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पाठकों की रचनाएं : गांधी के तीन बंदर

गांधी के तीन बंदर
आजकल गांधी के तीनों बंदर
पगला गए हैं
चौराहे पर खड़े हैं
बौरा गए हैं।
एक कहता है बुरा देखो,
दूसरा कहता है बुरा सुनो
तीसरा कहता है बुरा बोलो।
तुम कहोगे नहीं अभी भी
गांधी के तीनों बंदर
अपने होशो हवास में हैं।
मगर मैं पूछता हूं कि
अगर गांधी के तीनों बंदरों को होश है
तो फिर बीच सड़क पे
कैसे कोई देख सकता है
निर्वस्त्र स्त्री को,
अगर गांधी के तीनों बंदरों को होश है
तो वैâसे कोई सुन सकता है
मां-बहन की गाली,
अगर गांधी के तीनों बंदरों को होश है
तो कैसे कोई बोल सकता है किसी को अपशब्द।
मैं सच कहता हूं
गांधी के तीनों बंदर पगला गए हैं।।
– योगेंद्र पांडेय

रिवायत
कसम झूठी खाने की रिवायत तो नहीं है।
कैसे कहूं उनसे… शिकायत तो नहीं है।।
इक सच पर टिका है बस जिंदगी का खेल।
झूठ बोलने की उनको इजाजत तो नहीं है।।
यूं तो हूं कायल… मैं सब जबानों का।
उर्दू के जैसी सब में, नफासत तो नहीं है।।
ये लेन देन, आंसूओं और गमों का है।
सौदे में बेवफाई के… किफायत तो नहीं है।।
ख्वाबों में कोई और, दिल में है कोई और।
वासिफ ये कोई… सियासत तो नहीं है।।
– डॉ. वासिफ काजी, इंदौर

आशादीप
जीवन-मृत्यु का अजब है ये मेल,
हो सके तो जवाब लेना अंतर्मन से,
जख्म अपनों को ही देकर बेइंतहा,
सुकून गजब का मिलता है यहां क्यूं!
हाथ बढ़ाकर रखना जीवन में
वफा से वफाई निभाना हर पल,
यकीन तो सबको झूठों पर होता है,
सच को तो अक्सर साबित करना पड़ता है!
रिश्तों की महक महसूस करें निभाते दुनियादारी,
ख्वाहिशों की उड़ान तो है इंसान की,
अनंत आसमान से ऊंची यहां,
क्यूंकि इक जीवन भी कम है
रिश्ते निभाने के लिए!
मन रोशन रखना आशादीप जलाकर,
दुआओं से रखना सजाकर सदा,
अनमोल रिश्ते को जीवन में अपने,
रेशम सा होता है जो मिजाज इनका!
– मुनीष भाटिया, मोहाली

दिल-ए-किताब
दिल वो किताब है
जिसे पढ़ते-पढ़ते मोहब्बत ने फाड़ दिया
और इक मैं खड़े होकर
आंसुओं के सतह पर तमाशा देखते रहे
उसे रोका तक नहीं
टोका तक नहीं
बस तबाही ही हुआ है
दो धारों के बीच…
लहजा चबाने का शौक था उसे
जो मुझे इस तरह ठुकराया
मैं टूटा हूं उसी के खातिर
अब लफ्जों में वो बातें भी ठहरती नहीं
मैं कहता हूं तो वो सुनती नहीं
ऐसे सफर में उससे बात कौन करे
जो किया कई टुकड़े दिल,
फिर जजबात कौन करे
– मनोज कुमार, गोंडा, उत्तर प्रदेश

आईना
इरादों में अगर ईमान हो तो
तेरी इज्जत मेहरबान होगी।
हौसलों में अगर जान हो तो
तेरी चाहत भी कुर्बान होगी।
जिसको मुमकिन समझता है
वह नामुमकिन भी हो सकता है।
जिसको तू अपना समझता है
अपना पराया भी हो सकता है।
तेरे इरादों से कुछ नहीं होगा
तेरी नीयत साफ होनी चाहिए।
लोग तो यूं ही जलते रहते हैं
यह खयाल भी तो होने चाहिए।
तेरी चाहत और ये तेरे इरादे
तेरे मन मंसूबे का आईना है।
ये इरादों का तेरा इम्तिहान है
जरा संभलकर पेश आना है।
-अशोक पटेल `आशु’

क्योंकि पैसे का खेल बड़ा निराला होता है
पैसे का भी क्या खेल होता है
हर जगह उसकी मौजूदगी
कोई भी काम उसके बिना नहीं चलता है
सब खेल माया का ही होता है
जीवनयापन का सारथी
पैसा ही तो होता है
अच्छाई हो या बुराई सभी के लिए इसकी जरूरत होती है
पर नसीब में जितना हो उतना ही मिलता है और
इसकी कीमत गरीब से ज्यादा कौन जानेगा,
दो जून की रोटी के लिए
दिनभर वह मेहनत कर काम करता जब उसे चंद पैसे मिलते हैं सुकून जरूर होता है,
रोज कमाना रोज खाना
उसकी दिनचर्या होती है
पूरे परिवार की जिम्मेदारी लिए पैसे कमाने वह दर-दर भटकता है काम करता है
और कुछ लोगों के लिए पैसे कि कोई अहमियत ही नहीं होती दिनभर पैसे को पानी तरह फिजूल खर्च में बहाते हैं
रात में शराब पीते हैं और बड़े-बड़े होटलों में पार्टी मनाते हैं पैसे इतने होते हैं कि सब कुछ उससे खरीदना चाहते हैं
माया ने उन्हें अंधा बना दिया होता है
जिंदगी की सबसे बड़ी
जरूरत माना पैसा होता है
पर चार पैसे मिलने का गुमान आदमी को नहीं करना चाहिए क्योंकि यही पैसा रिश्तों में दूरियां बना देता है, यही पैसा ईमान खराब कर देता है
इस पैसे का घमंड कभी भी नहीं करना चाहिए
क्योंकि यहां पैसा एक जगह नहीं रुकता
क्योंकि यहां माया बड़ी चंचल होती है,
पैसे का गुमान नहीं
पैसे का हमेशा सदुपयोग
करना हमारा कर्तव्य है
क्योंकि पैसे के बिना सब कुछ सूना है
इस सूनेपन को खत्म करने हेतु हम सकारात्मक ऊर्जा से पैसे का जीवन में महत्व जाने और पैसे से समाधान खोजें न कि पैसे से अपने आत्मबल को खंडित न होने दें
पैसा हम सभी की आवश्यकता जरूर है
पर इसे अपने पर हावी न होने दें क्योंकि
पैसा तो पैसा ही होता है…
– हरिहर सिंह चौहान, इंदौर

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