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पाठकों की रचनाएं : हिंद हमारा

  • हिंद हमारा
    हिंद हमारा सबसे प्यारा, आंखों का तारा तिरंगा हमारा
    हम भी कहेंगे तुम भी कहोगे, कहेगा ये जग सारा
    ये हिंद हमारा…
    वर्षों की गुलामी झेली थी अपमान सहा था उसने
    पूर्वज की जब आन जगी आह्वान किया था उसने
    सच्चाई की राहों पे चलकर फहराया तिरंगा प्यारा।
    ये हिंद हमारा…
    आजादी के बाद बना संविधान देश का अपना
    जाति-धर्म और ऊंच-नीच का खत्म हुआ सपना
    सब भेद भुलाकर अपना ली एक भाई-भाई का नारा
    ये हिंद हमारा…
    क्या याद हमें अब भी है अपने लोगों का वादा
    अमन चैन सुख-शांति हो या उनका यही इरादा
    सुभाष भक्त आजाद बापू ये राजेंद्र बाबू का नारा
    हिंदू हमारा सबसे प्यारा आंखों का तारा तिरंगा हमारा
    हम भी कहेंगे तुम भी कहोंगे, ये जग सारा
    ये हिंद हमारा…
    -डॉ. राजीव संजीव पांडेय, नालंदा
  • स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव
    आजादी के वर्षगांठ का पिचहत्तरवां उत्सव।
    सभी भारतीय मना रहे यह अमृत महोत्सव।।
    सन् उन्नीस सौ सैंतालिस में भारत हुआ स्वतंत्र,
    लहरा पहली बार तिरंगा, जाग उठा जनतंत्र,
    भरे उड़ान गगन में पंछी, गूंज उठा कलरव।
    सभी भारतीय मना रहे यह अमृत महोत्सव।।
    करते नमन शहीदों को आजादी जिनसे आई,
    स्वतंत्रता की खातिर जिसने अपनी बलि चढ़ाई,
    लहू बहाया तभी तिरंगे ने पाया गौरव।
    सभी भारतीय मना रहे यह अमृत महोत्सव।।
    आज अलौकिक ही दिखता है इस सूरज का रंग,
    लगता है वह भी लौटा है जीत के कोई जंग,
    बिन पुरुषार्थ स्वतंत्रता कैसे होती संभव।
    सभी भारतीय मना रहे यह अमृत महोत्सव।।
    घर-घर आज तिरंगा फहराया है जन-गन ने,
    जन-गण-मन अधिनायक का धुन गाया है मन ने,
    नए दौर में कदम रखा है भारत ने अभिनव।
    सभी भारतीय मना रहे यह अमृत महोत्सव।।
    -`शिब्बू’, गाजीपुरी
  • तिरंगा
    देश का प्रतीक तिरंगा
    हर हिंदुस्तानी के दिल में
    बसता शान तिंरगा
    तन-मन में जोश भरे
    उल्लास खुशी यह देता
    सूरज की गर्मी और
    चंद्र की शीतलता रख कहता
    वीर शौर्य की गाथा
    खुशहाली हरियाली देता
    भारत का मान बढ़ाता
    ऊंच-नीच का भेद नहीं
    बस राष्ट्र धर्म निभाता
    मित्रों का मीत है यह
    और अरि पर है भारी
    आजाद देश की शान है यह
    दामन में रखता गीता-गंगा
    झुकने न दो कभी तिरंगा
    चाहे जान भले ही जाए
    आजादी का जश्न मनाएं
    हो घर-घर में एक तिरंगा
    शान रहे और आन रहे
    सम्मान करो तुम इसका
    नमन करो नीति नमन करो
    है जग से न्यारा अपना तिरंगा
    पचहत्तर साल हुए
    हैं आजादी का अमृत महोत्सव
    आओ इस अवसर पर
    हर घर लहराए तिरंगा।
    -डॉ. आनंदी सिंह रावत, मुंबई
  • रिश्तों में बढ़ती अनिश्चितता!
    रिश्ता, कोई जादू की छड़ी नहीं है
    कि निभ जाएगा…
    रिश्ता, चाहे जो भी हो, जैसा भी हो,
    `निभाना’ पड़ता है,… अपितु
    `एहसास इस सच्चाई का’ दोनों तरफ हो,
    वर्ना दिलों की खोट, रिश्तों पर चोट करती है
    ऐसे में क्या `खाक’ निभ पाएंगे रिश्ते!
    रिश्तों की डोर वाकई `कमजोर’ होती है
    इसमें `गांठ’ न पड़ने देना
    गांठें पड़ गईं तो `संवरने’ की बजाय
    रिश्ते और अधिक `उलझ’कर रह जाएंगे
    बल्कि रिश्ते आपस में बंट जाएंगे
    वो उसकी तरफ ये इसकी तरफ
    ऐसे में कोई मुझे सुझाए `मैं किसकी तरफ?’
    सवाल ये कठिन है… परंतु जवाब इसका
    रिश्तों की `अनिश्चितता’ में धकेलनेवाला है।
    -त्रिलोचन सिंह अरोरा
  • बेहाल धरती
    कबीर की चादर है काली लिख रहे हैं
    बदचलन मौसम है धानी लिख रहे हैं।।
    ताना-बाना उजली चादर रट राम धुन
    वो हरम के किस्से कहानी लिख रहे हैं।।
    अब सुलगती है तपन से बेहाल धरती
    इंद्रधनुषी रंग-बिरंगी चाहतें लिख रहे हैं।।
    सबको है मालूम हालात बद-से-बदतर
    झूठे शौर्य की फर्जी रवानी लिख रहे हैं।।
    जुगनू के उजाले में सजा दरबार बैठे
    कहते हैं सच के माफिक लिख रहे हैं।।
    कल तलक जिनका पता भी नहीं था
    आज खुद को खानदानी लिख रहे हैं।।
    जो चीते के पंजों का निशां तक नहीं देखें
    शरीर पर पंजों की निशानी लिख रहे हैं।।
    दिल में रंजोगम संजो रखना जरा भी
    हम तो बस बातें पुरानी लिख रहे हैं।।
    चल रही तेज तूफानी हवाएं नाव जर्जर
    नाविक के जज्बे तजुर्बे लिख रहे हैं।।
    झंझावातों से जूझता आगे बढ़ा `उमेश’
    हम तो बस आंखों का पानी लिख रहे हैं।।
    -डॉ. उमेश चंद्र शुक्ल
  • दीवाना बनो
    दीवानों की तरह फिरता हूं मारा-मारा,
    कुछ काम नहीं है घूमता हूं मैं आवारा,
    हर काम को दरकिनार कर दीवाना हो गया हूं,
    दिखता नहीं मुझे कुछ और परवाना हो गया हूं,
    दुनिया अपने काम में बिजी है,
    मैं अपने दीवानेपन में बिजी हूं,
    दुनिया के लोगों की अपनी चॉइस है,
    मैं भी अपने काम में चूजी हूं,
    उन्हें समझ नहीं है हम दीवानों की,
    करते हैं बातें ऐसी-वैसी,
    तो हमें भी कद्र नहीं है तुम्हारी,
    दुनिया की ऐसी की तैसी,
    तन-मन-धन से खोए हैं हम दिन-रात
    अपने ही दीवानेपन में,
    रहते तो हम हैं दुनिया में
    पर खोए हैं अपने ही दीवानेपन में,
    सीख लो हमसे एक बात
    खो जाओ तुम भी अपने हर काम में
    इसी दीवानेपन से,
    फिर मिलेगी हर काम में सफलता
    बस लगे रहना इसी दीवानेपन से,
    दीवाने हो जाओ तुम भी,
    दीवानगी ही हर काम में रस घोलती है,
    तभी तो हर बेहतरीन काम के लिए
    दुनिया दीवानों के कदम चूमती है…
    – रंजय कुमार, मुंबई
  • अब्बू
    मेरा दिल और जान थे अब्बू।
    बस मेरी पहचान थे अब्बू।।
    उनको देखकर मैं जीता था।
    खुशियों का सामान थे अब्बू।।
    उनके जैसा बस बनना मुझको।
    एक उम्दा इंसान थे अब्बू।।
    मेरा मंदिर मेरी मस्जिद वो।
    मेरे लिए तो भगवान थे अब्बू।।
    तसलीम करता हर फन उनको।
    खूबियों की खदान थे अब्बू।।
    पढ़ लेते थे वो मेरे दुखों को।
    मुझसे कहां अंजान थे अब्बू।।
    शोहरत भी फीकी है `काजी’।
    मेरा ग़ुरूर अभिमान थे अब्बू।।
    -डॉ. वासिफ काजी, इंदौर
  • हई देख न
    फिन बदलि के नवा ठेकान हई देख न
    फिन फलनवा भइल परधान हई देख न
    अस ऊ भयवा गहि के मरलस दांव बांकुड़ी
    फिन ठहि भइलैं सगर उतान हई देखा ना
    सभ अपना ठीहा के रहलैं जबर जुआरी
    फिन से कटलस सभकर कान हई देख न
    लग्गत हउवै की जानेला ऊ जादू-मंतर
    फिन बिरोधिआ भइल मितान हई देखा ना
    अबले जेकरा मुहे पसरल रहलि अन्हरिया
    फिन से उहां उगल बा चान हर्इं देख न
    चलु भाय हमनो खेलल जाव ओल्हा पाती
    फिन बुझलस हम्मन के नदान हई देख न
    -डॉ. एमडी. सिंह
  • झूठ के सब हैं नाते यहां
    गम खुशी जो तेरे साथ है।
    जिंदगी की करामात है।।
    वक्त का सब करिश्मा यहां
    रात-दिन वक्त की बात है।
    रहबरी है खुदा की यहां
    जिंदगी अपनी सौगात है।।
    सच पता है सभी को यहां
    कुछ नहीं अपनी औकात है।।
    एक तिनका भी अपना नहीं।
    जिंदगी भी तो खैरात है।।
    नाम पैसा कमाए मगर।
    जाना तो कुछ नहीं साथ है।।
    मौत का यार पहरा सदा
    मौत ही आखिरी रात है।।
    झूठ के सब हैं नाते यहां
    कर्म ही बस तेरे साथ है।।
    कर वफा दोस्ती प्रेम में
    हो गई गर मुलाकात है।।
    भूल शिकवे-गिले तू `कनक’
    दिल में गर प्यार जज्बात है।।
    -नूतन सिंह `कनक’

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