मिट ही जाएगा
वजूद मेरा
पत्ते पर बिताए लम्हों को
जी लेना चाहती हूं
अपने रुमानी
अहसास के साथ
कुछ पलों के बाद
धूप आते ही
मिट जाएगा वजूद मेरा
अपने आप ही
फिर से आने के लिए
गिरना नहीं चाहती
जमीन पर
देकर कुछ पलों की
नमी के बाद
मिटाने को
वजूद अपना

सुधीर केवलिया
बीकानेर, राजस्थान

तन्हाई
अक्सर लगने लगते हैं
मेरी तन्हाई के गिर्द
खामोशी के मेले
गुम हो जाते हैं इसमें
हम एक दूसरे से
कुछ लम्हों के लिए
निकल पड़ते हैं यूं ही
तलाश में एक दूसरे की
अधूरी है आज भी
तलाश हमारी
मुमकिन नहीं इस मेले में
मिलना हमारा
निकलना होगा
बाहर इससे
पर सोचता हूं कैसे
नहीं छोड़ती है साथ मेरा
तन्हाई

सुधीर केवलिया
बीकानेर, राजस्थान

अमृत आजादी
पचहत्तर वर्ष बीत गए यूं
मानों कल की शहादत की हो कहानी
आजादी! शब्दकोश का एक सुंदर सा शब्द है,
जो १५ अगस्त को विशेष तौर से प्रचलित है
आजादी की लड़ाई की बस सुनी हमने कहानी…
क्या बीती उन वीर शूरवीरों पर ये किसी ने ना जानी
क्या हम उस खून के कतरे का एक हिस्सा भी समझ पाए हैं?
यदि हां! तो देश के हर कोने में क्यूं चीखें और लाशें बिछाए हैं?
जाति-धर्म में यदि वो शूरवीर बटते
तो क्या आज हम आजादी की सांस ले रहे होते?
जिस रात हरेक पेट भर कर सो जाएगा,
किसी बालिका का पैदा होते ही गला नहीं घोटा जाएगा,
नन्हीं कलियों को कोई राक्षस यूं नहीं रौंद पाएगा
फिरंगी के आगमन पर कच्ची दीवारों में देश की हकीकत ना छुपाई जाएगी
उस दिन तुम छाती चौड़ी करके कहना!
हां!! आजाद हिंद के आजाद निवासी हैं हम !
किसी अखबारों में जंग की कहानी पढ़ कर, हमें देशप्रेमी नहीं बना देता
काश ये हादसे हमारी नफरतों के फासले कम कर देता
देश के प्रति प्रेम सरहदों पर ही प्रदर्शित नहीं होता,
ये एक जज्बा है,जो पौधारोपण करने में भी शुरू होता है
ऐसे अनेक तथ्य हैं जो आजादी के अमृत महोत्सव में fिवशेष भूमिका निभाते हैं
आप खुद तय करें आप किस पथ पर चलना चाहते हैं
दुश्मनों के वक्ष पर झंडा जरूर गाड़ना
पहले अपने अंदर पल रहे दुश्मन का खात्मा कर आना।।
जेबा अख्तर,सुलतानपुर, उत्तर प्रदेश

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